मप्र उपचुनाव विशेष : साँची विधानसभा – आसान नहीं प्रभुराम चौधरी की डगर, गैरों से ज्यादा अपनों से डर

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रायसेन जिले की साँची विधानसभा में होने जा रहें उपचुनाव चर्चित हैं. यहाँ सिंधिया समर्थक, शिवराज सिंह सरकार के केबिनेट मंत्री प्रभुराम चौधरी की प्रतिष्ठा दाव पर हैं. पढ़िए इस चर्चित सीट का संक्षिप्त राजनितिक विश्लेषण

मप्र उपचुनाव विशेष : साँची विधानसभा - आसान नहीं प्रभुराम चौधरी की डगर, गैरों से ज्यादा अपनों से डर
मप्र उपचुनाव विशेष : साँची विधानसभा - आसान नहीं प्रभुराम चौधरी की डगर, गैरों से ज्यादा अपनों से डर 2

विधानसभा का संक्षिप्त राजनीतिक इतिहास

यह सीट वस्तुतः भाजपा की पारंपरिक विधानसभा सीट कही जा सकती है। 1977 के बाद यहां हुये 10 प्रमुख विधानसभा चुनावों में 7 बार गौरीशंकर शेजवार भाजपा व जनता पार्टी के टिकट पर यहां से 35 साल विधायक रह चुके है। कांग्रेस की तरफ से यहाँ 3 बार डॉ प्रभुराम चौधरी विधायक चुने गए है, 2018 में इन्होंने गौरीशंकर शेजवार के बेटे मुदित शेजवार को हराया था, लेकिन अब यह भाजपा के पाले से चुनाव लड़ने जा रहे हैं, जिससे यहां शेजवार परिवार के सामने विचित्र स्थिति बनी हुई है। यही कारण है कि भाजपा के द्वारा लाख प्रयास करने के बावजूद भी शेजवार परिवार यहाँ प्रभुराम चौधरी के चुनाव प्रचार में नहीं दिख रहा। राजनीतिक रूप से भाजपा की इस पारंपरिक सीट ओर शेजवार परिवार के असहयोग से नुकसान हो सकता है, लेकिन कितना, इसका सही अंदाजा लगाने के लिये हमें सभी फैक्टर्स की भी चर्चा करनी होगी।

विधानसभा के जातिगत तथा अन्य समीकरण

2 लाख 40 हजार से अधिक मतदाताओं वाली इस विधानसभा में SC वर्ग के मतों के साथ मुस्लिम समाज के मत निर्णायक हैं। यहां लगभग 50-60 हजार SC व 35-40 हजार मुस्लिम समाज के मतदाता हैं, जो कि चुनाव परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखतें हैं।

इसके अतिरिक्त यहां लोधी समाज के 20 हजार, किरार समाज के 17 हजार, अहिरवार समाज के 32 हजार, ब्राह्मण समाज के 12 – 15 हजार, राजपूत समाज के 10 -12 हजार मत परिणामों को प्रभावित करते हैं।

यहां भाजपा का प्रभाव लोधी, किरार, ब्राह्मण व SC समुदाय के लगभग आधे मत समुदाय पर माना जाता है। यही कारण है कि यहाँ गौरीशंकर शेजवार 7 बार जीतने में सक्षम रहें हैं।

कांग्रेस यहाँ SC वर्ग के मतों के साथ मुस्लिम समाज के मतों व अहिरवार तथा किरार समाज के विभाजित मतों के साथ ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रभाव की वजह से जीत पाती थी। इस बार भी कांग्रेस को यहां किरार, अहिरवार व SC वर्ग के वोटों की टूट का लाभ हो सकता है, लेकिन इन मतों को मोबिलाइज करने वाला सिंधिया फेक्टर इस बार कांग्रेस के साथ नहीं हैं, जिससे कांग्रेस को कितना लाभ मिलेगा, यह नहीं कहा जा सकता।

