आखिर क्यों हमें अहिल्याबाई होलकर की विरासत को संजोना चाहिये ?

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विश्व के इतिहास में मिश्र की रानी हत्शेपसुत कलाओं के संरक्षण के लिये प्रसिद्ध है। असीरियन रानी सम्मुरामट को कई युद्धों लड़ने, एक नई राजधानी बनाने और अपने राज्य की सीमा बढ़ाने के लिये जाना जाता है।

आखिर क्यों हमें अहिल्याबाई होलकर की विरासत को संजोना चाहिये ?

सम्पादकीय / इंडियामिक्स न्यूज़ 18 वीं शताब्दी में जब महिलाओं को राजनीति व प्रशासन के क्षेत्र में महत्व कम मिलता था, उस समय उत्तर भारत के इंदौर शहर की सम्राज्ञी अहिल्याबाई होलकर का शासन सुशासन के से सभी गुणों को समाहित किये, एक आदर्श उदहारण के रूप में हमें मिलता है। अहिल्याबाई का व्यक्तित्व एक मजबूत व बुद्धिमान शासक का रहा है, जिसने मजबूती से शासन किया, धर्माधारित शासन प्रणाली का संदेश दिया, पूरे देश में अनेक मंदिरों-आश्रमों का निर्माण कर हिन्दू धर्म का संरक्षण किया, छोटे पैमाने पर औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया। भारतीय जीवनमूल्यों के साथ आधुनिक मूल्यों के मध्य सुंदर संयोजन स्थापित किया। देवी अहिल्याबाई ने उस समय की विकट राजनीतिक अनिश्चितता वाली स्थिति में राज्य व शासन का कुशल सन्चालन किया। प्रशासन व शासन के समसामयिक मानकों से बहुत ऊपर उठ कर नवीन व अनिश्चित राज्य का मार्गदर्शन किया, आधुनिक इंदौर की नींव रखी।

विश्व के इतिहास में मिश्र की रानी हत्शेपसुत कलाओं के संरक्षण के लिये प्रसिद्ध है। असीरियन रानी सम्मुरामट को कई युद्धों लड़ने, एक नई राजधानी बनाने और अपने राज्य की सीमा बढ़ाने के लिये जाना जाता है। स्पेन की रानी इसाबेला को अपने साम्राज्य के गणमान्य जनो को एक कर राज्य को मजबूत करने तथा सरकारी मशीनरी को सुव्यवस्थित कर प्रशासन को सुचारू करने के लिये याद किया जाता है। इन्हीं की तरह देवी अहिल्याबाई होलकर भी भारत की महान शासिका हैं, जिनके नाम पर असंख्य उपलब्धियां इतिहास में दर्ज है। लेकिन दुर्भाग्य है कि ऊपर वर्णित रानियों को तो भारतीय जानते हैं लेकिन देवी अहिल्याबाई होल्कर के बारे में अधिकतर भारतीयों के पास जानकारी का आभाव है।

देवी अहिल्याबाई होलकर सभी पुरुष उत्तराधिकारियों की मृत्यु के कारण विषम परिस्थिति में मालवा की रानी के रूप में बैठी, लैंगिक असमानता के उस समय में अनेक चुनौतियों के बावजूद अहिल्याबाई ने शीघ्र की खुद को एक मजबूत शासक के रूप में स्थापित किया। सत्ता, शक्ति व प्रशासन के सभी सूत्र अपने हाथ में लिये तथा 28 वर्षों तक मालवा प्रान्त पर शासन किया.अहिल्याबाई का जन्म 1725 में महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक सामान्य धनगर परिवार में हुआ था। यह समुदाय मुख्यतः खेती-किसानी से सम्बंधित रहा है, ऐसे में अहिल्याबाई उस समय इस समुदाय की उन चुनिन्दा लड़कियों में थी जिसने पढना-लिखना सिखा था। 

इंदौर के शासक  माधवराव होलकर के पुत्र खाण्डेराव से अहिल्याबाई की शादी 8 साल की उम्र में ही हो गई. वह समय उत्तर भारत तथा मराठों के इतिहास में युद्धों से भरा था जो सिलसिला 1761 में हुये इतिहास प्रसिद्ध पानीपत के युद्ध तक लगातार चलता रहा. दुर्भाग्य से ऐसे एक युद्ध में 1754 में राजस्थान में अहिल्याबाई के पति खाण्डेराव की मृत्यु हो गई. 1761 में मल्हारराव की भी मृत्यु हो गई. जिसके बाद अहिल्ल्याबाई के पुत्र को उनके संरक्षण में गद्दी पर बिठाया गया, लेकिन विधि के दुर्योग के कारण 1767 में उनके पुत्र की भी मृत्यु हो गई, जिसके बाद अहिल्याबाई को इंदौर की रानी के रूप में शासन के सभी सूत्र अपने हाथ में लेने पड़ें. 

