मप्र उपचुनाव – भांडेर विधानसभा सीट का संक्षिप्त राजनितिक विश्लेषण

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अगले महीने मप्र में उपचुनाव होने वाले हैं. जिसमें 28 विधानसभा सीटो पर राज्य की लगभग 12% जनसंख्या अपने मताधिकार का प्रयोग करेगी. यह चुनाव प्रदेश के राजनितिक इतिहास के सबसे चर्चित व विशिष्ट उपचुनाव हैं, अतः IndiaMIX News आपके सामने सभी सीटों का राजनितिक विश्लेषण ला रहा है, इसीक्रम में पढिये दत्तिया जिले की भांडेर विधानसभा का राजनितिक विश्लेषण

मप्र उपचुनाव - भांडेर विधानसभा सीट का संक्षिप्त राजनितिक विश्लेषण
मप्र उपचुनाव - भांडेर विधानसभा सीट का संक्षिप्त राजनितिक विश्लेषण 2

दतिया जिले की आरक्षित भांडेर  विधानसभा सीट की इन विधानसभा चुनावों की एक प्रमुख सीट हैं. यहाँ से भाजपा की सम्भावित उम्मीदवार है रक्षा संतराम सरोनिया, जिनका मुकाबला करेंगे कांग्रेस की तरफ से पूर्व विधायक फूलसिंह बरैया व बसपा से इनको चुनौती दी है पूर्व कांग्रेस नेता, विधायक तथा गृहराज्यमंत्री महेंद्र बौद्ध.

हमें यहाँ रोचक मुकाबला देखने को मिल सकता हैं, इस सीट का बैकग्राउंड समझने के लिए हमें इस सीट के संक्षिप्त इतिहास को जानना होगा.

सीट का संक्षिप्त इतिहास

1977 से अब तक हुये यहाँ 10 प्रमुख चुनावों में यहाँ से 5 बार भाजपा व जनता पार्टी, 4 बार कांग्रेस व 1 बार बसपा अपना विधायक विधानसभा में भेजने में कामयाब हुई है. वर्तमान कांग्रेस उम्मीदवार फूलसिंह बरैया 1998 में यहाँ से बसपा के टिकट पर जीत चुकें हैं. इसके बाद इन्होने निर्दलीय, लोजपा तथा बहुजन संघर्ष दल के बैनर तले यहाँ से 3 विधानसभा चुनाव और लड़ें लेकिन सफलता से कोसो दूर रहें. 

विधानसभा पर जातीय समीकरण का अपना प्रभाव है लेकिन यहाँ की जनता राजनितिक दल व विचारधारा के साथ उम्मीदवार को महत्व देती है, यही कारण है की अनुसूचित जाति के स्थापित नेता होने के बावजूद भी फूल सिंह बरैया उचित सिम्बल के साथ चुनाव नहीं लड़ने के कारण, यहाँ के स्थानीय व अनुभवी नेता होने के बावजूद 1998 के बाद पुनः विधानसभा नहीं जा पाये. इस समय इनके पास सिम्बल व संगठन का बल है, जिससे वो तगड़ा चुनाव लड़ेंगे इसकी सम्भावना बनती है.

जातीय तथा अन्य समीकरण

लगभग 2 लाख से अधिक मतदाताओं वाली इस विधासनभा का जातीय समीकरण अंचल की अन्य आरक्षित विधानसभाओं के समान जटिल है. यहाँ सबसे बड़ा मतदाता वर्ग SC वर्ग का है, जिनकी कुल मत संख्या 55 हजार बताई जाती है, इसके बाद दूसरा सबसे बड़ा समूह पिछड़ा वर्ग के मतदाता समूह का है, जिसमें यादव समाज के 28 हजार, दांगी समाज के 22 हजार, कुशवाहा समाज के 14 हजार व पाल समाज के 12 हजार मत प्रमुख हैं. सामान्य वर्ग के मतदाताओं की संख्या यहाँ 28-30 हजार बताई जाती है, जिसमें ब्राहम्ण समाज के 16 हजार मत प्रमुख हैं. 

यहाँ भाजपा की जीत तभी होती है जब वो SC वर्ग के लगभग 25% मतों के साथ, सामान्य व पिछड़ा वर्ग के मतों के बड़े हिस्से को अपने पाले में करने में सक्षम होती है. जब-जब यहाँ SC वर्ग के मतों का बड़ा हिस्सा व ओबीसी समुदाय के मत भाजपा के सामने खड़े उम्मीदवार के पक्ष में जातें है तो उसे बड़ा लाभ होता हैं. कांग्रेस का मानना है की इस बार भी ऐसा ही होगा, जिसका कारण उसके उम्मीदवार फूलसिंह बरैया हैं. जिनके समर्थन में SC व पिछड़ा वर्ग के मत लामबंद हो सकतें हैं. इसमें कांग्रेस को पार्टी के संगठन तथा बरैया की व्यक्तिगत छवि से भी मदद मिलने की आश है.

