INDIAMIXINDIAMIXINDIAMIX
  • देश
  • मध्यप्रदेश
    • रतलाम
    • देवास
    • उज्जैन
    • सीहोर
    • इंदौर
    • भोपाल
    • झाबुआ
    • धार
    • सतना
    • रीवा
  • राज्य
    • गुजरात
      • दाहोद
    • उत्तरप्रदेश
      • लखनऊ
    • राजस्थान
      • जयपुर
      • उदयपुर
  • राजनीति
  • मनोरंजन
  • दुनिया
  • अन्य
    • YouTube
    • Story Archives
    • टेक्नोलॉजी
    • विडियो
    • सेहत/घरेलु नुस्खे
    • धर्म/ज्योतिष
    • कला/साहित्य
    • खेल
Search
  • About Us
  • Cookie Policy
  • Support Us
  • Fact Checking Policy
  • Ethics Policy
  • Term of Use
  • Corrections Policy
  • Privacy Policy
  • Contact Us
  • About Us
  • Cookie Policy
  • Support Us
  • Fact Checking Policy
  • Ethics Policy
  • Term of Use
  • Corrections Policy
  • Privacy Policy
  • Contact Us
© 2018-2025 IndiaMIX Media Network., All Rights Reserved. Designed by Kamakshi Web +91-8959521010
Reading: सतलुज फिल्म की कहानी और जसवंत सिंह खालड़ा का वो अनकहा काला सच
Share
Notification
Font ResizerAa
INDIAMIXINDIAMIX
Font ResizerAa
  • देश
  • मध्यप्रदेश
  • राज्य
  • राजनीति
  • मनोरंजन
  • दुनिया
  • अन्य
Search
  • देश
  • मध्यप्रदेश
    • रतलाम
    • देवास
    • उज्जैन
    • सीहोर
    • इंदौर
    • भोपाल
    • झाबुआ
    • धार
    • सतना
    • रीवा
  • राज्य
    • गुजरात
    • उत्तरप्रदेश
    • राजस्थान
  • राजनीति
  • मनोरंजन
  • दुनिया
  • अन्य
    • YouTube
    • Story Archives
    • टेक्नोलॉजी
    • विडियो
    • सेहत/घरेलु नुस्खे
    • धर्म/ज्योतिष
    • कला/साहित्य
    • खेल
Follow US
  • About Us
  • Cookie Policy
  • Support Us
  • Fact Checking Policy
  • Ethics Policy
  • Term of Use
  • Corrections Policy
  • Privacy Policy
  • Contact Us
© 2018-2026 IndiaMIX Media Network., All Rights Reserved. Designed by Kamakshi Web +91-9753910111
INDIAMIX > देश > सतलुज फिल्म की कहानी और जसवंत सिंह खालड़ा का वो अनकहा काला सच
देश

सतलुज फिल्म की कहानी और जसवंत सिंह खालड़ा का वो अनकहा काला सच

Ajai Kumar
Last updated: 09/07/2026 12:50 PM
By
Ajai Kumar
Share
9 Min Read
SHARE
The story of the film *Satluj* and the untold, dark truth about Jaswant Singh Khalra.