जब रानी ने शासन सम्भाला तब पानीपत के युद्ध के कारण पुणे के पेशवा की स्थिति कमजोर थी. जिसका लाभ उठाकर उनके क्षत्रप गवालियर के सिंधिया, बड़ोदा के गायकवाड, नागपुर के भोसले आदि अपने-अपने प्रशासनिक अधिकार वाले क्षेत्र में शासन को हस्तगत कर रहें थें. इंदौर की होलकर महारानी अहिल्याबाई ने भी यह मार्ग चुना तथा अपने प्रांत को मजबूत करने में जुट गई.

अपने शासन के शुरूआती दौर में अहिल्याबाई को राज्य के पश्चिमी हिस्से ( निमाड़ ) से सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा था. इस क्षेत्र में आदिवसियों के उपद्रव व लूट का सामना करना पड़ रहा था, जिसे नियंत्रित करने के लिए होलकर सेना को कुछ युद्ध भी लड़ने पड़े, जिनमे से कईयों का नेतृत्व रानी ने स्वयं किया तथा शीघ्र ही इस क्षेत्र में अपनी प्रभुसत्ता को स्थापित किया. इस क्षेत्र पर नियंत्रण बना रहें इसलिए नर्मदा के किनारे बसे पौराणिक नगर महेश्वर में अपनी राजधानी को स्थापित किया. यहाँ नर्मदा के किनारे इनके द्वारा बनवाया गया सुंदर, सुदृढ़ किला आज भी इनका स्तुतिगान करता है, अनेक बोलीवुड फिल्मों में इस किले को फिल्माया गया है. हालांकि होलकर राजपरिवार इंदौर ही आधारित रहा लेकिन उन्होंने महेश्वर को शक्तिकेंद्र के रूप में विकसित किया तथा इंदौर को आर्थिक-व्यापारिक-औद्योगिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित किया. एक छोटे से गाँव से आज के विकसित इंदौर का सफर रानी की इसी दूरदृष्टि का परिणाम है.

अहिल्याबाई ने उस समय की रीति-नीति के विपरीत शक्ति में आते ही दो प्रमुख बदलाव किये. 

पहला उन्होंने सेना व प्रशासन को अलग-अलग करते हुए सभी सैन्य शक्तियाँ तुकोजी राव होलकर में निहित की जो कि उनके स्वसुर के विश्वसनीय थें हालाँकि सम्बन्धी नहीं थें तथा सभी प्रशासनिक कार्यों को अपने नियंत्रण में ले लिया. 

दूसरा, उन्होंने राज्य के राजस्व का उपयोग सत्ताधारी परिवार द्वारा उपयोग करने की परम्परा को बंद किया तथा उसे राज्य के विकास में लगाने के निर्णय किया. राजपरिवार के निजी खर्चे के लिए विरासत में मिली संपत्ति, चल-अचल सम्पत्ति से आने वाली आय का उपभोग करने के ली परम्परा विकसित की.ब्रिटिश रेजिस्टेंट जॉन मैल्कम ने अपने संस्मरण मध्य भारत में इन प्रशासनिक सुधारों का दस्तावेजीकरण किया है जो 1880 में उनकी मृत्यु के काफी समय बाद प्रकाशित हुए थे।

अहिल्याबाई ने अपने शासनकाल में कई बार असाधरण राजनीतिक कौशल तथा दृढ़ता का प्रदर्शन किया। 1772 में इन्होंने पेशवा को अंग्रेजों के साथ जाने पर सीधे शब्दों में चेतावनी दी, रोका। उस समय अंग्रेज पुणे में बने निर्वात का लाभ उठाने की मंशा से पेशवाई के दावेदारों को आपस में लड़ाने की नीति पर काम कर रहे थे, जिसे रानी ने चुनौती दी। इन्होंने मालवा के उत्तरी भाग में सत्ता संघर्ष में महादजी सिंधिया का समर्थन किया, जिससे पुणे में चल रही समस्याओं के बावजूद भी क्षेत्र में काफी हद तक राजनीतिक स्थिरता स्थापित हुई। अपने आठ-खंड के महाकाव्य मराठी रियासत के उत्तर विभव में, जी.एस. सरदेसाई ने वर्णन किया है कि कैसे नाना फडनीस ने एक से अधिक अवसरों पर अहिल्याबाई को पेंशन देने की कोशिश की, ताकि होल्कर क्षेत्र में तुकोजी एकमात्र प्रशासक हो सकें।  लेकिन अहिल्याबाई ने इन सभी प्रलोभनों बाद भी सार्वजनिक क्षेत्र को छोड़ने से इनकार कर दिया।