लेकिन यहाँ पर यह देखना भी रोचक होगा की कांग्रेस बसपा प्रत्याशी महेंद्र सिंह बौद्ध के द्वारा होने वाले नुकसान को कैसे रोकेगी, बसपा का इस सीट के परिणाम को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहता है, जो 1993 के विधानसभा चुनावों से लगातार देखने को मिला है. अक्सर बसपा के चुनाव लड़ने से कांग्रेस की तरफ न जाकर SC व ओबीसी वर्ग के मतों का एक बड़ा हिस्सा, औसतन 10-15% मत बसपा के पाले में चले जातें है, जिसकी वजह से कांग्रेस को यहाँ हार का मुह देखना पड़ता है. इस बार भी स्थिति कुछ ऐसी ही है, अगर बसपा के उम्मीदवार महेंद्र सिंह बौद्ध यहाँ लगभग 15% से अधिक मत अपने खाते में करने में कामयाब हो जातें हैं तो भाजपा की राह आसान हो सकती है. 

वर्तमान राजनितिक स्थिति

विधानसभा की वर्तमान राजनितिक स्थिति बदली हुई है, यह स्थिति भाजपा व कांग्रेस दोनों के लिये प्रतिकूल कही जा सकती है. यहाँ भाजपा को जहाँ अपने नेताओं से ही भितरघात का डर हैं वही फूलसिंह बरैया के पास भी कांग्रेस के अंदर व कांग्रेस के बाहर बसपा आदि से चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. 

यहाँ भाजपा के सामने पूर्व विधायक घनश्याम पिरोनिया व उनके समर्थकों को साधने की बड़ी चुनौती है जो संतराम सिरोनिया के भाजपा का दामन थामने से नाराज बताये जा रहें हैं, पिरोनिया यहाँ संगठन की बैठकों से गायब देखे जा रहें हैं, जबकि क्षेत्र में उनके गुपचुप दौरे सिंधिया समर्थकों को खटक रहें हैं. अगर इन्होने अथवा इनके समर्थकों ने भितरघात किया तो भाजपा को यहाँ बड़ा नुकसान हो सकता है. सिंधिया व उनके समर्थक रक्षा तथा उनके पति संतराम सरोनिया के भाजपा में आने के बाद यहाँ का भाजपा संगठन अभी तक सिंधिया समर्थकों को अपनाने में सफल नहीं हो पाया है, यही कारण है की स्थानीय भाजपा के मंडल व जिला पदाधिकारी संगठनात्मक बैठकों में तो दिख रहें हैं लेकिन प्रचार में उम्मीदवार के साथ इन्हें नहीं देखा जा रहा है.  

संतराम सिरोनिया के भाजपा में आने से यहाँ कांग्रेस को अंचल की दूसरी सीटों की तरह ज्यादा बड़ा संगठनात्मक नुकसान नहीं हुआ है, क्यूंकि यह इतने बड़े नेता नहीं थे जो विधानसभा के पार्टी काडर को पुर्णतः प्रभावित करने की क्षमता रखते हो. हाँ कुछ ब्लोक्स में कांग्रेस को हल्का नुकसान अवश्य हुआ है, लेकिन इसे विधानसभा के प्रभारी व पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल ने पर्याप्त मेहनत कर काफी हद तक रिपेयर कर दिया है. 

यहाँ भाजपा व कांग्रेस दोनों दलों के नेताओं को अपने बयानों व सामाजिक छवि से भी दिक्कत होने की सम्भावना हैं, कांग्रेस के फूल सिंह बरैया का कुछ दिनों पहले एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें उन्होंने कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां की थी, जिसको लेकर सवर्ण समाज में रोष देखने को मिल रहा है, यह रोष यहाँ तो प्रभाव डालेगा ही साथ में ग्वालियर-चम्बल संभाग की अन्य सीटों पर भी इसका प्रभाव हमें देखने को मिलेगा. 

भाजपा उम्मीदवार रक्षा संतराम सरोनिया के पति संतराम सरोनिया के व्यवहार से स्थानीय भाजपा कार्यकर्ताओ व भाजपा के कोर मतदाताओं को शिकायतें हैं, फोन नहीं उठाने, समय नहीं देने व अनुचित व्यवहार की शिकायत यहाँ के भाजपा कार्यकर्ता व अन्य शीर्ष भाजपा नेता डॉ. नरोत्तम मिश्रा से कई बार कर चुके है. यह सीट डॉ. नरोत्तम मिश्रा के जिम्मे ही मानी जा रही है, यही कारण हैं की कार्यकर्ताओं को अपनी और रखने के लिए मिश्रा यह अपील करते हुये देखे जा रहें है की चुनाव में उम्मीदवार को नहीं बल्कि उनकी छवि व पार्टी के सम्मान के लिए भाजपा कार्यकर्ता काम करें. 

