
न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI) – एक ऐसा शब्द, जो कभी भविष्य की कल्पनाओं तक सीमित था, आज हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में गहराई तक घुस चुका है। लेकिन जैसे हर तकनीक के दो पहलू होते हैं, वैसे ही एआई भी दो धार वाली तलवार है। जहाँ एक तरफ़ इसका इस्तेमाल हेल्थ, शिक्षा, संचार और शोध जैसे क्षेत्रों में किया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ़ साइबर क्रिमिनल्स ने इसे अपने काले धंधों को और तेज़, और खतरनाक बनाने का औज़ार बना लिया है।हाल ही में प्रकाशित AI 2027 नामक रिसर्च पेपर और इसके बाद आई अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स ने इस खतरे को और स्पष्ट कर दिया है। इसमें बताया गया है कि एआई अब सिर्फ़ “ऑटोमेशन” या “स्मार्ट एप्लिकेशन” तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह हैकर्स के लिए एक हथियार बन चुका है। डराने वाली बात यह है कि आम आदमी इस पूरे खेल से लगभग बेख़बर है।एआई तकनीक ने दुनिया को तेज़ बना दिया है, लेकिन इसी गति ने अपराधियों को भी एक घातक हथियार दे दिया है। अब सवाल सिर्फ़ इतना है कि – क्या हम इसे समझकर अपनी सुरक्षा रणनीति बदलेंगे या फिर हर बड़े साइबर हमले के बाद केवल पछताते रहेंगे?स्पष्ट है कि अब समय आ गया है जब भारत समेत दुनिया के हर देश को साइबर सुरक्षा में आक्रामक रवैया अपनाना होगा। यह लड़ाई सिर्फ सरकार या पुलिस की नहीं है, बल्कि हर उस नागरिक की है, जिसकी डिजिटल पहचान इस “स्मार्ट अपराध” के निशाने पर है।
AI 2027 रिसर्च पेपर ने यह साफ़ कर दिया है कि अगले कुछ सालों में एआई के सबसे बड़े प्रयोग साइबर युद्ध और डिजिटल अपराध की दुनिया में होंगे। रिपोर्ट कहती है कि –
- एआई टूल्स अब इतने सक्षम हो चुके हैं कि वे स्वचालित रूप से खतरनाक कोड लिख सकते हैं।
- हैकर्स इन्हें इस्तेमाल कर यह तय कर सकते हैं कि किस सर्वर, किस डेटाबेस और किस व्यक्ति पर हमला करना है।
- यहां तक कि एआई यह भी सिखा रहा है कि किस प्रकार ब्लैकमेल करना है, किसे धमकाना है और कितनी फिरौती माँगनी चाहिए।
यानी अब अपराधी “ट्रायल एंड एरर” नहीं करेंगे। उन्हें कोई सॉफ्टवेयर हैक करने या किसी नेटवर्क में घुसने का महीनों इंतज़ार नहीं करना पड़ेगा। एआई मिनटों में यह सब कर देगा। यही कारण है कि इसे “वाइब हैकिंग” कहा जा रहा है। इसका मतलब है – डिजिटल अपराध में मानवीय सोच से ज़्यादा एआई की सोच का इस्तेमाल।
एंथ्रोपिक और चैटबॉट क्लॉड का दुरुपयोग
अमेरिका की नामी एआई कंपनी Anthropic के चैटबॉट Claude का मामला इस समय चर्चा में है। बीबीसी की रिपोर्ट्स बताती हैं कि हैकर्स ने इस चैटबॉट का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर डेटा चोरी और ब्लैकमेलिंग के लिए किया।
- लगभग 17 संगठनों को निशाना बनाया गया।
- इनमें कॉर्पोरेट कंपनियों से लेकर सरकारी संस्थान तक शामिल थे।
- हैकर्स ने Claude की मदद से खतरनाक कोड लिखवाए और फिर तय किया कि किस संगठन से कितनी फिरौती वसूली जानी है।
इस पूरे घटनाक्रम से एक गहरी सच्चाई उजागर होती है – एआई अब अपराधियों के हाथ में मशीनगन की तरह है, जबकि आम नागरिक और यहां तक कि सरकारें भी, अभी सिर्फ़ ढाल लिए खड़ी हैं।
एआई ने साइबर अपराध को तीन तरह से तेज़ किया है –
- गति (Speed):
पहले जहाँ एक हैकर को कोई जटिल कोड लिखने में हफ्तों लगते थे, अब एआई सेकंडों में यह काम कर देता है। - सटीकता (Precision):
एआई के ज़रिए हैकर्स आसानी से समझ लेते हैं कि कौन सा सिस्टम कमजोर है और किसे आसानी से निशाना बनाया जा सकता है। - मनोवैज्ञानिक दबाव (Psychological Manipulation):
