मप्र उपचुनाव विशेष – अम्बाह विधासनभा का राजनितिक विश्लेषण

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मप्र में अगले महीने 28 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने जा रहें है, India MIX News आपके सामने हर विधानसभा सीट का राजनितिक विश्लेषण ला रहा है, जिससे आपकी राजनीतिक जानकारी बढ़ सके, इसी क्रम में पढिये मुरैना जिले की अम्बाह विधानसभा का राजनितिक विश्लेषण

मप्र उपचुनाव विशेष - अम्बाह विधासनभा का राजनितिक विश्लेषण
मप्र उपचुनाव विशेष - अम्बाह विधासनभा का राजनितिक विश्लेषण 2

उपचुनाव में सबसे महत्वपूर्ण ग्वालियर-चम्बल सम्भाग के मुरैना जिले में 5 विधानसभा सीटों पर चुनाव है। यहाँ भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा के साथ कांग्रेस से राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह, पूर्व मंत्री डॉ गोविंद सिंह व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ की प्रतिष्ठा दाव पर है।

मुरैना जिले की आरक्षित विधानसभा अम्बाह जिसपर भाजपा के संभावित उम्मीदवार हैं, कमलेश जाटव. कांग्रेस के उम्मीदवार हैं बसपा से कांग्रेस में आये सत्यप्रकाश सखवार तथा बसपा के घोषित उम्मीदवार हैं भानुप्रताप सिंह सखवार, साथ ही पिछले 2018 के विधानसभा चुनाव में दूसरे नम्बर पर रही नेहा किन्नर ने उम्मीदवारी की घोषणा कर के चुनाव को रोचक बना दिया हैं. 

सीट का संक्षिप्त इतिहास 

चुनाव परिणामों के लिहाज से इस सीट को भाजपा की पारंपरिक सीट कहा जा सकता है। अतः यहाँ जीतना भाजपा के लिये जरूरी भी हो जाता है। 1977 के विधानसभा चुनाव से अब तक यहाँ हुए 10 प्रमुख विधानसभा चुनावों में, 6 बार भाजपा अथवा जनता पार्टी के विधायक चुने गए, जिसमें बंशीलाल जाटव प्रमुख है, आप तीन बार विधायक रहें. कांग्रेस व बसपा का यहाँ पर इतना प्रभाव नहीं रहा, कांग्रेस ने 3 बार तथा बसपा ने 1 बार यहाँ से अपना विधायक विधानसभा में भेजा है.

जातीय तथा अन्य समीकरण 

यह सीट SC वर्ग के लिए आरक्षित व जातिगत समीकरणों के लिहाज से जटिल हैं. यहाँ SC वर्ग के मतदाता सर्वाधिक हैं, जिसमें सर्वाधिक सखवार बिरादरी के हैं जिनकी संख्या लगभग 38 हजार है, यही कारण हैं की यहाँ कांग्रेस व बसपा दोनों ने अपना उम्मीदवार इसी बिरादरी से दिया है. इसके बाद जाटव बिरादरी के मतों की संख्या SC वर्ग में सार्वाधिक हैं, जिनकी संख्या अनुमानतः 12-15 हजार है. यहाँ SC वर्ग की सम्मिल्लित मत शक्ति लगभग 60-65 हजार मतों की हैं, जो की इनकी क्षमता दर्शाती हैं.

विधानसभा का दूसरा प्रमुख मतदाता समूह सामान्य वर्ग का है, जिसमें राजपूत, ब्राह्मण व बनिया प्रमुख हैं, इनमें सर्वाधिक मत संख्या ठाकुर बिरादरी की है, जो लगभग 50 हजार के हैं, जिसमें तोमर, जादौन व सिकरवार प्रमुख हैं. लगभग 20-22 हजार मत बनिया व ब्राह्मण बिरादरी के हैं.  वस्तुतः समान्य वर्ग के लगभग 70 हजार मत इस विधानसभा के चुनाव परिणामों में महत्वपूर्ण भूमिका निभातें हैं. 

इसके अतिरिक्त OBC वर्ग में कुशवाहा बिरादरी के लगभग 11 हजार, लगभग इतने ही किरार, लगभग 18 हजार गुर्जर, 8-9 हजार कोरी व 11-12 हजार मुस्लिम बिरादरी के मत यहाँ चुनाव परिणाम बदलने की क्षमता रखते हैं. 

यहाँ कांग्रेस व बसपा का प्रभाव दलित, मुस्लिम, कोरी, किरार, गुर्जर व कुशवाहा मतों पर अधिक है जबकि भाजपा सामान्य वर्ग के अपने पारम्परिक मतदाताओं व SC तथा OBC वर्ग के शेष मतों पर ही निर्भर है.

