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Reading: यूपी में सवा करोड़ वोटरों के नाम कटने का संकट 75% हिंदू, योगी सरकार पर खतरे की घंटी
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INDIAMIX > राज्य > उत्तरप्रदेश > यूपी में सवा करोड़ वोटरों के नाम कटने का संकट 75% हिंदू, योगी सरकार पर खतरे की घंटी
उत्तरप्रदेश

यूपी में सवा करोड़ वोटरों के नाम कटने का संकट 75% हिंदू, योगी सरकार पर खतरे की घंटी

SANJAY SAXENA
Last updated: 31/01/2026 12:06 AM
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SANJAY SAXENA
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6 Min Read
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In Uttar Pradesh, 1.25 crore voters face the risk of having their names removed from the electoral rolls; 75% of them are Hindu.

इंडियामिक्स/लखनऊ उत्तर प्रदेश में चुनाव आयोग का मतदाता सूची का विशेष पुनरीक्षण अभियान तेजी से चल रहा है, लेकिन यह लाखों मतदाताओं के लिए संकट बन चुका है। जनवरी 2026 तक प्रदेश भर में करीब 1.25 करोड़ नाम कटने का खतरा मंडरा रहा है, जिनमें से 75 प्रतिशत हिंदू मतदाता हैं। लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, आगरा और प्रयागराज जैसे प्रमुख जिलों में 25 लाख से अधिक हिंदू मतदाताओं को नोटिस जारी हो चुकी हैं। निर्वाचन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, पिछले तीन महीनों में ही 8 लाख नाम कट चुके हैं, जिनमें 5.5 लाख हिंदू हैं। यह आंकड़ा न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा कर रहा है, बल्कि योगी आदित्यनाथ सरकार और भाजपा के लिए भविष्य की चुनावी रणनीति पर गंभीर संकट पैदा कर रहा है।

चुनाव आयोग की ओर से भेजी जा रही नोटिसों ने आम मतदाता, खासकर गरीब और वंचित वर्ग के लोगों में दहशत फैला दी है। नोटिस में नाम, पता, उम्र और अन्य विवरण सत्यापित करने के लिए कई प्रमाण-पत्र मांगे जा रहे हैं जैसे हाईस्कूल सर्टिफिकेट, स्थायी निवास प्रमाण-पत्र, बैंक पासबुक, जन्म प्रमाण-पत्र या जीवन बीमा पॉलिसी। लेकिन यूपी जैसे ग्रामीण-प्रधान राज्य में करोड़ों लोग इन दस्तावेजों से वंचित हैं। गरीब मजदूर, असंगठित क्षेत्र के कामगार, भूमिहीन किसान या झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले लोग तो हाईस्कूल की डिग्री के बारे में सोच भी नहीं सकते। स्थायी निवास प्रमाण-पत्र की मांग सबसे बड़ी समस्या है, क्योंकि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ऐसा कोई आधिकारिक प्रमाण-पत्र जारी ही नहीं किया जाता। अस्थायी राशन कार्ड या वोटर आईडी को ही पर्याप्त माना जाता रहा है, लेकिन अब चुनाव आयोग सख्ती बरत रहा है।

1980-90 के दशक में जन्मे या उससे पहले के मतदाताओं के लिए तो यह प्रक्रिया नामुमकिन है। उस दौर में स्थानीय निकाय, बैंक, डाकघर या एलआईसी जैसे संस्थानों से प्रमाण-पत्र लेना गरीबों के बस की बात नहीं थी। सामान्य वर्ग (हिंदू बहुसंख्यक) के लोगों के पास जाति प्रमाण-पत्र भी नहीं होता, जो अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए अनिवार्य होता है। नतीजा? नोटिस मिलते ही लोग दौड़-भाग में लग जाते हैं तहसील, ब्लॉक कार्यालय, स्कूलों के रिकॉर्ड खंगालते हैं। लेकिन कईयों के लिए यह असंभव साबित हो रहा है। मतदाता संगठनों का कहना है कि यह प्रक्रिया अन्यायपूर्ण है, क्योंकि यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को लक्षित कर रही है। यूपी में 80% से अधिक आबादी ग्रामीण है, जहां डिजिटल साक्षरता और दस्तावेजीकरण की कमी है।

सबसे दुखद पहलू हिंदू मतदाताओं का है। हिंदू समाज, जो खुद को देश का मूल निवासी मानता है, ने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन उसे ‘भारतीय होने का प्रमाण’ देना पड़ेगा। इसलिए उन्होंने कागजी सबूत जुटाने में कभी रुचि नहीं ली। इसके उलट, मुस्लिम समुदाय हमेशा सतर्क रहा है। 1990 के दशक से लेकर एनआरसी-सीएए विवाद तक, उन्हें डर सताता रहा कि कहीं बांग्लादेशी या पाकिस्तानी ठहराकर नागरिकता न छीन ली जाए। नतीजतन, उन्होंने जन्म प्रमाण-पत्र, पासपोर्ट, आधार कार्ड जैसे हर दस्तावेज को सहेजकर रखा। आंकड़ों में यही अंतर दिखता है विशेष पुनरीक्षण में हिंदू नामों पर 75% कटौती का खतरा, जबकि मुस्लिम नामों में केवल 22%। लखनऊ में ही 2 लाख हिंदू मतदाताओं को नोटिस मिली, जबकि मुस्लिम अनुपातिक रूप से कम प्रभावित। यह असंतुलन भाजपा के कोर वोट बैंक को सीधे निशाना बना रहा है।

योगी सरकार के लिए यह संकट गंभीर है। उत्तर प्रदेश भाजपा का गढ़ है, जहां 2022 विधानसभा चुनाव में हिंदू एकजुटता ने योगी को दोबारा सत्ता दिलाई। लेकिन अब सवा करोड़ हिंदू वोटरों का नाम कटना आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों में लाखों वोट खिसकने का कारण बन सकता है। पूर्वांचल, अवध और बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में हिंदू बहुल सीटें प्रभावित होंगी। विपक्ष सपा, बसपा और कांग्रेस इस मुद्दे को भुनाने का मौका ताड़ रहे हैं। वे इसे ‘हिंदू वोटरों का अपमान’ बता रहे हैं। यदि 1.25 करोड़ में से आधे नाम भी कट गए, तो भाजपा को 40-50 लाख वोटों का नुकसान हो सकता है। पिछले SSR में 2016 में भी 15 लाख नाम कटे थे, लेकिन तब हिंदू-मुस्लिम असंतुलन इतना स्पष्ट नहीं था। अब योगी सरकार की ‘शून्य सहनशीलता’ वाली छवि उल्टी पड़ रही है अपने ही वोटरों के मताधिकार पर सवाल।

सरकार को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए। बूथ लेवल ऑफिसर को और सक्रिय किया जाए, मोबाइल दस्तावेजीकरण वैन चलाई जाएं, गरीबों के लिए वैकल्पिक प्रमाण जैसे राशन कार्ड या परिवार रजिस्टर को मान्यता दी जाए। केंद्र सरकार से बात कर स्थायी निवास प्रमाण-पत्र की व्यवस्था हो। अन्यथा, यह लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करेगा। वंचित वर्ग के मताधिकार की रक्षा न हुई, तो योगी सरकार का भविष्य अधर में लटक जाएगा। हिंदू मतदाता नाराज हैं क्या भाजपा इसे सुधार पाएगी, या यह चुनावी हार का सबब बनेगा?


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