
न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स भारतीय राजनीति का व्याकरण पिछले एक दशक में बहुत तेजी से बदला है और इस बदलाव के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की त्रिकोणीय जंग रही है। एक दौर वह था जब भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) देश का राजनीतिक एजेंडा तय करती थी। बीजेपी के शीर्ष रणनीतिकार जिस पिच को तैयार करते थे, कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष उसी पिच पर खेलने और उनके द्वारा फेंकी गई गेंदों पर रक्षात्मक शॉट लगाने को मजबूर होता था। राष्ट्रवाद, भ्रष्टाचार, हिंदुत्व और विकास के नैरेटिव जैसे कुछ ऐसे मुद्दे थे, जिन पर बीजेपी की चौतरफा घेरेबंदी के आगे विपक्ष सिर्फ प्रतिक्रिया देने (रिएक्टिव पॉलिटिक्स) तक सीमित रह जाता था। लेकिन आज की राजनीतिक तस्वीर काफी बदली हुई नजर आ रही है। वर्तमान परिदृश्य में राहुल गांधी चुनाव आयोग की निष्पक्षता और ‘चुनाव चोरी’ जैसे गंभीर आरोपों की आड़ लेकर मोदी और शाह पर बेहद आक्रामक हैं। इस नैरेटिव ने सत्ता पक्ष को कई मोर्चों पर बैकफुट पर धकेल दिया है, जिससे ऐसा प्रतीत होने लगा है कि अब पिच राहुल गांधी तैयार कर रहे हैं और बीजेपी उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों पर राजनीतिक बैटिंग यानी सफाई देने को मजबूर हो रही है।
इस बदलाव को समझने के लिए हमें उस दौर में जाना होगा जब बीजेपी की रणनीति पर पूरा विपक्ष कदमताल करता था। साल 2014 और 2019 के आम चुनावों के दौरान बीजेपी की राजनीतिक मशीनरी इतनी सटीक और आक्रामक थी कि उसने विपक्ष को सोचने का मौका भी नहीं दिया। जब 2019 के चुनाव से ठीक पहले पुलवामा हमला और उसके बाद बालाकोट एयरस्ट्राइक हुई, तो बीजेपी ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की एक ऐसी लहर पैदा कर दी, जिसने विपक्ष के सभी मुद्दों को नेस्तनाबूद कर दिया। उस समय राहुल गांधी और पूरा विपक्ष सिर्फ इस बात पर बहस कर रहा था कि एयरस्ट्राइक में कितने आतंकवादी मारे गए। नतीजा यह हुआ कि जनता के बीच विपक्ष की छवि रक्षात्मक और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर कमजोर दिखने लगी। विपक्ष पूरी तरह से बीजेपी की बनाई पिच पर खेल रहा था, जहां जीत-हार का फैसला पहले ही हो चुका था। इसी तरह, जब बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने या नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) जैसे बड़े और विवादित फैसले लिए, तब भी विपक्ष केवल प्रतिक्रियावादी भूमिका में रहा। बीजेपी ने इन मुद्दों को देश के सामने एक निश्चित राष्ट्रवादी चश्मे से पेश किया और कांग्रेस व अन्य विपक्षी दल इसके विरोध में खुलकर बोलने से हिचकिचाते रहे कि कहीं उन्हें बहुसंख्यक विरोधी न मान लिया जाए। उस दौर में बीजेपी जो एजेंडा सुबह तय करती थी, शाम तक टीवी चैनलों की बहसों से लेकर संसद की दीर्घाओं तक विपक्ष उसी के इर्द-गिर्द घूमता नजर आता था।