अभी के हालात में यह कहा जा सकता है की यहाँ की राजनितिक स्थिति जटिल है, भाजपा व कांग्रेस दोनों दलों को भितरघात का डर हैं, भाजपा में इसका असर ज्यादा देखने को मिल सकता हैं. इस सीट का चुनाव परिणाम बसपा के प्रदर्शन पर निर्भर करेगा, बसपा के उम्मीदवार को जितने ज्यादा मत मिलेंगे, भाजपा की जीत की उम्मीद उतनी ही बढ़ेगी. 

प्रमुख मुद्दे 

इस सीट के बहुसंख्यक पिछड़ा व अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाताओं का प्रमुख व्यवसाय किसानी है, यहाँ सडक, पानी, शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे मूलभूत संसाधनों की भी कमी हैं. अतः इस चुनाव में प्रमुख मुद्दा खेती, विकास व मूलभूत संसाधन बनते दिख रहें हैं. 

इस विधानसभा में किसान कर्ज माफ़ी एक बड़े मुद्दे के रूप में दिख रही है, मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा यह मान रहा है की पिछली कमलनाथ सरकार ने 1  लाख तक का कर्जमाफ़ किया था, अगर यह सरकार और टिकती तो शायद 2 लाख तक कर्ज भी माफ़ हो जाता. हालाँकि किसानों का एक बड़ा हिस्सा जिनका कर्ज 1 लाख से अधिक है उनका  कहना है की कर्जमाफी 2 लाख तक की होनी थी ऐसे में 1 लाख की की या 50 हजार की इससे कोई ख़ास मतलब नहीं, 100 में 10 की कर्जमाफी कर दी, बाकी जो कर्जमाफी के भरोसे रहें, जिन्होंने अपना कर्ज नहीं पलटाया उन्हें 14% का ब्याज भुगतना पड़ा, कर्जमाफी के कारण 0% ब्याज पर मिलने वाले ऋण में भी समस्या आई, ऐसे में ऐसी कर्जमाफी से क्या लाभ ?

विधानसभा के किसान खरीफ की फसलों के बीमा क्लेम का अभी तक भुगतान नहीं होने के कारण भी रोष में हैं, उनका कहना है की अभी तक बीमा राशी का नहीं मिलना, इस सरकार की गम्भीरता को दर्शाता है, हालाँकि शिवराज सरकार द्वारा शुरू की गई किसान सम्मान निधि योजना की प्रशंसा करते हुये यहाँ के किसान, विशेषकर लघु सीमांत किसान देखे जा सकतें हैं. 

क्षेत्र में बिकाऊ व टिकाऊ का शोर भी सुनाई दे रहें रहा है, स्थानीय निवासियों का एक हिस्सा रक्षा संतराम सिरोनिया के दल बदलने की आलोचना कर रहा है, वही एक बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो इस आधार पर फूलसिंह बरैया पर प्रश्न खड़े करते हुए पूछ रहा है कि अगर रक्षा एक पार्टी छोड़ने के बाद बिकाऊ है तो फूलसिंह बरैया का इतिहास ही दल बदलने का रहा है, उनपे विश्वास कैसे किया जा सकता हैं ? 

भांडेर विधानसभा की राजनितिक स्थिति पर संक्षिप्त चर्चा के बाद हम यह कह सकतें हैं की यहाँ चुनाव भाजपा व कांग्रेस दोनों के लिए कठिन हैं, दल-बदलू या बिकाऊ का मुद्दा जो कांग्रेस द्वारा उठाया जा रहा है वो यहाँ इतना कारगर नहीं हैं, भाजपा जहाँ इस सीट पर गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा व राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया पर निर्भर है. वहीँ कांग्रेस का सारा दारोमदार प्रत्याशी फूलसिंह बरैया व पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल पर निर्भर है. यहाँ के चुनाव परिणामों का निर्णय बसपा के प्रदर्शन पर सीधे निर्भर दिख रहा है. 

लेकिन यह राजनीति है, इसमें कुछ भी तयशुदा नहीं होता, किसी बात का सटीक अंदाजा नहीं लगाया जा सकता, आप के साथ हम भी आगे-आगे देखतें हैं, होता है क्या ?

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