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Reading: मप्र विधानसभा उपचुनाव – सिंधिया के झटके के बाद झूलता कांग्रेस का जहाज
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INDIAMIX > राजनीति > मप्र विधानसभा उपचुनाव – सिंधिया के झटके के बाद झूलता कांग्रेस का जहाज
राजनीति

मप्र विधानसभा उपचुनाव – सिंधिया के झटके के बाद झूलता कांग्रेस का जहाज

MAKARDHWAJ TIWARI
Last updated: 09/08/2020 10:01 PM
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MAKARDHWAJ TIWARI
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18 Min Read
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मार्च में एक लंबे राजनीतिक ड्रामे के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के अलग होने के बाद मप्र में मात्र कमलनाथ की सरकार ही नहीं गिरी, बल्कि कई जगहों पर पूरा कांग्रेस का स्ट्रक्चर ही ढह सा गया है।

मप्र विधानसभा उपचुनाव - सिंधिया के झटके के बाद झूलता कांग्रेस का जहाज

संपादकीय / इंडियामिक्स न्यूज़. मार्च में एक लंबे राजनीतिक ड्रामे के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया खेमे के अलग होने के बाद मप्र में मात्र कमलनाथ की सरकार ही नहीं गिरी, बल्कि कई जगहों पर पूरा कांग्रेस का स्ट्रक्चर ही ढह सा गया है। ऐसे में अब 27 सीटों पर होने वाला उपचुनाव कांग्रेस के लिये करो या मरो का चुनाव है। अगर इनमें कांग्रेस मजबूती से खड़ी नहीं हो पाई तो आगे उठना कांग्रेस के लिए मुश्किल होगा। इस बात को प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व बखूबी समझता है। श्रीराम जन्मभूमि शिलान्यास के अवसर पर कमलनाथ द्वारा PCC में श्रीराम का पूजन हो अथवा दिग्विजय सिंह, सज्जन सिंह वर्मा, जीतू पटवारी, डॉ गोविन्द सिंह, रामनिवास रावत आदि की सक्रियता भी इसी बात को दर्शाती है। दिग्विजय सिंह के भाई लक्ष्मण सिंह के हालिया ट्वीट भी इसी बौखलाहट व सच के साक्षत्कार का परिणाम है जिसे मप्र PCC बखूबी समझ रही है।

मुरैना जिला जिसकी पांच सीटों पर उपचुनाव होगा, इन चुनावों में निर्णायक होने के साथ कांग्रेस के लिए सिरदर्द तथा सिंधिया के लिए साख का विषय बना हुआ है। यहाँ कांग्रेस दिग्विजय सिंह व डॉ गोविंद सिंह के भरोसे है लेकिन सिंधिया के द्वारा किये गये गड्ढे को उपचुनावों से पहले भरना असम्भव है। लगभग हर विधानसभा में सिंधिया के जाने के बाद आधे से अधिक ध्वस्त हुआ है, कई मंडलम व ब्लॉक में कांग्रेस उचित स्थानीय नेतृत्व की समस्या से जूझ रही है, जो चिंताजनक है।

जिले की विधानसभाओं पर फौरी नजर डाले तो जौरा में कांग्रेस को सिंधिया का समर्थन हमेशा अतिरिक्त मदद करता था, लेकिन अब इसका नहीं होना व पूर्व विधायक शर्मा के परिवार को महल का पारंपरिक समर्थन होने की वजह से यहां उम्मीदवार को लेकर भी सहमति नहीं है। शायद यहीं कारण है कि यहां से पूर्व मंत्री लाखनसिंह यादव के भतीजे संजय यादव को चुनाव लड़वाने की चर्चा कांग्रेस में चल रही है। ऐसे में इस जटिल विधानसभा पर कांग्रेस वर्तमान में पीछे लग रही है। अम्बाह में भी कांग्रेस के पास कमलेश जाटव का विकल्प नहीं दिख रहा ऐसे में कभी बसपा में रहें सत्यप्रकाश सखवार व भाजपा नेता बंशीलाल जाटव के नाम पर कयास लगाये जा रहें हैं। दिमनी में भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। मुरैना में कांग्रेस को मेहनत करने की आवश्यकता है, यहाँ भी भाजपा के नाराज नेताओं पर नजर का एक कारण यह भी है। सुमावली में सिंधिया व कंसाना दोनों ने कांग्रेस को बड़ा गड्ढा दिया है, जिसे भरना आसान नहीं दिख रहा। कांग्रेस के पास यहाँ उम्मीदवार तो उपलब्ध है लेकिन जातिगत समीकरण के मद्देनजर पशोपेश की स्थिति इस सीट की गंभीरता को स्वतः ख्यापित करती है।

