मध्यप्रदेश कांग्रेस : क्या नई पीढ़ी के नेता भी पुराने रास्ते पर हैं ?

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मप्र कांग्रेस कमलनाथ सरकार गिरने व सिंधिया के जाने के बाद हुई संगठनात्मक क्षति के बाद कांग्रेस की नयी पीढ़ी के नेताओं के समर्थकों की पोस्टरबाजी व नेता पुत्र का बयान यह इशारा करतें है की नयी पीढ़ी की कांग्रेस भी गुटबाजी व परिवारवाद से ग्रसित हैं, जो शुभ संकेत नहीं हैं.

मध्यप्रदेश कांग्रेस : क्या नई पीढ़ी के नेता भी पुराने रास्ते पर हैं ?

इंडियामिक्स न्यूज़ / भारत का हृदय प्रदेश कोरोनाकाल में भी राजनितिक सुर्खियाँ बना रहा हैं, कमलनाथ सरकार के गिरने और शिवराज के राज की वापसी के बाद से ही प्रदेश में राजनितिक सरगर्मी अपने उरोज पर है जो उपचुनाव तक जारी रहेगी. लगातार कांग्रेस के विधायकों द्वारा पार्टी छोड़ने के समाचार, कई जिलों में चल रहें संगठनात्मक झगड़ों के बीच अब कांग्रेस की युवापीढ़ी के नेतृत्व को लेकर राजनितिक सरगर्मियां जारी हैं. छिंदवाडा से सांसद व PCC अध्यक्ष कमलनाथ के पुत्र नकुलनाथ द्वारा आने वाले उपचुनावों में पार्टी के युवा नेताओं जीतू पटवारी, जयवर्धन सिंह, हनी बघेल, ओमकार सिंह मरकाम आदि का नेतृत्व करने वाले बयान यह गतिविधि शुरू हुई. नकुलनाथ के बयान के बाद जीतू पटवारी व जयवर्धन सिंह के समर्थकों ने भी सोशल मिडिया में इस आशय के पोस्टर जारी कर इस आग को और हवा दी. भाजपा कांग्रेस की इस अंतर्कलह पल चुटकी ले रही है व इसे पुत्रमोह तथा परिवारवाद से जोड़ रही है, प्रदेश का TV मिडिया भी इस विषय पर लगातार डिबेट करवा के TRP की फसल काट रही है.

मेरे पाठक कहेंगे की यह कांग्रेस का आंतरिक मामला है, मैं इसमें रुचि क्यों ले रहा हूँ, इसमें विशेष क्या हैं ? मित्र, इस घटना में कई विशेषताए हैं जो इसको महत्वपूर्ण तथा बात करने के लायक बनाता है. इस प्रकरण में जिन तीन युवा नेताओं के नाम आये हैं उनमे 2 नेता पुत्र है व तीसरा संगठन से निकला नेता हैं तथा इन दोनों नेताओं से ज्यादा प्रभावी है. दोनों नेता पुत्रों अथवा इनके पिता ने इस विषय पर कार्यकर्ताओं को न डांटा है, न रोका है, न ही इस घटना की भर्त्सना की है. उपचुनाव जिनके चलते यह चर्चा प्रारम्भ हुई है इतने आसान नहीं हैं, कांग्रेस के लिए ये चुनाव बहुत जरूरी होने के साथ अत्यंत कठिन हैं. ऐसे में पार्टी में इस प्रकार की चर्चा हो तो उसपे वार्ता हो सकती हैं.

नकुलनाथ व जयवर्धन दोनों अपने पिता की राजनितिक फसल को काट रहें हैं जबकि जीतू पटवारी ने भाजपा के गढ़ इंदौर में अपनी जगह बनाने के लिए खासी मेहनत की है. यह अंतर पटवारी को इन दोनों से अलग तथा ज्यादा अनुभवी बनाता है.

आज जब पार्टी उपचुनाव के लिए कई सीटो पर उम्मीदवार की कमी से जूझ रही है, कई जगह संगठन अत्यंत कमजोर हो जहाँ इसे खड़ा करना ही चुनौती है, ऐसी विषम परिस्थिति में इस घटना ने यह साक्षात किया है की पार्टी के युवा नेता व उनके समर्थक राजनितिक रूप से कितने अपरिपक्व हैं. ये समय सबके साथ जुड़ कर काम करने का है, ऐसे में नेतृत्व की लड़ाई को लेकर बयान तथा पोस्टरबाजी कर के यह कांग्रेस के उस कार्यकर्ता को और कमजोर कर रहें हैं जो किसी गाँव के बूथ पर कांग्रेस में परिवारवाद व एकता के विषय पर पार्टी की सफाई दे रहा होता हैं.