न्यूज डेस्क/इंडियामिक्स पंजाब के इतिहास के पन्नों में कुछ अध्याय ऐसे दर्ज हैं जिन्हें चाहकर भी मिटाया नहीं जा सकता, फिर चाहे उस पर कितने ही पर्दे क्यों न डाले जाएं। बीते शुक्रवार, 3 जुलाई को जब अचानक बिना किसी पूर्व सूचना या शोर-शराबे के ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर दिलजीत दोसांझ अभिनीत फिल्म ‘सतलुज’ रिलीज हुई, तो फिल्म जगत और दर्शकों के बीच हलचल मच गई। चार साल से सेंसर बोर्ड की फाइलों में दबी और ‘पंजाब 95’ से ‘सतलुज’ बनी यह फिल्म किसी चमत्कार से कम नहीं थी। लेकिन दर्शकों का यह कौतूहल और खुशी महज 48 घंटों की मेहमान साबित हुई। जी5 ने आधिकारिक तौर पर घोषणा कर दी कि ‘मौजूदा डेवलपमेंट्स’ के कारण भारत में इस फिल्म की स्ट्रीमिंग पर रोक लगा दी गई है। यह कोई पहली बार नहीं है जब किसी फिल्म के साथ ऐसा हुआ हो, लेकिन सवाल यह है कि आखिर इस फिल्म में ऐसा क्या है, जिसकी वजह से इसे बार-बार प्रतिबंधित या सेंसर किया जा रहा है? फिल्म की पटकथा जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित है। खालड़ा का नाम सुनते ही पंजाब के उस दौर की रोंगटे खड़े कर देने वाली यादें ताजा हो जाती हैं, जब राज्य उग्रवाद की आग में झुलस रहा था। उस दौरान पंजाब पुलिस की कार्यप्रणाली पर जो सवाल खड़े हुए, उन्हें जसवंत सिंह खालड़ा ने अपनी जान जोखिम में डालकर सार्वजनिक किया था। फिल्म के शुरुआती दृश्य बेहद विचलित करने वाले हैं, जिनमें पुलिस द्वारा एनकाउंटर के बाद शवों को काटकर सतलुज नदी में बहाते हुए दिखाया गया है। इसका उद्देश्य केवल एक था  सबूतों को मिटाना। जसवंत सिंह खालड़ा का किरदार निभाते हुए दिलजीत दोसांझ ने उस शख्स के जज्बे और दर्द को पर्दे पर उतारा है, जिसने अपने एक लापता साथी की तलाश में जो सच पाया, वह मानवता को शर्मसार कर देने वाला था।

-- विज्ञापन --

खालड़ा ने जब जांच शुरू की, तो उन्हें पता चला कि जिन लोगों को पुलिस ने ‘लावारिस’ बताकर श्मशान घाटों में चुपचाप जला दिया, उनके परिवार वाले उन्हें सालों से ‘लापता’ मानकर दर-दर भटक रहे थे। केवल एक श्मशान घाट के रिकॉर्ड की जांच में खालड़ा को 600 ऐसे मामले मिले। अपनी गहन पड़ताल के आधार पर उन्होंने दावा किया था कि उस दौर में पंजाब पुलिस ने करीब 25,000 लोगों को इसी तरह गैर-कानूनी तरीके से ‘लावारिस’ घोषित कर मार डाला। यह केवल एक आरोप नहीं था, बल्कि खालड़ा ने अंतरराष्ट्रीय मंचों से लेकर भारतीय अदालतों तक इस मुद्दे को उठाया। इस लड़ाई का नतीजा यह निकला कि मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और सीबीआई जांच के आदेश हुए। सीबीआई की रिपोर्ट में यह स्पष्ट हुआ कि केवल तरण-तारण जिले में ही 2,097 लोगों का पुलिस ने गैर-कानूनी तरीके से अंतिम संस्कार कर दिया था। इस सच को सामने लाने की कीमत जसवंत सिंह खालड़ा को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। 1995 में उन्हें उनके घर के सामने से अपहरण कर लिया गया और फिर वे कभी वापस नहीं लौटे। 2005 और 2007 में अदालती फैसलों ने उन पुलिस अधिकारियों को दोषी करार दिया जिन्होंने इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया था।

