
न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स नेपाल की राजनीति इस समय बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। इस बदलाव से उसके चीन और भारत जैसे पड़ोसी नाराज होते हैं तो इसकी चिंता नेपाल को शायद नहीं है। नेपाल पूरी तरह से नेशन फर्स्ट पर चल रहा है। काठमांडू की सत्ता अब पहले की तरह भारत पर आर्थिक और राजनीतिक रूप से निर्भर रहने के पक्ष में नहीं दिखती। प्रधानमंत्री बालेन शाह की सरकार लगातार ऐसे फैसले ले रही है जिनसे यह साफ संकेत जाता है कि नेपाल अब ‘नेपाल प्रथम’ की नीति पर आगे बढ़ना चाहता है। यही वजह है कि व्यापार, सीमा, कस्टम ड्यूटी और चीन के साथ रिश्तों जैसे मुद्दे अब नेपाल की घरेलू राजनीति और राष्ट्रवाद का हिस्सा बन चुके हैं। भारत के लिए चिंता केवल नेपाल के कुछ फैसले नहीं हैं, बल्कि वहां तेजी से बदलती राजनीतिक सोच है। नेपाल और भारत के बीच करीब 1850 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है। दोनों देशों के नागरिक बिना वीजा और पासपोर्ट के आवाजाही करते हैं। अनुमान है कि हर दिन 50 हजार से ज्यादा लोग रोजगार, व्यापार, शिक्षा और पारिवारिक कारणों से सीमा पार करते हैं। नेपाल के कुल विदेशी व्यापार का लगभग 64 प्रतिशत हिस्सा भारत के साथ होता है। 2025-26 में दोनों देशों के बीच व्यापार करीब 13 अरब डॉलर तक पहुंच गया। लेकिन इसमें सबसे बड़ा असंतुलन यह है कि नेपाल ने भारत से करीब 11 अरब डॉलर का सामान आयात किया, जबकि उसका निर्यात केवल 2 अरब डॉलर के आसपास रहा। यही लगभग 9 अरब डॉलर का व्यापार घाटा अब नेपाल की नई राष्ट्रवादी राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है।
नेपाल के उद्योग परिसंघ और आर्थिक विशेषज्ञों का एक वर्ग लगातार यह दावा करता रहा है कि भारतीय बाजार से आने वाले सस्ते उत्पादों ने नेपाली उद्योगों को कमजोर कर दिया। कपड़ा उद्योग, कृषि आधारित कारोबार और छोटे विनिर्माण क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। इसी सोच के तहत बालेन शाह सरकार ने भारत से नेपाल लाए जाने वाले 100 नेपाली रुपये से अधिक कीमत के सामान पर कस्टम ड्यूटी लगाने का फैसला किया। सरकार का कहना था कि इससे घरेलू उद्योगों को संरक्षण मिलेगा और स्थानीय उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा। लेकिन इस फैसले का असर सीधे सीमा क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाला था। वीरगंज, विराटनगर, नेपालगंज और भैरहवा जैसे शहरों में हजारों छोटे व्यापारी भारतीय बाजारों से राशन, कपड़े, दवाइयां और घरेलू सामान खरीदकर नेपाल ले जाते हैं। व्यापारियों का अनुमान था कि नई ड्यूटी व्यवस्था लागू होने के बाद रोजमर्रा के सामानों की कीमतों में 15 से 20 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो सकती थी। नेपाल पहले ही महंगाई और बेरोजगारी के दबाव से जूझ रहा है। विश्व बैंक के अनुसार नेपाल में युवा बेरोजगारी दर 20 प्रतिशत से ऊपर है। ऐसे में यह फैसला आम लोगों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ाने वाला माना गया।
