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Reading: बिखरते सियासी किलों के बीच इंडिया गठबंधन के अस्तित्व को बचाने की बड़ी चुनौती
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INDIAMIX > देश > बिखरते सियासी किलों के बीच इंडिया गठबंधन के अस्तित्व को बचाने की बड़ी चुनौती
देश

बिखरते सियासी किलों के बीच इंडिया गठबंधन के अस्तित्व को बचाने की बड़ी चुनौती

Ajai Kumar
Last updated: 06/05/2026 6:19 PM
By
Ajai Kumar
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7 Min Read
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Amidst crumbling political strongholds, the formidable challenge of preserving the existence of the INDIA alliance.

न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स भारतीय राजनीति के फलक पर 2026 के विधानसभा चुनाव नतीजों ने एक ऐसी लकीर खींच दी है, जिसने विपक्षी एकजुटता के दावों और ‘इंडिया’ गठबंधन के भविष्य पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। चुनावी मैदान के जो आंकड़े सामने आए हैं, वे न केवल चौंकाने वाले हैं, बल्कि गठबंधन के भीतर की गहरी दरारों और वैचारिक विरोधाभासों को भी पूरी तरह नग्न कर देते हैं। एक तरफ कांग्रेस केरल में यूडीएफ के जरिए सत्ता की दहलीज पर खड़ी नजर आ रही है, तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में गठबंधन के दो सबसे मजबूत स्तंभों तृणमूल कांग्रेस और डीएमके का सत्ता से बेदखल होना पूरे विपक्ष के लिए किसी वज्रपात से कम नहीं है। विडंबना देखिए कि केरल में कांग्रेस की जीत उसी वामपंथ की हार की कीमत पर मिल रही है, जो राष्ट्रीय स्तर पर उसके साथ ‘इंडिया’ ब्लॉक में कंधे से कंधा मिलाकर चलने का दावा करता है। यह अंतर्विरोध बताता है कि गठबंधन की जमीन कितनी दरक चुकी है।

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ममता बनर्जी और एम.के. स्टालिन जैसे कद्दावर नेताओं की अपने-अपने राज्यों में हार ने इस धारणा को पुख्ता कर दिया है कि क्षेत्रीय दलों का अभेद्य किला अब दरक रहा है। बंगाल में जिस तरह से भारतीय जनता पार्टी ने अपनी जड़ें जमाई हैं और अंततः सत्ता हासिल की है, उसने न केवल राज्य की राजनीति को बदला है, बल्कि पूरे देश में विपक्ष के मनोबल को तोड़कर रख दिया है। अब सवाल सिर्फ सत्ता हासिल करने का नहीं रह गया है, बल्कि अस्तित्व को बचाने की एक बेहद कठिन लड़ाई का बन गया है। ममता बनर्जी अब भी एकजुटता का राग अलाप रही हैं, सोनिया गांधी और राहुल गांधी के फोन कॉल्स का हवाला देकर यह जताने की कोशिश कर रही हैं कि गठबंधन अभी टूटा नहीं है, लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। प्रेस कॉन्फ्रेंस में ममता का यह कहना कि ‘हम हारे नहीं, हमें हराया गया है’ और चुनाव आयोग को खलनायक बताना, हार की हताशा को ही दर्शाता है।

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गठबंधन के भीतर का विरोधाभास तब और गहरा हो जाता है जब हम चुनाव प्रचार के दौरान के बयानों को याद करते हैं। इसी बंगाल की जमीन पर राहुल गांधी ने ममता बनर्जी की तुलना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से की थी। उन्होंने केंद्रीय एजेंसियों की पूछताछ का हवाला देकर ममता की नीयत पर सवाल उठाए थे। हालांकि, अब नतीजों के बाद राहुल गांधी के सुर बदले हुए हैं। वह एक्स पर बंगाल और असम के जनादेश की ‘चोरी’ की बात कर रहे हैं और इसे लोकतंत्र की हत्या बता रहे हैं। लेकिन क्या यह हृदय परिवर्तन केवल राजनीतिक मजबूरी है? कांग्रेस के भीतर ही अधीर रंजन चौधरी जैसे नेताओं के बयान राहुल के स्टैंड से मेल नहीं खाते। अधीर ने स्पष्ट रूप से इसे ‘सत्ता विरोधी लहर’ और ‘भगवा लहर’ का परिणाम बताया था। गठबंधन की इस खींचतान का सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिल रहा है, जो अब और भी अधिक आक्रामक होकर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने की तैयारी में है।