ब्लैकमेलिंग में एआई अपराधियों को यह भी सिखा रहा है कि लोगों को डराने के लिए किस भाषा, किस लहज़े और किस तरीके का इस्तेमाल किया जाए।
यही वजह है कि साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अब कह रहे हैं कि यह “डिजिटल आतंकवाद का नया दौर” है।
किसी बड़ी कंपनी या सरकारी विभाग पर साइबर हमला आम आदमी को सीधे तौर पर प्रभावित न करे, ऐसा सोचना भूल होगी। कारण सरल है –
- अगर बैंक का सर्वर हैक हुआ तो सबसे पहले आम ग्राहकों का डेटा और पैसा खतरे में जाएगा।
- अगर सरकारी विभाग की वेबसाइट या डेटा लीक हुआ तो पहचान पत्र, आधार, पैन, हेल्थ रिकॉर्ड जैसे संवेदनशील दस्तावेज खुले बाजार में बिक सकते हैं।
- और अगर शिक्षा या स्वास्थ्य संस्थानों पर हमला हुआ तो सीधा असर छात्रों और मरीज़ों पर पड़ेगा।
मतलब, साइबर हमले का सबसे बड़ा शिकार वही आम नागरिक है, जो आज भी यह मानकर चलता है कि उसका काम सिर्फ मोबाइल में पासवर्ड डालने तक सीमित है।
भारत समेत कई देशों में साइबर सुरक्षा को लेकर अब तक की रणनीति रक्षात्मक (Defensive) रही है। यानी –
- पहले साइबर हमला होने दो।
- फिर उसकी जांच करो।
- अपराधियों को पकड़ो या ब्लॉक करो।
लेकिन इस पूरे प्रोसेस में समय इतना ज़्यादा लग जाता है कि अपराधी तब तक कहीं और पहुँच चुके होते हैं। इसके अलावा ज्यादातर मामलों में डिजिटल सबूत या तो मिटा दिए जाते हैं या फिर दूसरे देश की सीमा पार होते ही कानूनी कार्यवाही ठप पड़ जाती है।
एआई-सक्षम साइबर अपराध ने यह साबित कर दिया है कि केवल रक्षात्मक रणनीति अब कारगर नहीं रहेगी। हमें सुरक्षा के लिए आक्रामक (Offensive) रणनीति अपनानी होगी। इसका मतलब है –
- हैकर्स की तकनीक से पहले परिचित होना:
सरकार और सुरक्षा एजेंसियों को खुद भी एआई का इस्तेमाल कर यह पता लगाना होगा कि अपराधी किस तरह के टूल्स का उपयोग कर रहे हैं। - हमले से पहले खतरे की पहचान:
साइबर अटैक की योजना बनते ही उसका पता लगाने की क्षमता विकसित करनी होगी। - डिजिटल निगरानी और ट्रैप:
इंटरनेट की अंधेरी दुनिया (Dark Web) में घूम रहे डेटा को पकड़ना और अपराधियों के लिए “डिजिटल जाल” बिछाना। - इंटरनेशनल कोऑपरेशन:
क्योंकि अपराधी अक्सर सीमा पार बैठे होते हैं, इसलिए सिर्फ़ राष्ट्रीय कानून से काम नहीं चलेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रीयल टाइम सूचना साझा करने की व्यवस्था बनानी होगी।
भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 80 करोड़ से अधिक है। इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी युवाओं और ग्रामीण उपभोक्ताओं की है। यह वर्ग सबसे असुरक्षित भी है क्योंकि –
- साइबर सुरक्षा की बुनियादी जानकारी का अभाव है।
- फ्री ऐप्स और ऑफ़र के लालच में लोग आसानी से जाल में फंस जाते हैं।
- छोटे व्यापारी और स्टार्टअप्स साइबर सुरक्षा पर खर्च करने से बचते हैं।
इन परिस्थितियों में अगर एआई आधारित साइबर हमले तेज़ होते हैं, तो भारत का सामाजिक और आर्थिक ढांचा गहरी चोट खा सकता है।
समाधान क्या है?
- डिजिटल साक्षरता:
आम नागरिक को यह सिखाना जरूरी है कि एआई से संचालित साइबर अपराध से कैसे बचें। जैसे – अज्ञात लिंक पर क्लिक न करना, मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करना, और बैंकिंग जानकारी साझा न करना। - साइबर इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार:
सरकार को साइबर अपराध शाखाओं को आधुनिक एआई टूल्स से लैस करना होगा। - प्राइवेट सेक्टर की जिम्मेदारी:
कंपनियों को सिर्फ़ लाभ कमाने पर नहीं, बल्कि डेटा सुरक्षा पर भी उतना ही ध्यान देना होगा। - कानून में बदलाव:
साइबर अपराध से जुड़े कानूनों को अपडेट करना होगा, ताकि एआई आधारित अपराधों पर तुरंत और प्रभावी कार्रवाई हो सके।