
न्यूज डेस्क/इंडियामिक्स संसद का मॉनसून सत्र शुरू हुआ, सदन में हंगामा हुआ, विपक्ष ने सरकार को घेरने की कोशिश की, लेकिन असली राजनीतिक कहानी सदन के भीतर नहीं बल्कि संसद भवन के एक बंद कमरे में लिखी जा रही थी। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी की करीब घंटे भर की मुलाकात ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में अचानक हलचल पैदा कर दी है। आधिकारिक तौर पर इसे सामान्य मुलाकात बताया जा रहा है, लेकिन राजनीति में समय, जगह और साथ मौजूद चेहरों का अपना अर्थ होता है। और इस मुलाकात का अर्थ साफ है 2027 का चुनाव अब दूर नहीं रहा और कांग्रेस-सपा गठबंधन के भीतर युद्ध की तैयारी शुरू हो चुकी है।अखिलेश यादव से जब मुलाकात पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि सदन स्थगित होने पर लोग स्वाभाविक रूप से मिलते हैं। जवाब बेहद सामान्य था, लेकिन मुलाकात की पृष्ठभूमि बिल्कुल सामान्य नहीं थी। सदन में पेपर लीक और अयोध्या से जुड़े चढ़ावे के विवाद पर हंगामा हुआ। समाजवादी पार्टी के कई सांसद छात्रों के प्रदर्शन में शामिल होने चले गए। इसी दौरान अखिलेश यादव और अयोध्या के सांसद अवधेश प्रसाद राहुल गांधी के कमरे की तरफ पहुंचे। अवधेश प्रसाद बैठक में शामिल नहीं हुए, लेकिन बाद में उनका यह कहना कि कई बातें रणनीति का हिस्सा होती हैं और उन्हें सार्वजनिक करना ठीक नहीं, इस मुलाकात के रहस्य को और गहरा कर गया।सवाल यह है कि बंद कमरे में आखिर ऐसी कौन-सी रणनीति पर चर्चा हुई, जिसे बाहर बताने से दोनों दल बच रहे हैं? सबसे पहला मुद्दा निश्चित तौर पर गठबंधन के भीतर बढ़ती बयानबाजी का रहा होगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश ने भाजपा को बड़ा झटका दिया। 80 सीटों वाले राज्य में समाजवादी पार्टी ने 37 और कांग्रेस ने 6 सीटें जीतीं। दोनों दलों की संयुक्त संख्या 43 रही। यही आंकड़ा अब कांग्रेस और सपा के बीच ताकत की रस्साकशी का आधार बन गया है।कांग्रेस कहती है कि राहुल गांधी के नेतृत्व, संविधान और सामाजिक न्याय के मुद्दे ने विपक्ष को नई ताकत दी। समाजवादी पार्टी कहती है कि उत्तर प्रदेश की जमीन पर संगठन उसका था, बूथ उसका था और सामाजिक समीकरण उसका था। यानी जीत का श्रेय लेने की लड़ाई अब सिर्फ अतीत की बहस नहीं रही। यह सीधे 2027 के टिकट और सीटों के बंटवारे से जुड़ चुकी है।
सहारनपुर के कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने जब 2024 की सफलता का बड़ा श्रेय राहुल गांधी को दिया तो समाजवादी पार्टी के नेताओं का पारा चढ़ गया। सपा नेताओं ने कांग्रेस को उसके पुराने चुनावी प्रदर्शन की याद दिलाई और कहा कि उत्तर प्रदेश में अकेले लड़ने पर कांग्रेस की स्थिति क्या रही है, यह किसी से छिपा नहीं है। कांग्रेस की तरफ से जवाब आया कि राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी राजनीति को राहुल गांधी ने मजबूती दी। अब सवाल यह है कि राहुल गांधी और अखिलेश यादव अपने नेताओं को रोकेंगे या नहीं।क्योंकि गठबंधन की सबसे बड़ी दुश्मनी विपक्षी दल नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर चल रही सार्वजनिक बयानबाजी बनती जा रही है। एक नेता कहता है कि जीत हमारी वजह से हुई, दूसरा कहता है कि तुम्हारी जमीन पर कोई संगठन नहीं है। ऐसे बयान कार्यकर्ताओं के बीच अविश्वास पैदा करते हैं। इसलिए संभव है कि बैठक में राहुल और अखिलेश ने एक-दूसरे से साफ कहा हो अपने नेताओं को संभालिए, वरना 2027 की लड़ाई शुरू होने से पहले ही गठबंधन कमजोर हो जाएगा।लेकिन असली विस्फोटक मुद्दा सीट बंटवारा है। कांग्रेस के भीतर से उत्तर प्रदेश में ज्यादा सीटों की मांग उठ रही है। तर्क यह है कि कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है और उसे गठबंधन में बराबर सम्मान मिलना चाहिए। समाजवादी पार्टी का जवाब सीधा है सम्मान सिर्फ पार्टी के नाम से नहीं, जमीन पर ताकत से मिलता है। 2024 के लोकसभा चुनाव में जब सपा ने कांग्रेस से कई गुना ज्यादा सीटें जीतीं, तब 2027 में बराबरी की मांग किस आधार पर होगी?यही वह सवाल है जो दोनों दलों के रिश्ते में सबसे बड़ा तनाव पैदा कर सकता है। कांग्रेस अगर अभी से सीटों की मांग को सार्वजनिक अभियान बना देती है तो अखिलेश यादव के लिए उसे स्वीकार करना मुश्किल होगा। सपा जानती है कि उत्तर प्रदेश में उसका संगठन कांग्रेस से कहीं बड़ा है। कांग्रेस भी जानती है कि बिना सपा के उसका प्रभाव सीमित है। यानी दोनों को एक-दूसरे की जरूरत है, लेकिन दोनों एक-दूसरे पर निर्भर दिखना नहीं चाहते।