ग्वालियर व भिण्ड जिले में भी कांग्रेस की स्थिति डांवाडोल ही कही जा सकती है, हालांकि डॉ गोविंद सिंह कोशिस कर रहें हैं लेकिन वो वर्तमान में नाकाफी लग रही है। ग्वालियर सीट पर कांग्रेस यहां जातिगत रूप से सशक्त उम्मीदवार की तलाश में हैं, हालांकि बालेंदु शुक्ला के रूप में एक विकल्प है, लेकिन यह तोमर की छवि व टेक्टिक्स तथा उनको मिलने वाले सहयोग के सामने कमाजोर लग रहें हैं। कुछ ऐसी ही स्थिति ग्वालियर पूर्व में भी है। यहाँ जातिगत गठजोड़ व सहयोग के साथ व्यक्तिगत उपस्तिथि के मापदंडों पर कांग्रेस के पास कोई उचित उम्मीदवार नहीं दिख रहा है। अशोक सिंह एक अच्छे विकल्प हो सकतें हैं, लेकिन उनको कांग्रेस के अंदर सबका सहयोग मिले इसमें संशय है। डबरा विधानसभा में कांग्रेस का संगठन धराशायी सा हो गया है। यहाँ इमरती देवी, सिंधिया तथा नरोत्तम मिश्रा के बल पर भाजपा खासी मजबूत दिख रही है, बिखरा हुआ कांग्रेसी संगठन इसे और मजबूती प्रदान कर रहा है। सत्यपरकाशी परसेडिया पर कांग्रेस दाव खेल सकती है, लेकिन इस सीट पर जीत इसके अलावा सन्गठन को एक सूत्र में साधने व जातिगत समीकरणों के अनुसार चलने से ही सम्भव है। 

भिण्ड जिले की मेहँगाव विधानसभा में भी कांग्रेस मुख्यतः उम्मीदवार के संकट से जूझ रही है, राजेन्द्र सिंह चतुर्वेदी एक विकल्प है लेकिन इनको कांग्रेस में ही सबका सहयोग मिले इसमें संशय है, ऐसे में कांग्रेस यहां भाजपा के अंदर के किसी असंतोष की संभावना पर नजर गड़ाये बैठी है, जो कि लाजमी भी है। गोहद में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ है, यहाँ पार्टी संगठन के आंतरिक नुकसान के साथ उम्मीदवार के संकट का सामना भी कर रही है। संजू जाटव सिंधिया के विरोध में प्रखर होने व सम्भावित भाजपा उम्मीदवार के लिये सजातीय होने की वजह से एक बढ़िया विकल्प हैं लेकिन जिताऊ नहीं।

शिवपुरी जिले की करेरा विधानसभा में भी कांग्रेस संगठन के नुकसान व जिताऊ चेहरे की कमी से जूझ रही है। हालांकि यहां पर दिग्विजय सिंह की टीम तेजी से डैमेज कंट्रोल करती हुई दिख रही है लेकिन उम्मीदवार की तलाश अभी भी जारी है। जातिगत समीकरणों के आधार पर संवेदनशील इस सीट पर कांग्रेस के पास शकुन्तला खटीक, परागीलाल जाटव के रूप में उम्मीदवार तो है लेकिन घोषणा में देरी व संगठन के अंदर की तानातानी से नुकसान की आशंका हैं। जिले की ही पोहरी विधानसभा में कांग्रेस व भाजपा दोनों मुश्किल में हैं। कांग्रेस के पास जहां उम्मीदवार का संकट है वही भाजपा को बड़े भितरघात की आशंका है। कांग्रेस के पास यहां हरिवल्लभ शुक्ला एवं रामनिवास रावत के रूप में मजबूत उम्मीदवार भी हैं।