इतिहासकार ए वी राजवाडे ने अपनी पुस्तक मराठानचे इतिहासानची साधानेन में, उत्तर भारत में मराठों की असफलता (पेशवा के साथ प्रमुख शासक) का पता लगाया है, फिर उन्हें “हिंदुस्तान के रूप में संदर्भित किया गया है, जो व्यापक परिप्रेक्ष्य में महाराष्ट्र धर्म को निभाने में उनकी विफलता”  को इंगित करता है। राजवाडे ने कहा है कि यदि मराठों ने अहिल्याबाई का अनुकरण किया होता और उत्तर भारत मे विजय के बाद इनके प्रशासनिक सिद्धांतो को अपनाया होता तो हिंदुस्तान के लोगों ने उनके शासन को सहर्ष स्वीकार कर लिया होता।

 उस समय जब भारतवर्ष के अधिकांश राज्य राजस्व के लिये व्यापार और कृषि क्षेत्र पर निर्भर थे, अहिल्याबाई ने महेश्वर में बुनाई व वस्त्रों के निर्माण के उद्योग को बढ़ावा दिया। उस समय मुगलों के नियंत्रण वाले शहर बुराहनपुर, जो महेश्वर से अधिक दूर नहीं था हथकरघा उद्योग के लिये प्रसिद्ध था। लेकिन मुगलों के नियंत्रण में आने के बाद यहां के बुनकरों का एक वर्ग प्रभावित हो रहा था। अहिल्याबाई ने इनमें से कुछ बुनकरों को महेश्वर में स्थापित कर यहां हथकरघा उद्योग की नींव रखी। जिसका परिणाम यह है कि बुराहनपुर से जहां यह उद्योग अब विलुप्त सा हो गया है वही महेश्वरी साड़ियां अपने अलग पैटर्न व फेब्रिक के कारण विश्व मे आज अपनी अलग पहचान बना चुकी हैं तथा आज भी बेची जाती हैं।

अपने पूरे शासनकाल में अहिल्याबाई का सबसे बड़ा योगदान हिन्दू आस्था स्थलों के संरक्षण, संवर्धन, पुनर्निर्माण तथा नवीनीकरण में रहा। गंगोत्री से लेकर रामेश्वरम तक तथा द्वारका से लेकर गया तक, इन्होंने मुगलों द्वारा नष्ट किये गये विभिन्न मंदिरों का निर्माण करवाया तथा उनके पुरातन गौरव को पुनः बहाल किया। रानी ने भारतवर्ष की लगभग सभी प्रमुख पौराणिक महत्व की नदियों के किनारे मंदिरों तथा घाटों का निर्माण करवाया, जिससे आज भी लाखों तीर्थयात्री लाभान्वित होते हैं।

अहिल्याबाई द्वारा मंदिर स्थापत्य के संरक्षण की सूची अंतहीन है। उसमें सर्वाधिक प्रमुख वाराणसी का काशी विश्वनाथ मंदिर है। जिसे मुगल शासक औरंगजेब ने ज्ञानवापी मस्जिद के निर्माण हेतु नष्ट कर दिया था। इस मंदिर को अपने विनाश के 111 साल बाद 1780 में अहिल्याबाई ने अपने वर्तमान स्वरूप में पुनर्स्थापित किया। इन्होंने गंगा आरती के लिये प्रसिद्ध दशाश्वमेध घाट का नवीनीकरण करवाया जिसका पक्का निर्माण नाना साहेब पेशवा ने करवाया था तथा हिन्दू मान्यता में काल के स्थान के रूप में ख्यापित मणिकर्णिका घाट का भी जीर्णोद्धार करवाया जो पवित्र शमशान के रूप में जाना जाता है।

सदियों से इस्लामिक लुटेरों के आतंक के गवाह रहे सोमनाथ मंदिर को 1783 में मराठा संघ द्वारा पुनर्स्थापित किया गया, इसमें भी अहिल्याबाई का महत्वपूर्ण योगदान रहा। भीमाशंकर व त्रयम्बकेश्वर में भी रानी ने पुलों, सड़कों व अन्य जनोपयोगी सुविधाओं का निर्माण करवाया। केदारनाथ, श्रीशैलम, ओंकारेश्वर तथा उज्जैन में इन्होंने मंदिरों और विश्राम क्षेत्रों के साथ अन्य जनोपयोगी सुविधाओं का निर्माण करवाया। इन्होंने महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंग स्थलों तथा अन्य तीर्थ स्थलों पर सुविधाओं के सुधार में उल्लेखनीय योगदान दिया।