-- विज्ञापन --

अब सवाल यह उठता है कि क्या यह कहानी अनसुनी है? नहीं, यह इतिहास का हिस्सा है, यह मल्लिका कौर की पुस्तक ‘फेथ, जेंडर, एंड एक्टिविज्म इन द पंजाब कॉन्फ्लिक्ट’ में दर्ज है और कोर्ट के दस्तावेजों में भी मौजूद है। फिर फिल्म को ‘सेंसिटिव’ बताकर क्यों रोका जा रहा है? फिल्म की टीम ने यहां एक बहुत ही बारीक संतुलन बनाया है। यह फिल्म किसी एक राजनीतिक दल या विचारधारा को निशाना नहीं बनाती, बल्कि उस दौर में सत्ता और वर्दी के दुरुपयोग के उस वीभत्स चेहरे को दिखाती है, जिसने अनगिनत परिवारों को तबाह कर दिया। फिल्म में कहीं भी यह तर्क नहीं दिया गया है कि मारे गए सभी लोग बेकसूर थे, लेकिन यह प्रश्न जरूर खड़ा किया गया है कि क्या पुलिस को यह अधिकार है कि वह न्याय प्रक्रिया को दरकिनार कर खुद ही जज, जूरी और जल्लाद बन जाए? फिल्म में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या का एंगल भी बेहद महत्वपूर्ण है। फिल्म दिखाती है कि कैसे पुलिस ने उस आत्मघाती हमलावर के पूरे परिवार को उग्रवाद के समर्थन के शक में खत्म कर दिया। असल जिंदगी में भी मुख्यमंत्री की हत्या में शामिल रहे लोग पंजाब पुलिस के ही कांस्टेबल थे, और यह तथ्य पिछले तीन दशकों से पंजाब की राजनीति और सामाजिक चर्चाओं का एक बहुत ही जटिल हिस्सा रहा है। पुलिस के एक बड़े अधिकारी का किरदार फिल्म में दिखाया गया है, जो वास्तविक जीवन के एक चर्चित पुलिस अधिकारी से मिलता-जुलता है। अगर सिनेमा को फिक्शन में रियल किरदारों का गौरवगान करने का अधिकार है, तो क्या उसे समाज के लिए आईना दिखाने वाले विवादित तथ्यों को पर्दे पर लाने का हक नहीं है? ‘सतलुज’ को प्रतिबंधित करने का यह कदम उन दर्शकों में भारी निराशा और आक्रोश पैदा कर रहा है, जिन्होंने इसे देखा है। सोशल मीडिया पर लोग उन कहानियों को साझा कर रहे हैं जो उनके परिवारों ने उस दौर में झेली थीं। यह फिल्म महज एक ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं है, बल्कि उन लोगों के लिए एक मरहम है जिनके घाव आज भी हरे हैं। फिल्म यह एहसास कराती है कि उनका दर्द दुनिया ने देखा है। जो 48 घंटे यह फिल्म प्लेटफॉर्म पर रही, इसने एक गहरी संवेदना जगाई  पहले उस बर्बरता को देखकर लोग हैरान हुए, और फिर जब उन्हें पता चला कि यह सब असल में हुआ था, तो वे स्तब्ध रह गए।

-- विज्ञापन --

अंत में, यह कहना गलत नहीं होगा कि सेंसरशिप का यह खेल केवल उस सच को दबाने की कोशिश है जो सत्ता के गलियारों में असहजता पैदा करता है। जिस दौर में हम सूचनाओं के युग में जी रहे हैं, वहां किसी फिल्म को ‘सेंसिटिव’ बताकर हटा देना केवल लोगों के गुस्से को और भड़काता है। फिल्म ‘सतलुज’ कोई अलगाववादी एजेंडा नहीं चलाती, यह केवल एक ऐसे शख्स की कहानी है जिसने निडर होकर कानून के रक्षकों द्वारा किए गए अवैध कृत्यों के खिलाफ आवाज उठाई। अगर यह फिल्म राजनीतिक तौर पर किसी को नुकसान पहुंचाती भी है, तो वह केवल उन्हीं को जिनका अतीत इन काले कारनामों से जुड़ा है। एक लोकतांत्रिक देश में, जहाँ अभिव्यक्ति की आजादी की बातें होती हैं, वहां इस तरह का प्रतिबंध लगाना उस त्रासदी को एक बार फिर से जीवित कर देता है जो दशकों पहले घटित हुई थी। यह फिल्म केवल एक आदमी की बहादुरी की गाथा नहीं है, यह उन अनगिनत लोगों की आवाज है जो सिस्टम के शोर में दबकर रह गए थे। इसे रोककर, सिस्टम ने अनजाने में इस फिल्म और इसकी कहानी को और भी ज्यादा चर्चित बना दिया है, क्योंकि सच को पर्दे के पीछे छुपाना नामुमकिन है, वह किसी न किसी रास्ते से बाहर आ ही जाता है।