बसपा यहाँ 2018 का चुनाव छोड़ दिया जाये तो पिछले तीन चुनावों में कांग्रेस के पाले से अपने मतों को खीचने में सक्षम रही है, इसी वजह से यहाँ 2013 व 2008 में कांग्रेस के उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहें हैं. इस बार भी स्थिति कुछ ऐसी ही है.

वर्तमान राजनीतिक स्थिति

वर्तमान में यहाँ की राजनितिक स्थिति जटिल है. कमलेश जाटव के सामने एक कड़ा मुकाबला है, जिसे और कड़ा बना दिया है, पिछली बार दुसरे स्थान पर रही निर्दलीय उम्मीदवार नेहा किन्नर ने, जिन्होंने इन उपचुनावों में खड़े होने की घोषणा की है. पिछली बार इन्होने SC व OBC वर्ग के मतों में जबरजस्त सेंध लगाईं थी, अगर इस बार भी यह ऐसा कुछ करने में सक्षम हो पाती है तो हमें यहाँ आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिल सकता है.

यहाँ भाजपा उम्मीदवार को बसपा व कांग्रेस की लड़ाई में लाभ होगा साथ ही वो SC वर्ग के मत जो भाजपा के खाते में नहीं आते थे उनके अब तीन हिस्सों ( कांग्रेस, बसपा,निर्दलीय) में बंटने की संभावना बनती है, जिससे भाजपा को लाभ होगा. 

भाजपा अगर यहाँ अपने पारम्परिक मतदाताओं के कुल मतों का 60%, ओबीसी वर्ग से 30% व SC वर्ग से 10% मत अपने पाले में करने में सफल हो जाती है तो विधानसभा जीत सकती है. 

प्रमुख मुद्दे

यहाँ विकास व सामाजिक सुरक्षा के साथ खेती-किसानी प्रमुख मुद्दा है. क्षेत्र आज भी विकास के पैमाने पर पिछड़ा हुआ है, कई जगहों पर जनता मूलभूत संसाधनों की भी मोहताज है. 

किसान कर्जमाफी व हालिया किये गए कृषि सुधार अधनियम एक बड़ा मुद्दा है. यहाँ के किसान जहाँ कर्जमाफी को लेकर कही न कही कांग्रेस से नाराज है, वही भाजपा के सामने भी नवीन कृषि सुधारों को लेकर इन्हें समझाने की चुनौती है. हालाँकि किसान सम्मान निधि व संबल योजना का यहाँ पर भाजपा को लाभ हो सकता है. 

कमलेश जाटव जो कि भाजपा के साथ रहे फिर अलग हुये और फिर भाजपा में आये है यहाँ अन्य विधानसभाओ की तरह दल बदल के आने के सवाल से थोड़े से बचे हुये हैं। यहाँ इनको दूसरा फायदा कांग्रेस व बसपा उम्मीदवार का एक ही जातीय समूह से आने का भी है, जिससे इनको अपने टारगेट वोटर्स को साधने में आसानी है, इसके साथ ही अपने राजनीतिक अनुभव, क्षेत्र में पारिवारिक पकड़, सभी जातीय के मध्य संतुलित क्षवि, समुदाय के दल के संगठन व शीर्ष नेताओं के सहयोग से कमलेश अपनी स्थिति को और मजबूत करने में सक्षम है।

इस क्षेत्र की एक बड़ी समस्या यह भी है की यहाँ चुनाव अक्सर वास्तविक जनहित के मुद्दों से दूर, जातिगत व क्षेत्रीय समीकरणों के इर्दगिर्द घूम जाता है, जिसका लाभ राजनितिक दल उठातें है. इस बार भी क्षेत्रीय मुद्दों के साथ जातीय व सामाजिक समीकरण चुनाव में प्रमुख परिणाम निभाएंगे.

इस सीट के बारे में वर्तमान में यह कहा जा सकता है कि यहाँ चुनाव रोचक होंगे। भाजपा, कांग्रेस, बसपा व निर्दलीय नेहा किन्नर के चतुष्कोणीय मुक़ाबले में कोई बड़ा उलटफेर अगर नहीं होता है तो भाजपा यह सीट अपेक्षाकृत कम अंतर से जीत सकती है। अगर कोई उलटफेर होता है तो भाजपा उम्मीदवार के तीसरे या चौथे स्थान पर होने की सम्भावना बनती है, लेकिन यह तभी हो जब स्थानीय स्तर पर कोई बड़ा मुद्दा या समीकरण चुनाव को प्रभावित करे जो अभी होता नहीं दिख रहा है।

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