
विधायक जी को गरीबों की मदद करने से कौन रोक रहा है
रतलाम /डोसीगांव मल्टी में शिफ्ट किए गए शिवनगर एवं प्रकाशनगर की झुग्गी-बस्तियों के गरीब परिवारों को आवंटित फ्लैटों के मामले में नगर निगम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं पूर्व विधायक एवं पूर्व महापौर पारस सकलेचा ने कहा कि इंदौर हाईकोर्ट के स्थगन के बावजूद दो-दो बार निरस्ती के विज्ञापन जारी करना और अब अचानक फ्लैट निरस्त नहीं करने का निर्णय लेना पूरे मामले को संदिग्ध बनाता है।
यह पूरी प्रक्रिया MIC को कानूनी प्रक्रिया में उलझाने का षड्यंत्र प्रतीत होती है।
सकलेचा ने कहा कि मामला 2019-20 में बनी प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत डोसीगांव EWS मल्टी का है। रेलवे भूमि से विस्थापित 396 परिवारों का यहां पुनर्वास किया गया था। प्रत्येक हितग्राही को 20 हजार रुपए मार्जिन मनी और शेष 1.80 लाख रुपए बैंक ऋण या एकमुश्त जमा करना था। निगम के अनुसार 208 हितग्राहियों ने 6 साल तक राशि जमा नहीं की।
सकलेचा ने सवाल उठाए!
उन्होंने सवाल किया कि 5 अगस्त को जब बिना आवंटन निरस्त किए ही भारी पुलिस बल, SDM एवं तहसीलदार की मौजूदगी में गरीबों को फ्लैटों से बाहर निकाल दिया गया और उनका सामान बाहर फेंक दिया गया, तब क्या MIC की अनुमति ली गई थी?
उन्होंने पूछा कि हाईकोर्ट के स्थगन के बाद दो-दो बार निरस्ती के विज्ञापन जारी करने के लिए क्या MIC की अनुमति ली गई थी? यदि अब अनुमति ली गई है तो महापौर एवं MIC को यह भी समझना चाहिए कि यह खेल किसके इशारे पर हो रहा है !!!
सकलेचा ने विधायक चेतन काश्यप से पूछा कि जिन गरीब परिवारों के पास ₹20 हजार की मार्जिन मनी तक नहीं थी, उनकी ओर से ₹10 हजार की मदद की गई थी, उन्हीं परिवारों से तीन दिन में एकमुश्त ₹1.80 लाख मांगना क्या उचित है?बकाया राशि की वसूली के लिए कानूनी प्रक्रिया निर्धारित है
सकलेचा ने कहा कि गरीबों को घर से निकालना और महिलाओं-बच्चों को 40 दिन से बरामदों, झुग्गियों तथा बंद पड़े टॉयलेट में रहने को मजबूर करना कौन-सा न्याय है? जिन उद्योगपतियों पर हजारों करोड़ रुपये की देनदारियां हैं, उनसे वसूली के लिए क्या ऐसा ही तरीका अपनाया जाता है? उन्होंने विधायक से सीधा सवाल किया कि क्या यह अमानवीय स्थिति आपके संज्ञान में नहीं है? यदि आपने गरीबों की मदद के लिए ₹10 हजार दिए थे, तो अब उनके साथ हो रहे इस व्यवहार के खिलाफ प्रशासन को कठघरे में खड़ा करने से आपको कौन रोक रहा है?”
गरीबों को चुनाव के समय नहीं, संकट के समय जनप्रतिनिधि की जरूरत होती है
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