अशोकनगर जिले की अशोकनगर व सुमावली विधानसभा में तो सिंधिया व समर्थक विधायकों के जाने के बाद पूरे जिले में कांग्रेस का संगठन एक तरह से ढह से गया है। यहाँ कांग्रेस अपनी स्थिति को बनाये रखने के संकट से जूझ रही है। इन दोनों विधानसभाओं में कांग्रेस के पास जिताऊ चेहरे का अकाल सा है, ऐसे में यहाँ कांग्रेस की स्थिति का अंदाजा स्वतः ही लग जाता है।

दत्तिया जिले की भांडेर विधानसभा में कांग्रेस के संगठन नुकसान हुआ है, ऐसे में दलित वोटों को साधने के लिये क्षेत्र के स्थापित दलित नेता पुर्व विधायक फूल सिंह बरैया को अघोषित उम्मीदवार बना कर पार्टी ने भाजपा को मजबूत चुनौती दी है। 

गुना जिले की बामोरी विधानसभा में कांग्रेस तथा भाजपा नहीं बल्कि “किले और महल” के बीच चुनाव देखने को मिल सकता है। यह सीट सिंधिया के साथ दिग्विजय सिंह के लिये भी प्रतिष्ठा का विषय है। ऐसे में दिग्विजय सिंह की मर्जी ओर KL अग्रवाल अथवा मुरारीलाल धाकड़ में से कोई एक यहाँ चुनाव लड़ सकतें हैं। दिग्विजय सिंह के सहारे यहाँ अगर कांग्रेस को धाकड़ को धाकड़ तरीके से लड़ाये तो भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकती है।

सागर जिले की सुरखी विधानसभा का हाल भी कांग्रेस के लिहाज से बुरा है। गोविंद सिंह राजपूत व उनके समर्थकों के पार्टी से निकलने के बाद यहां कांग्रेस के पास कोई खेवनहार नहीं दिख रहा है। यहाँ का कोई स्थानीय कांग्रेस नेता गोविंद सिंह राजपूत के मुकाबले का नहीं है, संगठन में भी अधिकतम नेता, कार्यकर्ता इनके समर्थक थे ऐसे में इस स्थिति में यहाँ पूर्व नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह को चुनाव लड़ने की चर्चा है, जो यहाँ कांग्रेस की कमजोरी का स्वतः प्रकटीकरण कर रहा है। भाजपा के पास यहाँ मंत्री भूपेंद्र सिंह व उनके समर्थकों का भी बल है, जो कांग्रेस की परेशानी को और बढ़ाने वाला हैI

अनूपपुर जिले की अनूपपुर विधानसभा में कांग्रेस वरिष्ठ विधायक व मंत्री बिसाहुलाल सिंह के भरोसे थी, जिनके जाने के बाद यहां पार्टी को नुकसान में हैं, लेकिन स्थानीय संगठन को कम नुकसान हुआ है जो कि उपचुनावों के लिहाज से कांग्रेस के लिये अच्छी बात है। यहाँ पर कांग्रेस के पास दिव्या सिंह, उमाकांत उइके, विश्वनाथ सिंह, नर्मदा सिंह आदि चेहरे तो हैं लेकिन बिसाहुलाल साहू के सम्मुख इनकी शक्ति व सामर्थ्य कम है, अतः यहाँ पर भी कांग्रेस को मजबूत तो नहीं कहा जा सकता।

रायसेन जिले की सांची विधानसभा में चुनाव जरूर रोचक होंगे। यहाँ भाजपा के डॉ प्रभुराम चौथरी को अभी तक स्थानीय भाजपा में स्वीकार्यता नहीं मिली है। जिसके कारण चौधरी अपनी टीम के माध्यम से विभिन्न कार्य सम्पादित कर रहें है जो कि उनके विरुद्ध जा रहा है। भाजपा के प्रभावशाली शेजवार परिवार से सहयोग की संभावना यहाँ चौधरी को कम है, जिसके कारण उनकी स्थिति को कमाजोर माना जा रहा है। कांग्रेस इस स्थिति को समझ रही है, यही कारण है कि दिग्विजय सिंह व सुरेश पचौरी जैसे नेता इस सीट पर सीधे निगाह बनाये हुये है तथा विभिन्न मंडलम व ब्लॉक में हुई क्षति को तेजी से दूर करने में लगी है। यहाँ दिग्विजय सिंह समर्थक डॉ GC गौतम तथा किरण अहिरवार दिग्गी राजा की टीम के साथ मिलकर चौधरी को कड़ी टक्कर दे सकतें है।