यही कारण है कि राहुल-अखिलेश की मुलाकात में शायद एक बात पर सहमति बनाने की कोशिश हुई होगी सीट बंटवारे पर सार्वजनिक बयानबाजी बंद। वरना चुनाव से पहले ही कांग्रेस और सपा के कार्यकर्ता एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाएंगे। गठबंधन का गणित बंद कमरे में तय होगा, मंचों पर नहीं।इसके बाद आता है अखिलेश यादव का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार पीडीए। पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। अखिलेश यादव ने 2024 में इसी सामाजिक समीकरण को भाजपा के खिलाफ खड़ा किया। राहुल गांधी भी जातिगत जनगणना, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय को अपनी राजनीति के केंद्र में ला चुके हैं। दोनों नेताओं के मुद्दे मिलते हैं, लेकिन सवाल यह है कि क्या दोनों की राजनीतिक मशीनरी भी साथ चल सकती है?पीडीए का नारा लगाना आसान है, लेकिन टिकट बांटते समय सामाजिक संतुलन बनाना बेहद कठिन। किस सीट पर सपा लड़ेगी, किस सीट पर कांग्रेस? किस सामाजिक वर्ग को टिकट मिलेगा? कौन-सा नेता किस क्षेत्र में प्रचार करेगा? अगर कांग्रेस और सपा इन सवालों का जवाब नहीं खोज पाईं तो पीडीए का राजनीतिक नारा सिर्फ भाषणों तक सीमित रह जाएगा।प्रियंका गांधी की मौजूदगी ने भी कई सवाल खड़े किए हैं। क्या कांग्रेस 2027 में उन्हें उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी कर रही है? प्रियंका गांधी के पास उत्तर प्रदेश का राजनीतिक अनुभव है। राहुल गांधी राष्ट्रीय मुद्दों पर भाजपा को घेर सकते हैं, अखिलेश यादव संगठन और सामाजिक समीकरण संभाल सकते हैं और प्रियंका गांधी महिला तथा युवा मतदाताओं के बीच कांग्रेस की पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर सकती हैं। अगर यह रणनीति बनी तो उत्तर प्रदेश में विपक्ष का चुनावी चेहरा तीन स्तरों पर दिखाई देगा।युवाओं का मुद्दा भी निर्णायक हो सकता है। पेपर लीक, भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी और रोजगार का संकट लाखों युवाओं के भविष्य से जुड़ा है। राहुल गांधी इस मुद्दे पर लगातार सरकार को घेरते रहे हैं। समाजवादी पार्टी भी भर्ती और रोजगार के सवाल पर सरकार के खिलाफ आक्रामक रही है। अगर दोनों दल इस मुद्दे को साझा अभियान बना देते हैं तो 2027 में यह भाजपा के खिलाफ सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन सकता है।
अयोध्या का मुद्दा भी विपक्ष की रणनीति में नया मोर्चा खोल सकता है। चढ़ावे से जुड़े विवाद पर अखिलेश यादव सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। राहुल गांधी अब तक इस मुद्दे पर उतने मुखर नहीं रहे। ऐसे में दोनों नेताओं के बीच यह चर्चा संभव है कि धार्मिक आस्था से टकराए बिना प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल कैसे उठाया जाए।लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस और सपा अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगा पाएंगी? 2024 में 43 लोकसभा सीटों की जीत ने विपक्ष को उम्मीद दी। मगर 2027 में विधानसभा की 403 सीटें होंगी। यहां सिर्फ राष्ट्रीय चेहरा नहीं चलेगा। बूथ, जातीय समीकरण, स्थानीय उम्मीदवार और संगठन निर्णायक होंगे।राहुल गांधी और अखिलेश यादव जानते हैं कि भाजपा को चुनौती देने के लिए साथ रहना जरूरी है। लेकिन दोनों यह भी जानते हैं कि गठबंधन में बराबरी का दावा करने वाला कांग्रेस नेतृत्व और उत्तर प्रदेश में अपनी जमीन छोड़ने को तैयार नहीं समाजवादी नेतृत्व, लंबे समय तक आसानी से साथ नहीं चलेंगे।इसलिए संसद भवन की यह बैठक सिर्फ एक मुलाकात नहीं थी। यह 2027 की पहली बड़ी राजनीतिक चेतावनी थी। कांग्रेस को तय करना होगा कि वह उत्तर प्रदेश में अपनी वास्तविक ताकत के हिसाब से सीट मांगेगी या राष्ट्रीय हैसियत के आधार पर। अखिलेश यादव को तय करना होगा कि वह कांग्रेस को कितनी जगह देंगे और राहुल गांधी को तय करना होगा कि वह अपने नेताओं की सार्वजनिक महत्वाकांक्षाओं पर कितना नियंत्रण रख सकते हैं। क्योंकि 2027 में असली मुकाबला सिर्फ भाजपा और विपक्ष के बीच नहीं होगा। असली मुकाबला विपक्ष के भीतर भी होगा कौन नेतृत्व करेगा, कौन झुकेगा, कौन सीट छोड़ेगा और कौन अपने दावे पर अड़ेगा। राहुल-अखिलेश की बंद कमरे की बैठक ने इसी बड़े सियासी संघर्ष का पहला संकेत दे दिया है।
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