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Reading: महिला आरक्षण के समर्थन में योगी का संगी साथियों के साथ  पैदल मार्च
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INDIAMIX > राज्य > उत्तरप्रदेश > महिला आरक्षण के समर्थन में योगी का संगी साथियों के साथ  पैदल मार्च
उत्तरप्रदेशराजनीति

महिला आरक्षण के समर्थन में योगी का संगी साथियों के साथ  पैदल मार्च

SANJAY SAXENA
Last updated: 21/04/2026 4:55 PM
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SANJAY SAXENA
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9 Min Read
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Yogi leads a foot march in support of women's reservation, accompanied by his associates.

न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ की सड़क पर आज गजब नजारा देखने को मिला जब प्रदेश की योगी सरकार पैदल मार्च करते हुए नजर आई। भारतीय राजनीति में आमतौर पर विरोध का अधिकार विपक्ष के हिस्से में आता है। सरकारें फैसले लेती हैं और विपक्ष सड़कों पर उतरकर उनका विरोध करता है। लेकिन राजधानी लखनऊ में जो दृश्य देखने को मिला, उसने इस परंपरा को उलट दिया। सत्ता पक्ष खुद सड़क पर उतरा और निशाने पर विपक्ष रहा। महिला आरक्षण के मुद्दे पर निकली ‘जन आक्रोश महिला पदयात्रा’ ने साफ संकेत दे दिया कि आने वाले समय में यह मुद्दा सिर्फ संसद या विधानसभाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सड़कों से लेकर गांव-गांव तक राजनीतिक बहस का केंद्र बनेगा। मंगलवार को राजधानी की सड़कों पर उस समय असामान्य हलचल दिखाई दी, जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में हजारों महिलाएं और पार्टी कार्यकर्ता पैदल मार्च करते नजर आए। यह पदयात्रा मुख्यमंत्री आवास से शुरू होकर विधानसभा तक पहुंची। करीब दो किलोमीटर लंबे इस मार्च में प्रशासनिक अनुमान के मुताबिक 15 हजार से अधिक महिलाओं की भागीदारी दर्ज की गई। तेज धूप और गर्म हवाओं के बावजूद महिलाओं की मौजूदगी ने इसे सामान्य राजनीतिक कार्यक्रम से कहीं ज्यादा बड़ा शक्ति प्रदर्शन बना दिया।

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इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि संसद में महिला आरक्षण से जुड़े विधेयक को लेकर बने गतिरोध से जुड़ी है। महिलाओं को संसद और विधानसभाओं में एक-तिहाई आरक्षण देने के उद्देश्य से लाया गया संशोधन विधेयक बहुमत के बावजूद आवश्यक दो-तिहाई समर्थन हासिल नहीं कर सका। उपलब्ध संसदीय आंकड़ों के अनुसार इस विधेयक के पक्ष में लगभग 298 सांसदों ने मतदान किया, जबकि 230 सांसदों ने विरोध किया। लेकिन संवैधानिक संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत पूरा नहीं होने से यह विधेयक पारित नहीं हो पाया। इसी घटनाक्रम के बाद सत्ता पक्ष ने इसे महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनाकर जनता के बीच ले जाने की रणनीति अपनाई।लखनऊ में निकली इस पदयात्रा में मुख्यमंत्री के साथ दोनों उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक और केशव प्रसाद मौर्य के अलावा प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी समेत कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। सिर पर गमछा बांधे मुख्यमंत्री का पैदल चलना एक प्रतीकात्मक संदेश की तरह देखा गया। इससे यह संकेत देने की कोशिश रही कि सरकार इस मुद्दे को लेकर केवल बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि इसे जन आंदोलन का स्वरूप देना चाहती है।

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या इस पूरे अभियान की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। पिछले एक दशक में कई राज्यों के चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर या कई जगहों पर उससे अधिक रही है। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में महिला मतदाताओं की संख्या करोड़ों में है और कई विधानसभा क्षेत्रों में उनकी भूमिका निर्णायक साबित होती रही है। ऐसे में महिला आरक्षण का मुद्दा सीधे तौर पर चुनावी गणित को प्रभावित कर सकता है।पदयात्रा के दौरान नेताओं के भाषणों में विपक्षी दलों पर तीखे हमले देखने को मिले। पंकज चौधरी ने अपने संबोधन में कहा कि कुछ दल वोट बैंक की राजनीति के कारण महिलाओं के अधिकारों के मुद्दे पर पीछे हट गए। उनका कहना था कि राजनीतिक समीकरणों के चलते महिलाओं के अधिकारों की अनदेखी की गई। वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विपक्ष को अलोकतांत्रिक बताते हुए कहा कि जो दल महिलाओं के अधिकारों के सवाल पर विरोध करते हैं, वे आधी आबादी के हितों के खिलाफ खड़े दिखाई देते हैं।