विधानसभा की वर्तमान राजनीतिक स्थिति

विधानसभा की वर्तमान राजनीतिक स्थिति भाजपा के उम्मीदवार डॉ प्रभुराम चौधरी के लिये मुश्किल तो है लेकिन भाजपा का सन्गठन यहां सक्रिय रूप से लगता है तो जीत की राह आसान हो सकती है।

प्रभुराम चौधरी के सामने यहाँ पर सबसे बड़ी चुनौती कद्दावर भाजपा नेता गौरीशंकर शेजवार व उनके परिवार का समर्थन पाने की है। शेजवार व उनका परिवार यहाँ प्रभुराम चौधरी के साथ चुनाव प्रचार में नहीं दिख रहा, उनके समर्थक संगठन के कार्यक्रमों में तो दिख रहें हैं लेकिन चुनाव के मैदान से गायब दिख रहें है। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान शेजवार को मनाने का प्रयास कर रहें हैं, लेकिन सफलता मिलती नहीं दिख रही है, यही कारण है कि यहां CM चौहान खुद चुनावी बागडोर को संभाले हुये दिख रहें हैं। 2018 के चुनाव में भाजपा को गैरतगंज सेक्टर में कम वोट मिले थें जिसको देखते हुये CM ने गैरतगंज में सभा करके जनता को साधने का प्रयास किया है।

कांग्रेस की तरफ़ से यहाँ चौधरी का मुकाबला कर रहें हैं मदनलाल चौधरी जो कि एक नया व विधानसभा में कम प्रसिद्ध चेहरा है। मंडी, जनपद व जिला पंचायत की राजनीति में ही सीमित रहे मदनलाल की क्षेत्र में पहचान कम है, जनता व कार्यकर्ताओं के मध्य अपनी पंहुच बनाने के लिये इन्हें अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है, साथ ही युवा मतदाताओं के मध्य इनकी लोकप्रियता की कमी भी इन्हें कमजोर बना रही है। सिंधिया का समर्थन यहाँ पर कांग्रेस के जीतने का मुख्य फेक्टर रहता है, जो अबकी बार नहीं है। इन सभी परिस्थितियों के मद्देनजर यहां कांग्रेस कमजोर दिख रही है।

यहाँ पर कांग्रेस व भाजपा दोनों दलों के उम्मीदवारों के सामने अपने-अपने दलों में भितरघात की समस्या है। भाजपा के प्रभुराम चौधरी के सामने जहाँ शेजवार परिवार के साथ सुरेंद्र पटवा व रामपाल सिंह के समर्थकों से सहयोग लेने की चुनौती है वही कांग्रेस के मदनलाल चौधरी के सामने भी GC गौतम, किरण अहिरवार आदि नेताओं को साधने की भी चुनौती है।

प्रभुराम चौधरी के कांग्रेस छोड़ने के बाद यहाँ कांग्रेस के सन्गठन को भी बड़ा नुकसान हुआ था, रायसेन नगर के साथ विधानसभा के ग्रामीण क्षेत्रों में कई ब्लॉक, जनपद अध्यक्ष तथा सरपंच भाजपा में शामिल हुये है। दीवानगंज – सलामतपुर से लेकर रायसेन, गैरतगंज व देहगांव में कांग्रेस को बड़ा नुकसान हुआ। जिसको कांग्रेस ने तेजी से रिपेयर करने का प्रयास किया है। जिला कांग्रेस अध्यक्ष देवेंद्र पटेल, नारायणसिंह ठाकुर, मनोज अग्रवाल आदि नेता यहां मेहनत करते हुये देखे जा रहें है, विभिन्न सेक्टर, मण्डल, ब्लॉक पर नये पदाधिकारीयों की नियुक्ति कर कांग्रेस यहाँ पुनः खुद को खड़ा करने की जद्दोजहद कर रही है। यही कारण हैं कि यहाँ दिग्विजय सिंह व सुरेश पचौरी व्यक्तिगत दृष्टि रख रहें हैं।