Website Design By

KAMAKSHI WEB

CONTACT : +91-9753910111


 

डिस्क्लेमर

 खबर से सम्बंधित समस्त जानकारी और साक्ष्य ऑथर/पत्रकार/संवाददाता की जिम्मेदारी हैं. खबर से इंडियामिक्स मीडिया नेटवर्क सहमत हो ये जरुरी नही है. आपत्ति या सुझाव के लिए ईमेल करे : editor@indiamix.in

इंडियामिक्स को सब्सक्राइब करे

Get it on Indus Appstore
Share This Article
Facebook Whatsapp Whatsapp Threads
Share
What do you think?
Love0
Sad0
Happy0
Cry0
Surprise0
Angry0
Embarrass0
ByAjai Kumar
Follow:
वरिष्ठ पत्रकार , इंडियामिक्स, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
Previous Article मंदिर, राम सेतु और राजनीति: कैसे बदलते रहे नेताओं के सुर मंदिर, राम सेतु और राजनीति: कैसे बदलते रहे नेताओं के सुर
Leave a review Leave a review

Leave a Review Cancel reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Please select a rating!

प्रशासनिक अधिकारियो से, नेताओ से और पुलिस से आपका निजी लगाव आपकी पत्रकारिता को निष्पक्ष नहीं रहने देता

मुकेश धभाई, संपादक, इंडियामिक्स

Stay Connected

FacebookLike
XFollow
InstagramFollow
YoutubeSubscribe
WhatsAppFollow
Google NewsFollow
ThreadsFollow
RSS FeedFollow

Latest News

मंदिर, राम सेतु और राजनीति: कैसे बदलते रहे नेताओं के सुर
मंदिर, राम सेतु और राजनीति: कैसे बदलते रहे नेताओं के सुर
देश राजनीति
09/07/2026
विनय कटियारः आंदोलन के नायक से उपेक्षित चेहरे तक
विनय कटियारः आंदोलन के नायक से उपेक्षित चेहरे तक
देश धर्म/ज्योतिष
04/07/2026
खामेनेई का अंतिम संस्कार: शोक आमंत्रण में छिपा है बड़ा सियासी संदेश
खामेनेई का अंतिम संस्कार: शोक आमंत्रण में छिपा है बड़ा सियासी संदेश
दुनिया
04/07/2026
चीन का नया कानून दुनिया में बहस का बड़ा मुद्दा
चीन का नया कानून दुनिया में बहस का बड़ा मुद्दा
दुनिया
04/07/2026
भारत-जापान की नई रणनीतिक साझेदारी से बदलेंगे एशिया के शक्ति समीकरण
भारत-जापान की नई रणनीतिक साझेदारी से बदलेंगे एशिया के शक्ति समीकरण
दुनिया
04/07/2026

पत्रकारिता आपकी जान ले सकती हैं, लेकिन जब तक आप इसमें हैं, तब तक ये आपको जीवित रखेगी.

होरेस ग्रीले
//

IndiaMIX Media Network was established in November 2018 in Ratlam city of Madhya Pradesh. Keeping in view the current digital era, it was started as a digital media (news portal).

  • About Us
  • Cookie Policy
  • Support Us
  • Fact Checking Policy
  • Ethics Policy
  • Term of Use
  • Corrections Policy
  • Privacy Policy
  • Contact Us
INDIAMIXINDIAMIX
Follow US
© 2018-2026 IndiaMIX Media Network., All Rights Reserved. Designed by Kamakshi Web +91-9753910111