छतरपुर विधानसभा की मलहरा विधानसभा में कांग्रेस विधायक प्रद्युम्न सिंह लोधी के जाने के बाद कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ है। क्षेत्र में पार्टी के पास कोई अपना सशक्त नेता भी नहीं है। ऐसे में पार्टी यहाँ के जातिगत-राजनीतिक समीकरणों के अनुसार कमजोर है, जिसकी भरपाई के लिये भाजपा के अंदर आंतरिक असंतोष के सहारे पर खड़ी है। अगर भाजपा नेत्री रेखा यादव चुनाव से पहले कांग्रेस का दामन थाम ले तो यहाँ कड़ी टक्कर देखने को मिल सकती है।

आगर जिले की आगर विधानसभा जो भाजपा का गढ़ कही जाती है में कांग्रेस के पास मुख्य दिक्कत उम्मीदवार के चयन की है। यहाँ स्थानीय स्तर पर सशक्त उम्मीदवार की कमी होने की वजह से ही कांग्रेज़ यहाँ पिछले विधामसभा चुनाव के कड़े मामले में हारे विपिन वानखेड़े को क्षेत्र में सक्रिय कर चुकी है, जो कि एक अच्छा निर्णय भी है। लेकिन अगर भाजपा यहाँ दिवंगत विधायक के पुत्र मनोज ऊंटवाल अथवा पूर्व उज्जैन सांसद चिंतामणि मालवीय को उतार देती है तो पुनः कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ सकता है।

देवास जिले की हाटपिपल्या विधानसभा मनोज चौधरी के भाजपा में जाने के बाद से ही चर्चा का विषय बनी हुई है। यहाँ पूर्व विधायक व कद्दावर भाजपा नेता दीपक जोशी व उनके समर्थक मनोज चौधरी को खुल के अस्वीकार्य कर चुके है, हालांकि भाजपा नेतृत्व ने जोशी को संतुष्ट करने का प्रयास तो किय्य है लेकिन उसमें सफलता दिखती नहीं मिल रही है। ऐसे में कांग्रेस यहाँ राजवीर सिंह बघेल जैसे मजबूत उम्मीदवार के साथ उतरती है व दीपक जोशी का अप्रत्यक्ष सहयोग इन्हें मिल जाता है तो भाजपा को यहाँ बड़ी हार का सामना करना पड़ सकता है। कुछ मीडिया रिपोर्ट में चर्चा है कि जोशी कांग्रेस के पाले में जाकर चुनाव लड़ सकतें है, जिसकी सम्भावना कम है। अगर जोशी ऐसा करते है तो वो एकतरह से उनकी राजनीतिक आत्महत्या होगी, जिससे जोशी बचेंगे।

मंदसौर जिले की सुवासरा विधानसभा में हरदीप सिंह डंग के जाने के बाद कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ है। यहाँ पर स्थानीय कांग्रेस संगठन को भी डंग के जाने के बाद नुकसान हुआ है, लेकिन उसे सुधार जा सकता है। भाजपा में भी डंग को स्थानीय स्तर पर सहयोग मिलता दिख रहा है। कांग्रेस के पास यहां स्थानीय स्तर पर ओम सिंह भाटी के रूप में एक अच्छा विकल्प है। राकेश पाटीदार भी लाभदायक हो सकतें है, इनके माध्यम से राधेश्याम पाटीदार के सजातीय समर्थकों को भी साधा जा सकता है। लेकिन अभी यहाँ कांग्रेस निश्चित रूप से कमजोर है। अगर यहाँ कांग्रेस थोड़ा पहले अपना उम्मीदवार निश्चित कर दे तो उसे लाभ हो सकता है साथ ही स्थानीय उम्मीदवार ही यहाँ कांग्रेस को लाभ दे सकता है। 