यहाँ प्रभुराम चौधरी व उनके समर्थकों की कार्यशैली से भाजपा को भी नुकसान हो रहा हैं। चौधरी समर्थक यहां स्थानीय भाजपा की टीम के पैरेलल अपनी टीम खड़ी कर के काम कर रहें है, जिसकी वजह से स्थानीय भाजपा संगठन का वो धड़ा जो शेजवार व पटवा परिवार का सहयोगी रहा है नाराज दिख रहा है। जिसकी वजह से यहाँ स्थानीय भाजपा के अंदर सुषुप्त विद्रोह की स्थिति देखी जा सकती है। ग्रामीण भाजपा मंडल अध्यक्ष प्रेमनारायण मीणा आदि सैकड़ो भाजपा कार्यकर्ताओं के पिछले दिनों भाजपा छोड़ कांग्रेस में जाने का प्रमुख कारण यह असन्तोष ही रहा है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि वर्तमान राजनीतिक स्थिति में दोनों प्रमुख दावेदारों के सामने अपनों से निपटने की चुनौती है। प्रभुराम चौधरी को शेजवार परिवार की नाराजगी से बड़ा नुकसान हो सकता है। वही अगर यहाँ खुद दिग्गी राजा खुद मदनलाल चौधरी के साथ मैदान में नहीं उतरते है तो बिखरी हुई कांग्रेस व इनके अंदर चल रही आपसी लड़ाई से कांग्रेस को बड़ा नुकसान हो सकता है।

सीट पर चल रहें वर्तमान राजनीतिक मुद्दे

इस सीट पर सबसे बड़ा मुद्दा सड़क का रहा है, यही कारण है कि अपने इस कार्यकाल में प्रभुराम चौधरी ने सलामतपुर से साँची, दीवानगंज। साँची से आमखेड़ा। बारला से रायसेन। साँची से गैरतगंज तक सड़कों का जाल बिछवाया। इसके अतिरिक्त साँची से विदिशा व सांची से रायसेन तक बनी टू लेन सड़कों का श्रेय भी सिंधिया व चौधरी की जोड़ी को जाता है। जिसकी वजह से इस मुद्दे ओर जनता का समर्थन प्रभुराम चौधरी की ओर जाता दिख रहा है। कनेक्टिविटी की समस्या को दूर कर चौधरी ने इस विधानसभा को विकास से जोड़ा है।

यहाँ कांग्रेस द्वारा चौधरी पर चलाया जा रहा दलबदलू व गद्दारी का तीर भी बड़ा प्रभाव डालता नहीं दिख रहा है, यहाँ की जनता कांग्रेस को सिंधिया व चौधरी के दम पर मानती थी, अब इन दोनों के नहीं होने से कांग्रेस ये आरोप यहाँ बेदम कांग्रेस को और कमजोर कर रहें हैं।

यहां किसान कर्जमाफी को लेकर भी कांग्रेस को कोई लाभ मिलता नहीं दिख रहा है, उल्टा यहाँ कर्जमाफी के विरोध में माहौल देखने को मिल रहा है, जो कांग्रेस की मुसीबत बढ़ाने वाला है।

कुल मिलाकर यहाँ भाजपा व कांग्रेस दोनो के पास चुनौतियां जरूर है लेकिन भाजपा ज्यादा मजबूत दिख रही है।

कांग्रेस के पास यहाँ अपने पारंपरिक SC व मुस्लिम मतदाताओं का मजबूत वोट बैंक है, जिसके साथ कांग्रेस यहाँ युवा व महिला मतों को अपनी ओर जोड़ कर मुकलबला करने की तैयारी कर रही है, लेकिन राह बहुत मुश्किल है। क्योंकि कांग्रेस प्रत्याशि यहाँ कांग्रेस के साथ जनता के बीच कम प्रसिद्ध है। 

हालांकि अगर यहाँ भाजपा शेजवार व पटवा परिवार की नाराजगी को जल्दी ठीक नहीं करती है तो प्रभुराम चौधरी को नुकसान हो सकता है और वो जीता हुआ चुनाव हार सकतें हैं।

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