लद्दाख़ : दौलत बेग ओल्डी हवाईपट्टी से 20 किमी दूर, चीन कर रहा है तेजी से पक्के निर्माण

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दौलत बेग ओल्डी से 20 किमी. दूर बढ़ीं ड्रैगन की गतिविधियां, डेप्सांग मैदानी इलाके में चीन की गतिविधियों को सेटेलाइट ने किया कैद, रात के समय लिये गए उपग्रह चित्रों से हुआ चीनी निर्माणों का खुलासा

लद्दाख़ : दौलत बेग ओल्डी हवाईपट्टी से 20 किमी दूर, चीन कर रहा है तेजी से पक्के निर्माण
चित्र साभार (हिन्दुस्थान समाचार )

नई दिल्ली : पूर्वी लद्दाख में पैन्गोंग झील के दोनों किनारों से ​​भारत और चीन ​की सेनाओं के पीछे हटने के बाद उपग्रह की तस्वीरों ने ​​​गोगरा, हॉट स्प्रिंग्स ​और डेप्सांग प्लेन ने दोनों ​देशों के लिए अगली चुनौती की पहचान ​की है, ​जहां ​2020 के अंत से तैनाती ​में कोई बदलाव नहीं हुआ है​​।​ इतना ही नहीं रणनीतिक दौलत बेग ओल्डी (​​डीबीओ​)​ हवाई पट्टी ​से करीब ​20 किमी. दूर डेप्सांग में चीनी ​सेना की गतिविधियां बढ़ने की भी तस्वीरें सेटेलाइट ने कैद की हैं​।​ ​​​रात के समय ​लिये गए उपग्रह चित्रों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के पास ​डेप्सांग क्षेत्र में ​​चीनी ​निर्माणों का खुलासा किया है।


पूर्वी लद्दाख की सीमा एलएसी पर भारत की अंतिम चौकी दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) के पास ​है​।​ यहां से चीन के कब्जे वाला अक्साई चिन महज 7 किमी. दूर है। गतिरोध के दौरान ​यहां चीन अपनी सेना की तैनाती करके डेप्सांग घाटी, अक्साई चिन और दौलत बेग ओल्डी पर ​एक साथ ​नजर रख रहा है। चीन ने पहले ही डेप्सांग घाटी में नए शिविर और वाहनों के लिए ट्रैक बनाए हैं, जिसकी पुष्टि ​पहले भी ​सेटेलाइट की तस्वीरों और जमीनी ट्रैकिंग के जरिये हुई है। पूर्वी लद्दाख का डेप्सांग प्लेन्स इलाका भारत-चीन सीमा के सामरिक दर्रे काराकोरम पास के बेहद करीब है। 255 किलोमीटर लम्बी दुरबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी रोड यानी (डीएसडीबीओ) इसी के करीब से होकर जाती है। यहां से दौलत बेग ओल्डी की दूरी 30 किलोमीटर है। ​डेप्सांग मैदानी इलाके में चीनी सेना भारतीय सैनिकों की पेट्रोलिंग में बाधा डाल रही है।​


उधर, भू-राजनीतिक खुफिया प्लेटफॉर्म @detresfa_ ने पैन्गोंग झील के दोनों किनारों से सेनाओं के पीछे हटने के बाद गोगरा, हॉट स्प्रिंग्स ​और डेप्सांग प्लेन ने दोनों ​देशों के लिए अगली चुनौती की पहचान ​की है, ​जहां ​2020 के अंत से तैनाती ​में कोई बदलाव नहीं हुआ है​​। ​इस डेप्सांग प्लेन में कुल पांच पेट्रोलिंग प्वाइंट (पीपी) 10, 11, 11ए, 12 और 13 हैं, जहां चीनी सेना भारतीय सैनिकों को गश्त करने से लगातार रोक रही है। दरअसल यहां एक वाई-जंक्शन बनता है, जो बुर्तसे से कुछ किलोमीटर पर है। उसी से सटे दो नालों जीवन नाला और रकी नाला के बीच में ये पांच पेट्रोलिंग प्वाइंट हैं। हालांकि 20 फरवरी को भारत और चीन के सैन्य कमांडरों के बीच 10वें दौर की वार्ता में पूर्वी लद्दाख के हॉट स्प्रिंग्स, गोगरा और डेप्सांग प्लेन जैसे क्षेत्रों में भी सैन्य वापसी की प्रक्रिया शुरू करने पर फोकस किया गया है। दोनों देशों के सैन्य कमांडरों के बीच इन विवादित इलाकों से भी सैनिकों, हथियारों तथा अन्य सैन्य उपकरणों को हटाए जाने पर गहन मंथन किया गया है। अगली वार्ता में इन इलाकों से भी फौज हटाये जाने की प्रक्रिया पर बात होनी है। ​​​

अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्था ​कैपेला स्पेस​ @capellasp​​ace​ ​द्वारा रात के दौरान​ डेप्सांग इलाके में ​​सिंथेटिक एपर्चर रडार (एसएआर)​ के माध्यम से रात के दौरान ​ली गईं तस्वीरों से चीनी ​निर्माणों का खुलासा हुआ है।​ इसी तरह भारत ​की सबसे ​ऊंची हवाई पट्टी ​दौलत बेग ओल्डी (डीबीओ) ​से लगभग 2​0​ किमी​. ​दूर​ ​अक्साई चिन में​​​ ​हर मौसम में सक्रिय रहने वाली ​पीएलए ​की ​​तियानवेन्डियन पोस्ट​ तस्वीरों में कैद हुई है।​ 1962 के युद्ध के बाद स्थापित ​की गई इस पोस्ट ​का पिछले कुछ वर्षों में लगातार ​विकास देखा गया है।​ ​इसकी मुख्य इमारत में अगस्त​,​ 2020 से अतिरिक्त निर्माण, शिविर, वाहन और बाड़ ​लगाये गए​ हैं।​ यानी कि भारतीय और चीनी सैनिकों ​के पैन्गोंग झील क्षेत्र में ​चरणबद्ध तरीके से लागू किये गए विस्थापन के बाद अभी भी डेप्सांग प्लेन में दोनों जमीनी बलों के बीच ​​गतिरोध बना हुआ है।


​अमेरिकी अन्तरिक्ष संस्था ​कैपेला स्पेस​ ​ने ​एसएआर वाणिज्यिक उपग्रहों​ से हाई रिज़ॉल्यूशन ​तस्वीरें ली हैं जिनसे ​खुलासा हुआ है कि मौजूदा गतिरोध के दौरान चीनी सैनिकों ने अपने टैंक और सैनिकों को भारतीय चौकियों के करीब ला दिया है।​ ​​इस क्षेत्र में​ चीनी सेना की वायु रक्षा प्रणाली, स्टोरेज, अतिरिक्त आश्रयों और सुदृढीकरण के लिए वाहनों ​का संचालन ​​तियानवेन्डियन पोस्ट​ ही करती है।​ इस पोस्ट पर मुख्य डबल-मंजिला इमारत कई अस्थायी शिविरों और आश्रयों से घिरी हुई है। नई इमारतों, अवलोकन पोस्ट और टावरों को भी​ ताजा तस्वीरों में देखा जा सकता है​​।​ ​इस पोस्ट में शुरू में तीन बड़ी इमारतें थीं जिनमें संभवतः बड़ी संख्या में सैनिक शामिल थे​​।​ अब इसके अतिरिक्त​​ ​गतिरोध अवधि के दौरान रक्षात्मक दीवारों के साथ-साथ अस्थायी आश्रय भी ​नए निर्माण ​में दिखाई दे रहे हैं। (हि.स.)

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