इस पूरे आयोजन का एक अहम पहलू यह भी रहा कि इसे केवल एक दिन के कार्यक्रम तक सीमित नहीं रखने की बात कही गई। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट संकेत दिया कि इस आक्रोश को बूथ स्तर तक अभियान के रूप में आगे बढ़ाया जाएगा। इसका मतलब यह है कि आने वाले समय में ब्लॉक, मंडल और जिला स्तर पर इसी तरह के कार्यक्रमों की श्रृंखला देखने को मिल सकती है। यह रणनीति सीधे तौर पर संगठनात्मक मजबूती और जनसंपर्क दोनों को साधने की दिशा में उठाया गया कदम मानी जा रही है।महिला आरक्षण को ‘आधी आबादी का अधिकार’ बनाकर पेश करने की योजना भी इस अभियान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी मुद्दे को व्यापक समर्थन दिलाने के लिए उसे भावनात्मक और सामाजिक स्तर पर स्थापित करना जरूरी होता है। महिला आरक्षण के साथ ‘आधी आबादी’ का नारा जोड़कर इसे अधिकार और सम्मान के सवाल के रूप में पेश करने की कोशिश दिखाई दे रही है।

इस पदयात्रा का एक सामाजिक पक्ष भी है। पिछले कुछ वर्षों में महिलाओं से जुड़ी योजनाओं को लेकर लगातार प्रचार किया जाता रहा है। उज्ज्वला योजना, शौचालय निर्माण, मातृत्व सहायता और आवास योजनाओं जैसे कार्यक्रमों का सीधा संबंध महिलाओं से जोड़ा गया है। अब महिला आरक्षण के मुद्दे को इन योजनाओं के साथ जोड़कर एक व्यापक सामाजिक संदेश देने की रणनीति बनती दिख रही है। इससे यह धारणा बनाने की कोशिश है कि महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में कई स्तरों पर एक साथ काम किया जा रहा है।विपक्ष के लिए यह स्थिति चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। महिला आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर विरोध या समर्थन की राजनीति जनता के बीच सीधी प्रतिक्रिया पैदा करती है। यदि सत्ता पक्ष इसे लगातार जन आंदोलन का रूप देता है, तो विपक्ष को भी अपनी रणनीति स्पष्ट करनी पड़ेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले महीनों में इस मुद्दे पर बयानबाजी और कार्यक्रमों की संख्या बढ़ सकती है।

लखनऊ की इस पदयात्रा ने यह भी दिखाया कि राजनीति अब केवल संसद और विधानसभाओं की बहस तक सीमित नहीं रह गई है। अब हर बड़ा मुद्दा सड़क पर उतरकर जनता के बीच ले जाया जा रहा है। इससे एक तरफ राजनीतिक सक्रियता बढ़ती है, तो दूसरी तरफ जनमत को प्रभावित करने का नया तरीका भी सामने आता है। महिला आरक्षण के मुद्दे पर निकली यह पदयात्रा इसी नई राजनीतिक शैली का उदाहरण मानी जा रही है।आंकड़ों के लिहाज से देखें तो 15 हजार से अधिक महिलाओं की मौजूदगी किसी भी राजनीतिक कार्यक्रम के लिए बड़ा संकेत होती है। यह संख्या केवल संगठनात्मक ताकत ही नहीं दिखाती, बल्कि यह भी बताती है कि किसी मुद्दे को लेकर किस स्तर तक लोगों को जोड़ा जा सकता है। यदि इसी तरह की भागीदारी अन्य जिलों में भी देखने को मिलती है, तो यह अभियान लंबे समय तक प्रभाव डाल सकता है। अंततः इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि महिला आरक्षण अब केवल विधायी प्रक्रिया का विषय नहीं रह गया है। यह एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन चुका है, जिसके जरिए सत्ता और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी रणनीति को मजबूत करने की कोशिश करेंगे। लखनऊ की सड़कों पर उतरा यह आक्रोश आने वाले दिनों में किस दिशा में जाएगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि ‘आधी आबादी’ का सवाल अब राजनीति के केंद्र में मजबूती से स्थापित हो चुका है।

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