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पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के नतीजों ने एक नई चिंता को जन्म दिया है वह है क्षेत्रीय दलों के सांसदों के टूटने का डर। जिस तरह से आम आदमी पार्टी के सांसदों ने पाला बदला, वही खतरा अब टीएमसी और डीएमके पर भी मंडरा रहा है। लोकसभा में इन दोनों दलों के पास 81 सांसदों का बड़ा आंकड़ा है। यदि परिसीमन या यूसीसी (समान नागरिक संहिता) जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर बीजेपी को रोकना है, तो इन दलों को अपने कुनबे को बिखरने से बचाना होगा। लेकिन सत्ता हाथ से जाने के बाद विधायकों और सांसदों को एकजुट रखना किसी हिमालयी चुनौती से कम नहीं है। क्षेत्रीय राजनीति का दबदबा जो कभी भारतीय राजनीति की पहचान हुआ करता था, अब सिमटता जा रहा है। बिहार, दिल्ली और अब बंगाल-तमिलनाडु के उदाहरण बताते हैं कि मतदाता अब ‘डबल इंजन’ या एक मजबूत केंद्रीय नेतृत्व की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं।

अगले साल यानी 2027 में होने वाले सात राज्यों के विधानसभा चुनाव विपक्ष के लिए और भी बड़ी अग्निपरीक्षा साबित होने वाले हैं। इन सात में से पांच राज्यों में पहले से ही बीजेपी का कब्जा है। केवल पंजाब और हिमाचल प्रदेश में गैर-भाजपा सरकारें हैं, जिन पर अब ‘तलवार’ लटकती नजर आ रही है। असम में अपनी पकड़ मजबूत करने और बंगाल में झंडा गाड़ने के बाद बीजेपी का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर है। वहीं, विपक्षी खेमा आंतरिक कलह, नेतृत्व के संकट और स्पष्ट विजन की कमी से जूझ रहा है। बदरुद्दीन अजमल जैसे नेताओं के तीखे बयान, जो कांग्रेस को ‘मुस्लिम लीग’ बता रहे हैं, इस बात का सबूत हैं कि गठबंधन के घटक दल अब एक-दूसरे के खिलाफ ही कुआं खोद रहे हैं।

सत्ता अब विपक्ष की पहुंच से कोसों दूर दिखाई दे रही है। बीजेपी का बढ़ता ग्राफ और विपक्षी दलों का सिमटता प्रभाव यह संकेत दे रहा है कि आने वाले समय में यूसीसी और सीएए-एनआरसी जैसे विवादास्पद मुद्दों पर सरकार को किसी भी बड़े प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ेगा। विपक्ष के पास न तो अब चुनावी राज्यों का संसाधन बचा है और न ही वह नैतिक बल, जो जनता को आंदोलित कर सके। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार की स्थिति हो या झारखंड और बिहार में क्षेत्रीय क्षत्रपों का संघर्ष, हर जगह कहानी एक ही है बिखरता कुनबा और बढ़ता भगवा दबाव। ऐसे में ‘इंडिया’ ब्लॉक का भविष्य केवल नेताओं की मुलाकातों और फोन कॉल्स तक सीमित रह जाएगा या वह सच में कोई ठोस विकल्प दे पाएगा, यह कहना अभी मुश्किल है। फिलहाल तो स्थिति यह है कि विपक्ष अपने घर को बचाने की जद्दोजहद में ही इतना उलझ गया है कि उसे सत्ता की लड़ाई का होश ही नहीं रहा। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहां संतुलन पूरी तरह से एक तरफ झुकता हुआ नजर आ रहा है।


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