धार जिले की बदनावर विधानसभा में हमें कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। यहाँ राजवर्धन सिंह के भाजपा में जाने के बाद स्थानीय कांग्रेस संगठन को जो नुकसान हुआ है वह ज्यादा गंभीर नहीं है। भाजपा नेता ध्रुवनारायण सिंह के कांग्रेस में जाने के बाद वे DCC अध्यक्ष बालमुकुंद सिंह गौतम की सक्रियता से इस नुकसान को कांग्रेस इस नुकसान को काफी कम करने में सक्षम रही है। भाजपा के पूर्व विधायक भंवरसिंह शेखावत की नाराजगी, राजवर्धन की कार्यप्रणाली से नाराज कई स्थानीय भाजपा पदाधिकारी आदि अन्य कारण भी यहाँ राजवर्धन को चुनाव के समय कमाजोर कर सकतें हैं। यहां कांग्रेस के पास उम्मीदवारों की कोई कमी नहीं है बालमुकुंद सिंह गौतम, कुलदीप बुन्देला तथा मनीष बाकोडिया यहाँ उपयुक्त उम्मीदवार हो सकतें हैं।

इंदौर जिले की सांवेर विधानसभा मंत्री तुलसी सिलावट के होने के कारण हाईप्रोफाइल बन गई है। यहाँ पर चुनाव देखने लायक हो सकता है। सिलावट के सामने प्रेमचन्द गुड्डू के रूप में कांग्रेस ने एक मजबूत चेहरा उतारने की मंशा जताई है, जो सही भी है। गुड्डू यहाँ पूर्व में विधायक रह चुके हैं, इस नाते इनके कई पुराने समर्थक भी हैं जिनके सहारे सिलावट व उनके समर्थकों के जाने के बाद हुये नुकसान को काफी हद तक भरा जा सकता है। यहाँ भी कांग्रेस पुख्ता जितने के स्थिति में नहीं है। अगर भाजपा में कोई आंतरिक असंतोष हुआ ( जिसकी संभावना है ) तो कांग्रेस को लाभ मिल सकता है।

खण्डवा जिले की मान्धाता विधानसभा में नारायण सिंह पटेल के भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस तथा क्षत्रप नेता अरुण यादव दोनों को नुकसान हुआ है। पटेल के इस कदम से यादव की पार्टी में जो छवि है उसको भी नुकसान हुआ है। यहाँ भाजपा को भी कोई विशेष लाभ मिलता नहीं दिख रहा है। नारायण पटेल के भाजपा में आने के बाद स्थानीय भाजपा जिसमें पहले ही आंतरिक गतिरोध थे अब और डिस्टर्ब हो गई है, ऐसे में कमजोर यहाँ दोनो दल हुये है। भाजपा की ओर से नारायण सिंह पटेल को जहां आंतरिक विरोध व भितरघात का सामना करना पड़ सकता है वही कांग्रेस के पास यहाँ एक जिताऊ चेहरा ढूंढने की आवश्यकता है। अरूण यादव के पास इस सीट को पुनः जितवा कर पार्टी के अपने प्रभाव को बरकरार रखने की चुनौती है।

बुराहनपुर जिले की नेपानगर विधानसभा में विधायक सुमित्रा कासडेकर के भाजपा में जाने के बाद कांग्रेस को स्थानीय संगठन के स्तर पर कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है, हालांकि भाजपा में इससे बड़ा असंतोष देखने को मिल सकता है, जो पूर्व विधायक मंजू दादू के रूख पर निर्भर करता है। यहाँ पर कांग्रेस के पास लगभग 1 दर्जन उम्मीदवार हैं जो कि इस बात का सूचक है कि यहाँ पर अन्य विधानसभाओं के मुकाबले कांग्रेस की स्थिति बेहतर हैं।

उपचुनाव की सभी सीटों की वर्तमान स्थिति पर फौरी नजर डालने के बाद यह कहा जा सकता है कि सिंधिया के जाने के बाद मप्र कांग्रेस की कश्ती बीच दरिया में झूल रही है, जिसको किनारे लगाने के लिये उपचुनाव में अच्छी जीत आवश्यक है। लेकिन अभी की सूरत में यह मुश्किल लग रहा है। एक तरफ भाजपा को जहां 1 दर्जन सीटे मिल जाती है तो वो अपनी सरकार सुरक्षित कर लेगी वहीं कांग्रेस को वापसी के लिये कम से कम 26 सीटें जितनी पड़ेगी जो कि असम्भव है।

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