
न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स दीपावली के महापर्व के दौरान जहां पूरा देश माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा में लीन होता है, वहीं कायस्थ समाज के लिए यह समय एक और अत्यंत महत्वपूर्ण और पावन उत्सव का होता है। दीपावली के ठीक दो दिन बाद, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि (भाई दूज या यम द्वितीया) को कायस्थ समाज के लोग अपने कुलदेवता भगवान श्री चित्रगुप्त महाराज की जयंती मनाते हैं। इसे पारंपरिक रूप से कलम-दवात पूजा या चित्रगुप्त पूजा भी कहा जाता है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि कायस्थ संस्कृति, बौद्धिक विरासत और कर्म के प्रति अगाध श्रद्धा का प्रतीक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि के रचयिता भगवान ब्रह्मा ने जब देव, दानव, गंधर्व, पुरुष और स्त्रियों की रचना की, तो वे जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखने की व्यवस्था को लेकर चिंतित हुए। उन्होंने एक ऐसे सहयोगी की आवश्यकता महसूस की जो अत्यंत बुद्धिमान हो और ब्रह्मांड के हर जीव के पाप और पुण्य का सटीक हिसाब रख सके। इस कार्य के लिए ब्रह्मा जी ग्यारह हजार वर्षों तक गहरी समाधि में चले गए। जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो उन्होंने अपने सामने हाथ में कलम, दवात, पुस्तक और तलवार लिए एक परम तेजस्वी पुरुष को खड़े देखा। चूंकि इन महापुरुष की उत्पत्ति ब्रह्मा जी की काया (शरीर) से गुप्त रूप से हुई थी, इसलिए ब्रह्मा जी ने उनका नाम कायस्थ रखा और उन्हें चित्रगुप्त की उपाधि दी। ब्रह्मा जी ने उन्हें आज्ञा दी कि वे धर्मराज (यमराज) के दरबार में मनुष्यों के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब रखें। इस प्रकार, श्री चित्रगुप्त जी कायस्थ समाज के मूल पुरुष और कुलदेवता कहलाए।
देश के विभिन्न हिस्सों में चित्रगुप्त पूजा को बेहद श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन कायस्थ परिवारों में एक विशेष अनुष्ठान होता है, जिसे कलम-दवात पूजा कहते हैं। इस दिन कायस्थ समाज के लोग अपनी लेखनी-दवात और नए बही-खातों या कॉपियों की पूजा करते हैं। व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में नए बही-खाते श्री चित्रगुप्त जी को समर्पित किए जाते हैं। चित्रगुप्त का चित्र और प्रतीक: पूजा की चौकी पर श्री चित्रगुप्त जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित किया जाता है। उनके समक्ष एक कोरा कागज रखा जाता है, जिस पर घी और सिंदूर का तिलक लगाया जाता है। इस कोरे कागज पर परिवार के सभी सदस्य अपनी आय-व्यय का विवरण लिखते हैं और साथ ही अपनी साक्षरता व ज्ञान के प्रतीक स्वरूप ॐ श्री चित्रगुप्त नमः मंत्र या मंत्रोच्चार लिखते हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि हम अपने कर्मों को भगवान के सामने पारदर्शी रख रहे हैं। कायस्थ परंपरा के अनुसार, इस दिन कायस्थ समाज के लोग लिखने-पढ़ने का काम नहीं करते हैं। पूजा के बाद ही कलम को हाथ लगाया जाता है, जिसे भगवान का आशीर्वाद माना जाता है। भगवान चित्रगुप्त को ब्रह्मांड का प्रथम अकाउंटेंट या न्यायाधीश माना जा सकता है। उनकी पूजा हमें याद दिलाती है कि हमारे द्वारा किया गया हर छोटा-बड़ा कर्म रिकॉर्ड हो रहा है। यह पर्व समाज को ईमानदारी, न्याय और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। दुनिया के अधिकांश त्योहारों में धन, शक्ति या शस्त्र की पूजा होती है, लेकिन चित्रगुप्त पूजा एकमात्र ऐसा पर्व है जहां बुद्धि, शिक्षा और लेखनी (कलम) की पूजा होती है। कायस्थ समाज हमेशा से अपनी उच्च शिक्षा, प्रशासनिक कुशलताओं और बौद्धिक क्षमता के लिए जाना जाता रहा है। यह पर्व उनकी इसी थाती को सम्मान देता है। आज के आधुनिक युग में, जब डेटा प्रबंधन, गवर्नेंस और इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी का महत्व बढ़ गया है, श्री चित्रगुप्त जी की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। वे ब्रह्मांड के पहले डेटा साइंटिस्ट हैं जिन्होंने बिना किसी कंप्यूटर के अरबों जीवों का लेखा-जोखा रखा। कायस्थ समाज आज भी कला, साहित्य, न्यायपालिका, सिविल सर्विसेज और तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। दीपावली के दीयों की रोशनी के बीच आने वाली यह जयंती हर कायस्थ को याद दिलाती है कि उनकी असली ताकत भौतिक संपत्ति नहीं, बल्कि उनकी कलम और ज्ञान है। कलम की यह पूजा वास्तव में अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाने का संकल्प है।
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