नेपाल के भीतर इस फैसले का विरोध शुरू हो गया। व्यापारी संगठनों और सीमा-पार कारोबारियों ने इसे अव्यावहारिक बताया। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और अदालत ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए टैक्स वसूली पर रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि सरकार को सीमा क्षेत्रों की सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखना होगा। अदालत के इस हस्तक्षेप ने साफ कर दिया कि नेपाल में राष्ट्रवादी राजनीति तेजी से बढ़ रही है, लेकिन उसकी सीमाएं अब भी संवैधानिक संस्थाएं तय कर रही हैं। दरअसल नेपाल में भारत को लेकर असहजता कोई नई बात नहीं है। 2015 में नेपाल के नए संविधान को लेकर पैदा हुए विवाद और उसके बाद सीमा पर आपूर्ति बाधित होने की घटनाओं ने भारत-विरोधी भावना को गहरा किया। उस समय नेपाल में पेट्रोल, गैस और दवाइयों की भारी कमी हो गई थी। नेपाल के भीतर बड़ी संख्या में लोग आज भी मानते हैं कि उस दौर में भारत ने दबाव की राजनीति अपनाई थी। उसी समय के बाद ‘आर्थिक आत्मनिर्भरता’ और ‘राष्ट्रीय सम्मान’ जैसे मुद्दे तेजी से लोकप्रिय हुए।
बालेन शाह ने इसी भावना को राजनीतिक ताकत में बदला। नेपाल की लगभग 42 प्रतिशत आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है और यही युवा वर्ग सोशल मीडिया आधारित राष्ट्रवादी राजनीति से तेजी से प्रभावित हो रहा है। नेपाल में भारत के साथ आर्थिक निर्भरता कम करने और ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ की मांग लगातार बढ़ रही है। कई राष्ट्रवादी समूह भारत के साथ सीमा नियंत्रण सख्त करने की बात भी खुले तौर पर कर रहे हैं। हालांकि नेपाल केवल भारत से दूरी बनाकर चीन के करीब जाता हुआ भी नहीं दिखना चाहता। चीन की बेल्ट एंड रोड परियोजना के तहत नेपाल में सड़क, रेलवे और ऊर्जा परियोजनाओं में लगभग 8 अरब डॉलर तक के निवेश प्रस्तावित हैं। लेकिन नेपाल सरकार अब इन परियोजनाओं की लागत और ऋण शर्तों की समीक्षा कर रही है। काठमांडू में यह डर मौजूद है कि अत्यधिक चीनी कर्ज नेपाल को आर्थिक रूप से कमजोर कर सकता है। इसके बावजूद चीन का प्रभाव तेजी से बढ़ा है। इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों और मशीनरी के क्षेत्र में चीन नेपाल का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन चुका है।
दूसरी तरफ नेपाल यह भी समझता है कि भारत से पूरी दूरी बनाना उसके लिए संभव नहीं। नेपाल की पेट्रोलियम जरूरतों का लगभग पूरा हिस्सा भारत से आता है। समुद्री व्यापार के लिए नेपाल पूरी तरह भारतीय बंदरगाहों पर निर्भर है। नेपाल के लाखों नागरिक रोजगार के लिए भारत आते-जाते हैं। दोनों देशों के बीच पारिवारिक और सांस्कृतिक रिश्ते इतने गहरे हैं कि उन्हें केवल राजनीतिक फैसलों से खत्म नहीं किया जा सकता। दिल्ली भी इस बदलते नेपाल को लेकर सतर्क है। भारत समझता है कि केवल ऐतिहासिक रिश्तों के भरोसे अब नेपाल में अपना प्रभाव बनाए रखना आसान नहीं होगा। यही कारण है कि हाल के वर्षों में भारत ने नेपाल में रेलवे, पेट्रोलियम पाइपलाइन, बिजली ट्रांसमिशन और डिजिटल कनेक्टिविटी परियोजनाओं पर तेजी से निवेश बढ़ाया है। नेपाल ने 2025-26 में भारत को लगभग 1000 मेगावाट बिजली निर्यात की, जिससे उसे करीब 15 अरब नेपाली रुपये की आय हुई। फिलहाल नेपाल की राजनीति ऐसे दौर में पहुंच चुकी है जहां राष्ट्रवाद सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन गया है। लेकिन आने वाले समय में सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या ‘नेपाल प्रथम’ की यह नीति नेपाल को आर्थिक रूप से मजबूत बना पाएगी या फिर भारत जैसे सबसे बड़े साझेदार से लगातार बढ़ता तनाव उसकी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ेगा। क्योंकि भूगोल और इतिहास की सच्चाई यही है कि भारत और नेपाल चाहे जितनी राजनीतिक दूरी बनाने की कोशिश करें, दोनों देशों का भविष्य अब भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है।
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