नकुलनाथ के द्वारा नेतृत्व के आशय से दिये गये बयान ने कांग्रेस में परिवारवाद को लेकर भाजपा व उसके समर्थको को हमला करने का आसान मौका दिया हैं, भाजपा अब कह सकती है कांग्रेस में नेता का बेटा ही नेतृत्व कर सकता हैं. इसका प्रमाण नकुलनाथ की यह उक्ति भी हैं. नकुलनाथ का यह बयान कांग्रेस के उन लोगों को तो पसंद नहीं आया जो जीतू पटवारी या जयवर्धन सिंह के समर्थक हैं, साथ ही उनको भी ठेस पंहुची है जो कांग्रेस के कार्यकर्ता हैं, समर्थक हैं और यह आस लगाये बैठें थें की मध्यप्रदेश व राजस्थान प्रकरण से सीख कर पार्टी सुधार करेगी तथा परिवारवाद व गुटबाजी से बचेगी.

इस घटना ने यह बात भी साबित कर दी की कांग्रेस में गुटबाजी एक परम्परा के रूप में स्थापित हो गई है, जो पार्टी के भविष्य को लेकर अच्छा संकेत नहीं हैं. नेताओं के बाद नेता पुत्रों तथा नवोदित नेताओं के समर्थकों के गुट बनने दे दल धीरे-धीरे कमजोर ही होगा. नकुलनाथ के बयान के बाद जिस गति से जीतू पटवारी व जयवर्धन सिंह के समर्थन में केम्पेन चला वो बताता है की नई पीढ़ी केनेताओ के गुट किस हिसाब से कितने सक्रीय हैं. यह गुटबाजी अगर इस शुरूआती स्तर पर ही खत्म नहीं हुई तो आगे जाकर एक और बड़ी टूट का कारण आसानी से बन सकती हैं.


मप्र कांग्रेस को इस समय उपचुनाव की तैयारी से पहले आत्मानुशीलन करना चाहिए. पार्टी को उन कारणों पर काम करना चाहिए जो उसे अंदर से कमजोर कर रहें हैं. इस प्रकार की बयानबाजी और पोस्टरबाजी कितनी घातक हो सकती है, इसके कारणों से इन नवनेताओं को अवगत कराना चाहिए. अगर नकुलनाथ के बाद इनमें से कोई नेता ऐसा कह देता की ‘अवश्य नकुलनाथजी हम साथ मिलकर हाथ मजबूत करने के लिए लड़ेगे’ तो शायद आज यह विषय चर्चा में नहीं आता, भाजपा को हमलावर होने का मौक़ा नहीं मिलता, कांग्रेस का किसी गांव में बैठा जमीन का कार्यकर्ता निराश नहीं होता. वर्तमान व्यक्तिवादी व गुटवादी परम्परा वाली मप्र कांग्रेस नेता की जगह कार्यकर्ता से बात करने के नियम को भुल गई है, जिससे उसे संगठन के साथ जमीन पर भी नुकसान हो रहा है. मप्र कांग्रेस शीघ्र अपना शोधन कर शीर्ष नेताओं व उनके गुटों में सामंजस्य बिठाये, नयी पीढ़ी के नेताओं को अनुशासन व आपसी समन्वय का पाठ पढाये तो बेहतर होगा. कांग्रेस की वर्तमान गुटबाजी हर समस्या की जड़ है जिसमें मट्ठा डालना मप्र कांग्रेस के लिये आवश्यक है, शोधन के बाद मजबूत हुई कांग्रेस ही उपचुनावों में भाजपा का मुकाबला कर सकती हैं.

हालाँकि इस घटना ने दो बाते तो साबित कर दी है – पहली कांग्रेस में बड़ा नेता बनने के लिए नेता पुत्र होने का बड़ा महत्व है दूसरी मप्र कांग्रेस की नयी पीढ़ी भी गुटबाजी की शीर्ष पीढ़ी की परम्परा को निभा रही हैं.

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