हमारे प्रमुख रणनीतिक व सांस्कृतिक साझीदार नेपाल में ओली सरकार के भंग होने के बाद राजनितिक अस्थिरता का माहौल है, ऐसे माहौल आये दिन आमने -सामने हो रहे राजनितिक गुटों के मध्य संघर्ष शीघ्र ही किसी हिंसक आन्दोलन की परिणिति की ओर संकेत कर रहें हैं.

नेपाल- पड़ोसी मुल्क नेपाल में परंपरागत रूप से राजनैतिक अस्थिरता का दौर जारी है। 20 दिसंबर 2020को प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा के प्रस्ताव पर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी द्वारा सदन भंग किए जाने से राजनैतिक अस्थिरता ने और पांव पसार लिया है। सरकार ने दो चरणों में 30 अप्रैल 2021और 10 मई 2021 को मध्यावधि चुनावों के मतदान की घोषणा भी कर दी है। जिसके विरोध में जगह आंदोलन, प्रदर्शन व वाहनों में आगजनी का सिलसिला भी शुरू हो गया है।
सबसे अधिक तल्खी कम्युनिस्ट दलों के बीच ही उभर रही है। प्रधानमंत्री केपी ओली शर्मा गुट का विरोध प्रचंड-माधव गुट तेजी से कर रहा है। शीर्ष नेता भी एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का एक शीतयुद्ध छेड़ दिए हैं। शुरुआती दिनों में नेपाल के वर्तमान प्रमुख विपक्षी दल नेपाली कांग्रेस ने केपी ओली शर्मा के फैसले का विरोध करते आ रही थी। लेकिन अब उसका विरोध स्तर धीमा पड़ता जा रहा। विरोध का सबसे अधिक असर नेपाल की राजधानी काठमांडू व पर्यटन नगरी पोखरा समेट पहाड़ी इलाकों में देखने को मिल रहा है। जहां माओवादी (कम्युनिस्ट) समूह के विरोधी खेमे अपनी शक्ति प्रदर्शन में जुटे हैं। नेपाल के मैदानी इलाकों के जिले रुपनदेही, नवलपरासी व कपिलवस्तु आदि में फिलहाल विरोध प्रदर्शन सभाओं व पुतला दहन तक सीमित है।
हालांकि ओली सरकार के संसद भंग किए जाने व मध्यावधि चुनाव के के खिलाफ याचिका पर सुनवाई नेपाल के सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। रविवार को सरकार पक्ष के अधिवक्ता ईश्वरी प्रसाद भटराई ने मामले की सुनवाई कर रहे न्यायधीश चोलेंद्र शमशेर जबरा के सामने अपनी दलील रखी। लेकिन मामले में कोई फैसला फिलहाल नहीं आ सका है। उक्त तमाम कवायदों के बीच राजनैतिक गुटों के बीच तल्खी का माहौल दिन प्रतिदिन गहराता जा रहा है। जो बीते वर्षो में नेपाल में हुए माओवादी व मधेशी आंदोलन तरह की पुनरावृत्ति की तरफ जाता दिख रहा है।
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