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Reading: असम से पूर्वांचल तक डेमोग्राफिक चेंज जनसंख्या की उथल-पुथल का सच
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INDIAMIX > देश > असम से पूर्वांचल तक डेमोग्राफिक चेंज जनसंख्या की उथल-पुथल का सच
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असम से पूर्वांचल तक डेमोग्राफिक चेंज जनसंख्या की उथल-पुथल का सच

असम, पश्चिम बंगाल और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में जनसंख्या की संरचना में बदलाव का इतिहास लंबा और बहुआयामी है।

SANJAY SAXENA
Last updated: 30/07/2025 11:17 PM
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SANJAY SAXENA
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7 Min Read
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Demographic change from Assam to Purvanchal: The truth behind the population upheaval

न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि के हालिया बयान ने असम, पश्चिम बंगाल और पूर्वांचल (उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों) में पिछले कुछ दशकों में जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। गांधीनगर में राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय के एक कार्यक्रम में बोलते हुए, उन्होंने इन परिवर्तनों को एक ‘टाइम बम’ करार दिया, जिसने न केवल राजनीतिक हलकों में बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मंचों पर भी बहस छेड़ दी है। यह बयान भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में जनसांख्यिकी, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक स्थिरता जैसे संवेदनशील मुद्दों को उजागर करता है। राज्यपाल के टाइम बम वाले बयान के निहितार्थ, इसके ऐतिहासिक संदर्भ, और इसके सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रभावों पर गहराई से विचार करने पर भविष्य में डेमोग्राफिक चेंज को लेकर कई गंभीर चुनौतियां नजर आती हैं।

दरअसल, भारत की जनसांख्यिकी हमेशा से एक जटिल और गतिशील विषय रही है। असम, पश्चिम बंगाल और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों में जनसंख्या की संरचना में बदलाव का इतिहास लंबा और बहुआयामी है। इन क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय परिवर्तन मुख्य रूप से प्रवास, आर्थिक गतिविधियों, और सांस्कृतिक कारकों से प्रभावित हुए हैं। उदाहरण के लिए, असम में 19वीं सदी से ही बंगाल और बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) से प्रवास का लंबा इतिहास रहा है। ब्रिटिश शासनकाल में चाय बागानों के लिए श्रमिकों को लाया गया, जिसने असम की जनसांख्यिकी को प्रभावित किया।

स्वतंत्रता के बाद, विशेष रूप से 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान, बड़े पैमाने पर प्रवास ने इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक संरचना को बदल दिया। पश्चिम बंगाल में भी, सीमा पार से प्रवास और शहरीकरण ने जनसांख्यिकी को प्रभावित किया है। पूर्वांचल में, आर्थिक अवसरों की कमी और बेहतर रोजगार की तलाश में अन्य क्षेत्रों से प्रवास ने जनसंख्या की गतिशीलता को बढ़ाया है।

राज्यपाल का यह बयान कि क्या कोई भविष्यवाणी कर सकता है कि अगले 50 वर्षों में इन क्षेत्रों में ‘राष्ट्र विभाजन’ नहीं होगा, एक गंभीर चेतावनी है। यह 1947 के भारत विभाजन की याद दिलाता है, जब धार्मिक और सांस्कृतिक आधार पर देश का बंटवारा हुआ था। उनके शब्दों में निहित है एक डर कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन सामाजिक ताने-बाने को कमजोर कर सकते हैं और क्षेत्रीय या सांप्रदायिक तनाव को बढ़ा सकते हैं। हालांकि, इस बयान ने विवाद भी खड़ा किया है, क्योंकि यह एक विशेष विचारधारा को बढ़ावा देने के रूप में देखा जा सकता है। कुछ आलोचकों का मानना है कि यह बयान उन क्षेत्रों में रहने वाली विभिन्न समुदायों के बीच अविश्वास को बढ़ा सकता है, खासकर जब इसे राष्ट्रीय एकता के विपरीत देखा जाता है।