अहिल्याबाई द्वारा निर्मित आज भी जीवंत मंदिर संरचनाओं में अन्य महत्वपूर्ण स्थल है 1787 में निर्मित गया स्थित विष्णुपद मंदिर। इस मंदिर में भगवान विष्णु के 40 सेमी लंबे पदचिन्ह स्थापित है। पौराणिक कथा के अनुसार यहां भगवान विष्णु ने गयासुर का वध किया था, उस युद्ध मे उनके पादपद्दम के चिन्ह यहाँ बन गये थें। अहिल्याबाई ने स्वयं शैव होते हुये भी कई वैष्णव मंदिरों का निर्माण करवाया, जो सभी सम्प्रदायो तथा सनातन के प्रति उनकी निष्ठा का प्रतीक है। इन्होंने पुरी में रामचन्द्र मंदिर, रामेश्वरम में हनुमान मंदिर, अयोध्या में सरयू नदी के घाट, परली वैजनाथ में वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण करवाया, जो आज भी इनकी यशोगाथा का गान करते हैं। 

यह कहना उचित ही होगा कि आधुनिक युग मे किसी अन्य व्यक्ति ने अहिल्याबाई के समान हिन्दू आस्था स्थलों के नवीनीकरण, संरक्षण का कार्य नहीं किया है। आज अधिकांश मतावलम्बी जो अपने आस्था स्थलों का दर्शन कर पा रहे है, अपने धर्म व इतिहास के बारे में जान पा रहा है, गौरवांवित हो रहे हैं, उसका अधिकांश श्रेय अहिल्याबाई को ही जाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अधिकांश स्थलों पर कोई शिलालेख या सूचना पट्ट नहीं होने अथवा होने पर भी इनका नाम नहीं होने की वजह से अधिकांश हिन्दू समाज अहिल्याबाई से अपरिचित है। इसका कारण अहिल्याबाई की कार्यशैली भी रही है, इन्होंने यह सारे कार्य अपने राजनीतिक प्रभुत्व अथवा धन के प्रदर्शन हेतु नहीं करवाये अपितु समर्थ व धार्मिक होने के नाते धर्म के प्रति अपना स्वाभाविक कर्तव्य पूर्ण करने हेतु करवाये अतः अपने अथवा अपने वंश के नाम को इन्होंने महत्व नहीं दिया अपितु आस्था को सर्वोपरि रखते हुये व्यक्तिगत प्रसिद्धि से बची रही। ऐसी महान, धर्मनिष्ठ अहिल्याबाई की मृत्यु 1795 में 70 वर्ष की आयु में हुई। 

इतनी महान विरासत होने, इतिहास में अपने कार्यों से अमर होने के बावजूद भी भारतीय इतिहास में इन्हें पर्याप्त महत्व नहीं मिला। इतिहास की पुस्तकों तथा लोकप्रिय सन्दर्भ पुस्तकों में भी इनको उचित स्थान नहीं मिला। जिसका कारण शुरू से ही हमारी शिक्षा व इतिहास लेखन व्यवस्था में गैर-मुगल, गैर-ब्रिटिश व्यक्तित्वों का गौण अंकन करना रहा। लेकिन यह अच्छा है कि महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश का प्रबुद्ध वर्ग तथा कुछ संगठन अहिल्याबाई के जीवन पर काम कर रहे हैं, उनके गौरवशाली जीवन को सबके सामने लाने के लिये प्रयास रत है, इससे छोटे स्तर पर ही सही बदलाव तो हो रहा है।

एक स्कॉटिश कवि और नाटककार जोआना बेइली ने 1849 में अहिल्याबाई के बारे में कहा था –

“For thirty years her reign of peace,

The land in blessing did increase;

And she was blessed by every tongue,

By stern and gentle, old and young.

Yea, even the children at their mother’s feet

Are taught such homely rhyming to repeat

“In latter days from Brahma came,

To rule our land, a noble Dame,

Kind was her heart, and bright her fame,

And Ahlya was her honoured name.”

 माननीय, देवी अहिल्याबाई होलकर को लेकर ऐसा ही सम्मान व स्नेह आज भी मालवा-निमाड़ के लोगों में है। जो किसी इतिहास की किताब से इनके गौरवशाली कार्यों को शामिल करने पर निर्भर नहीं हैं। एक चरवाहे परिवार में जन्मी अहिल्याबाई ने जिस तरह अस्थिर व विकट समय मे तत्कालीन मानकों से ऊपर उठ कर शासन किया, आम जनमानस में अनन्तकाल के लिये स्थान बनाया, धर्मसेवा व सेवाधर्म में उम्र भर लिप्त रही, अनुकरणीय है। इस महान व्यक्तित्व को बारम्बार नमन। 

वरिष्ठ पत्रकार, बुद्धिजीवी, विश्लेषक श्री आशीष चन्दोरकर के मूल अंग्रेजी लेख का अनुवाद
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