
न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स साइबर अपराध के बदलते चेहरे में अब डिजिटल हिप्नोटिज्म यानी साइबर सम्मोहन एक नया और खतरनाक तरीका बनकर उभरा है। इस तकनीक के जरिए ठग भोले-भाले और तकनीक से अनजान खासकर बुजुर्ग व्यक्तियों को सम्मोहित करने जैसी स्थिति में उलझा देते हैं और फिर उनसे मोटी रकम ऐंठ लेते हैं। इस तकनीक के माध्यम से भोले-भाले, ठगी-अनजान, विशेषकर वृद्ध लोग, सम्मोहन जैसी मानसिक अवस्था में धकेले जाते हैं और फिर भारी झांसे में गिफ्ट कार्ड खरीदने या धन हस्तांतरण करने के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। वास्तविकता में परिवार के सदस्य या बैंक अधिकारी की नकली आवाज में वार्तालाप किया जाता है, जिससे पीड़ित भ्रमित होकर आवश्यक कदम उठाने लगते हैं। ऐसा ही मामला कैलिफोर्निया में सामने आया जब एक 96-वर्षीय महिला को इंटरनेट पॉप-अप द्वारा फँसाकर कई हजार डॉलर की ठगी का शिकार बनना पड़ा। डिजिटल हिप्नोटिज्म केवल आर्थिक हानि तक सीमित नहीं बल्कि यह बुजुर्गों के मानसिक और भावनात्मक शोषण का एक खतरनाक रूप है। भारत में सरकार की ओर से I4C, CFCFRMS और 1930 जैसी पहलों से कुछ हद तक राहत जरूर मिली है, लेकिन असली सुरक्षा तभी सुनिश्चित होगी जब जागरूकता, पारिवारिक सहयोग, डेटा सुरक्षा और तकनीकी उपायों को सामूहिक रूप से अपनाया जाए। यदि समाज, परिवार और सरकार मिलकर काम करें तो इस डिजिटल युग में सबसे कमजोर वर्ग यानी बुजुर्गों को सुरक्षित रखा जा सकता है।
इस तरह की घटनाएँ केवल तकनीकी धोखा नहीं बल्कि मानसिक शोषण का एक भयावह रूप हैं, जो बुजुर्गों को भावनात्मक रूप से तोड़ते हुए बड़ी आर्थिक हानि भी पहुंचाती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़े इस चिंता को और गहरा करते हैं। 2018 से 2022 के बीच साइबर अपराधों के मामलों में लगातार वृद्धि हुई है। 2018 में जहां 27,248 मामले दर्ज हुए थे, वहीं 2019 में यह बढ़कर 44,735, 2020 में 50,035, 2021 में 52,974 और 2022 में 65,893 तक पहुंच गए। यानी सिर्फ चार साल में मामलों की संख्या दोगुनी से ज्यादा हो गई। हालांकि बुजुर्गों के खिलाफ दर्ज मामलों का अलग से कोई आधिकारिक डेटा उपलब्ध नहीं है, लेकिन पुलिस और साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल हिप्नोटिज्म के शिकार अधिकतर वरिष्ठ नागरिक ही होते हैं।
संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार ‘पुलिस’ और ‘लोक व्यवस्था’ राज्य का विषय है, इसलिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की जिम्मेदारी है कि वे साइबर अपराधों से निपटें। लेकिन तेजी से बढ़ते मामलों के कारण केंद्र सरकार ने भी कई कदम उठाए हैं। गृह मंत्रालय ने “भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र” (I4C) की स्थापना की है, जो पूरे देश में साइबर अपराधों से निपटने के लिए एक प्रमुख तंत्र है। इसके तहत “राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल” शुरू किया गया है, जहां आम नागरिक ऑनलाइन शिकायत दर्ज करा सकते हैं। वित्तीय धोखाधड़ी को रोकने के लिए 2021 में “नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली” (CFCFRMS) भी लागू की गई। I4C के आंकड़ों के मुताबिक अब तक 17.82 लाख से ज्यादा शिकायतें दर्ज की गई हैं और 5,489 करोड़ रुपये से अधिक की राशि बचाई जा चुकी है। इसके अलावा हेल्पलाइन नंबर 1930 भी आम लोगों के लिए शुरू किया गया है, जिससे त्वरित सूचना पर कार्रवाई हो सके। I4C के साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर (CFMC) में प्रमुख बैंक, वित्तीय संस्थान, टेलीकॉम कंपनियां और कानून प्रवर्तन एजेंसियां एक साथ मिलकर काम कर रही हैं ताकि ठगों को पकड़ने में देरी न हो। सरकार के प्रयासों के तहत अब तक 9.42 लाख से ज्यादा सिम कार्ड और 2,63,348 IMEI नंबर ब्लॉक किए जा चुके हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तस्वीर बेहद चिंताजनक है। FBI IC3 रिपोर्ट (2024) के अनुसार केवल अमेरिका में साइबर धोखाधड़ी से 16.6 अरब डॉलर का नुकसान हुआ, जो पिछले वर्ष की तुलना में 33% अधिक है। इनमें से सबसे ज्यादा प्रभावित 60+ आयु वर्ग के लोग रहे। इस वर्ग से 1,47,127 शिकायतें दर्ज हुईं और 4.885 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। इसमें शिकायतों में 46% और आर्थिक हानि में 43% की वृद्धि देखी गई। टेक सपोर्ट स्कैम बुजुर्गों के लिए सबसे बड़ा खतरा बना जबकि निवेश धोखाधड़ी से सबसे ज्यादा यानी 1.2 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। 2023 में अकेले वृद्धों ने 3.4 अरब डॉलर से अधिक गँवाए। एक अध्ययन ने यह भी बताया कि डेटा की उपलब्धता के कारण 72% वृद्ध साइबर अपराधों का शिकार बन रहे हैं।
विभिन्न रिपोर्टें दिखाती हैं कि बेबी बूमर पीढ़ी (1946–64 के बीच जन्मे) ने फोन ठगी में ही 3.4 अरब डॉलर से ज्यादा गंवाए। टेक्सास जैसे राज्यों में वृद्धों को अकेले 490 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ, जबकि राष्ट्रव्यापी स्तर पर यह नुकसान 4.885 अरब डॉलर तक पहुँचा।
भारत में भी यही तस्वीर सामने आती है। आंध्र प्रदेश में बुजुर्गों पर साइबर ठगी के मामलों में 10% की हिस्सेदारी पाई गई। एक व्हाट्सएप निवेश स्कैम में एक व्यक्ति ने 5.25 करोड़ रुपये गँवा दिए और “डिजिटल गिरफ्तारी” नामक धोखाधड़ी के तहत एक वरिष्ठ नागरिक से 31 लाख रुपये की ठगी कर ली गई। पुलिस अधिकारियों का मानना है कि तकनीक की समझ की कमी, सामाजिक अलगाव और भरोसेमंद स्वभाव वृद्धों को आसान शिकार बना देता है।
तकनीकी प्रगति ने इस खतरे को और बढ़ा दिया है। अब ठग AI और डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल कर वृद्धों को फँसा रहे हैं। उन्हें वीडियो कॉल के जरिए परिवार के संकट का झूठा दृश्य दिखाया जाता है और भारी रकम की मांग की जाती है। शोधों में पाया गया है कि वृद्ध लोग विश्वसनीय रिश्तों की कमी और युवाओं से पारिवारिक सहयोग न मिलने की वजह से इस तरह के धोखे में और आसानी से फँस जाते हैं।इस समस्या का समाधान केवल तकनीकी उपायों से नहीं होगा। सबसे पहली आवश्यकता है जागरूकता की। बुजुर्गों को साइबर सुरक्षा के प्रति शिक्षित करना और उन्हें यह समझाना बेहद जरूरी है कि ऑनलाइन किसी भी संदेश, कॉल या ईमेल पर तुरंत विश्वास न करें। डेटा सुरक्षा भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि व्यक्तिगत जानकारी की ऑनलाइन उपलब्धता बड़े पैमाने पर ठगी को संभव बना देती है। तकनीकी निगरानी, ब्लॉकिंग सिस्टम और AI आधारित चेतावनी तंत्र को और मज़बूत बनाना होगा। कानूनी प्रक्रिया को सरल और त्वरित बनाना होगा ताकि एफआईआर दर्ज कराने और न्याय पाने में देरी न हो।अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी बेहद अहम है क्योंकि साइबर अपराधियों के नेटवर्क सीमाओं से परे काम करते हैं। अमेरिका और भारत जैसे देशों के बीच साइबर अपराधों पर सहयोग बढ़ाना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।