इन क्षेत्रों में जनसांख्यिकीय बदलावों की चिंता केवल सांख्यिकी तक सीमित नहीं है। यह सांस्कृतिक पहचान, भाषाई विविधता, और सामाजिक एकता जैसे गहरे मुद्दों से जुड़ा है। इसी के चलते असम में असमिया पहचान की रक्षा के लिए लंबे समय से आंदोलन चल रहे हैं, जैसे कि असम आंदोलन (1979-1985) जो अवैध प्रवास के खिलाफ था। इसी तरह से पश्चिम बंगाल में, बंगाली संस्कृति और भाषा की प्रमुखता को बनाए रखने की चिंता समय-समय पर उठती रही है। पूर्वांचल में, हिंदी भाषी आबादी और अन्य समुदायों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक टकराव देखा गया है। इन सभी क्षेत्रों में, जनसांख्यिकीय परिवर्तन को अक्सर स्थानीय समुदायों द्वारा अपनी पहचान और संसाधनों पर खतरे के रूप में देखा जाता है।

कहने का तात्पर्य यह है कि तमिलनाडु राज्यपाल का यह बयान राजनीतिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। तमिलनाडु में, जहां द्रविड़ विचारधारा का प्रभाव रहा है, राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय स्वायत्तता के बीच तनाव समय-समय पर देखा गया है। आरएन रवि का यह बयान, जो पहले से ही राज्य सरकार के साथ कुछ मुद्दों पर मतभेदों के लिए चर्चा में रहे हैं, इसे एक राष्ट्रीयवादी दृष्टिकोण के रूप में देखा जा सकता है। उनके शब्दों में ‘वन नेशन, वन लैंग्वेज’ जैसी विचारधारा का संकेत मिलता है, जो तमिलनाडु जैसे भाषाई और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील राज्य में विवादास्पद हो सकता है। यह बयान उन क्षेत्रों में भी तनाव पैदा कर सकता है, जहां पहले से ही सांप्रदायिक या क्षेत्रीय संवेदनशीलता मौजूद है।

इसके अलावा, जनसांख्यिकीय परिवर्तनों का मुद्दा सामाजिक और आर्थिक नीतियों से भी जुड़ा है। इन क्षेत्रों में संसाधनों का असमान वितरण, बेरोजगारी, और शिक्षा तक सीमित पहुंच जैसे कारक प्रवास को बढ़ावा देते हैं। यदि सरकारें इन मुद्दों को संबोधित करने में विफल रहती हैं, तो सामाजिक तनाव और बढ़ सकता है। उदाहरण के लिए, असम में अवैध प्रवास को रोकने के लिए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (छत्ब्) जैसे कदम उठाए गए हैं, लेकिन इनके कार्यान्वयन में कई चुनौतियां सामने आई हैं। पश्चिम बंगाल में, प्रवास से संबंधित नीतियां अक्सर राजनीतिक दलों के बीच विवाद का कारण बनती हैं।

इस बयान का एक और पहलू है इसका भविष्य पर प्रभाव। राज्यपाल ने अगले 50 वर्षों में ‘राष्ट्र विभाजन’ की आशंका जताई है, जो एक गंभीर चेतावनी है। हालांकि, यह भी महत्वपूर्ण है कि इस तरह की चेतावनियों को सावधानीपूर्वक संभाला जाए, ताकि सामाजिक सौहार्द बिगड़े नहीं। भारत की ताकत उसकी विविधता में निहित है, और जन जतनेजे को मजबूत करने के लिए समावेशी नीतियों की आवश्यकता है। शिक्षा, रोजगार, और सामाजिक एकता को बढ़ावा देने वाली नीतियां इन चिंताओं को कम कर सकती हैं।

अंत में, आरएन रवि का बयान एक गंभीर मुद्दे को उजागर करता है, लेकिन इसे संबोधित करने के लिए एक संतुलित और समावेशी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। जनसांख्यिकीय परिवर्तन एक वास्तविकता है, लेकिन इसे ‘टाइम बम’ के रूप में देखने के बजाय, इसे समझने और प्रबंधन करने की जरूरत है। भारत जैसे देश में, जहां विविधता इसकी सबसे बड़ी ताकत है, सामाजिक एकता और राष्ट्रीय एकीकरण को बनाए रखने के लिए संवाद और सहयोग आवश्यक है।  


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