हालांकि, ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी ने पहले आक्रामक तेवर नहीं दिखाए या मुद्दे नहीं उठाए। उनके राजनीतिक सफर में कई ऐसे मोड़ आए जब उन्होंने बड़े-बड़े मुद्दों को उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश की, लेकिन वे मुद्दे चुनावी मोर्चे पर कोई खास चमत्कार नहीं दिखा पाए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2019 के आम चुनाव में राहुल गांधी द्वारा उठाया गया ‘राफेल विमान सौदा’ का मुद्दा था। राहुल गांधी ने ‘चौकीदार चोर है’ का नारा देकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बेदाग और ईमानदार छवि पर सीधा हमला बोला था। उन्होंने लगातार रैलियों में इस मुद्दे को भुनाया, प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं और तकनीकी बारीकियों को जनता के सामने रखा। लेकिन यह मुद्दा जमीन पर जनता से कनेक्ट नहीं हो सका। जनता ने मोदी की विश्वसनीयता पर भरोसा बनाए रखा और कांग्रेस को चुनाव में करारी शिकस्त झेलनी पड़ी। राफेल का यह मुद्दा पूरी तरह से बेअसर साबित हुआ और इसे राहुल गांधी की एक बड़ी रणनीतिक विफलता माना गया। इसी तरह राहुल गांधी ने नोटबंदी और जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) को लेकर भी सरकार पर तीखे हमले किए थे। उन्होंने जीएसटी को ‘गब्बर सिंह टैक्स’ का नाम दिया और दावा किया कि इसने देश के छोटे व्यापारियों की कमर तोड़ दी है। संसद से लेकर सड़क तक कांग्रेस ने प्रदर्शन किए, लेकिन जब चुनाव के नतीजे आए, तो व्यापारियों और आम जनता का एक बड़ा वर्ग फिर भी बीजेपी के साथ खड़ा दिखाई दिया। कोरोना महामारी के दौरान लॉकडाउन के प्रबंधन, प्रवासी मजदूरों के संकट और वैक्सीन कूटनीति पर भी राहुल गांधी ने लगातार सवाल उठाए। उन्होंने हर दिन सरकार की कमियों को उजागर करने वाले ट्वीट और वीडियो जारी किए, लेकिन उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में इन मुद्दों का कोई चमत्कारिक असर देखने को नहीं मिला और बीजेपी लगातार जीत दर्ज करती रही। इन पुराने मुद्दों की विफलता का मुख्य कारण यह था कि विपक्ष के पास तब एक मजबूत और एकजुट नैरेटिव की कमी थी और वे जनता को यह समझाने में नाकाम रहे कि उनके पास सरकार का क्या विकल्प है।
लेकिन हाल के दिनों में पासा पलटता हुआ दिख रहा है। राहुल गांधी ने अब अपनी रणनीति बदल ली है। वे केवल सरकार की नीतियों की आलोचना नहीं कर रहे हैं, बल्कि सीधे उन संस्थाओं पर सवाल उठा रहे हैं, जो लोकतंत्र की रीढ़ मानी जाती हैं। चुनाव आयोग की भूमिका को संदिग्ध ठहराना और ‘चुनाव चोरी’ का नैरेटिव गढ़ना इसी बदली हुई रणनीति का हिस्सा है। राहुल गांधी अब लगातार यह आरोप लगा रहे हैं कि मोदी सरकार संवैधानिक संस्थाओं को पंगु बनाकर चुनाव जीत रही है। इस नैरेटिव का असर यह हुआ है कि अब बीजेपी को बार-बार सामने आकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की पवित्रता पर स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है। जिस तरह से राहुल गांधी ने जातिगत जनगणना और संविधान बचाने के मुद्दे को केंद्र में ला दिया है, उसने बीजेपी की पारंपरिक हिंदुत्व वाली पिच को हिलाकर रख दिया है। अब बीजेपी के बड़े से बड़े नेता को जातिगत समीकरणों, संविधान की प्रतियों और चुनाव आयोग के बचाव में बयानबाजी करनी पड़ रही है। जो बीजेपी कभी अपने विकास और राष्ट्रवाद के रथ पर सवार होकर चलती थी, आज वह विपक्ष के आरोपों की पिच पर डिफेंसिव शॉट खेलने को मजबूर नजर आ रही है। राजनीति का यह नया दौर दिखाता है कि कैसे एक दौर में बीजेपी की उंगलियों पर नाचने वाला विपक्ष अब खुद अपनी धुन तैयार कर रहा है और सत्ता पक्ष को उस पर कदमताल करने के लिए विवश कर रहा है।
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