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Reading: अखिलेश की भेष बदल कर हिन्दू वोटों की फसल काटने की तिकड़म
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INDIAMIX > राज्य > उत्तरप्रदेश > अखिलेश की भेष बदल कर हिन्दू वोटों की फसल काटने की तिकड़म
उत्तरप्रदेशराजनीति

अखिलेश की भेष बदल कर हिन्दू वोटों की फसल काटने की तिकड़म

Ajai Kumar
Last updated: 07/05/2026 9:12 PM
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Ajai Kumar
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7 Min Read
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Akhilesh's disguised tactics to harvest Hindu votes

न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स समाजवादी दल का इतिहास गवाह है कि जब भी चुनावी मौसम करवट लेता है, तब यह दल भी अपना रंग बदलने लगता है। पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता दल की जीत ने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक नई हलचल पैदा कर दी है। बंगाल के नतीजों ने यह साफ कर दिया कि हिंदू मतदाता एकजुट होकर मतदान करे तो किसी भी दुर्ग को ढहाया जा सकता है। इस संदेश को समाजवादी दल के मुखिया अखिलेश यादव ने बखूबी पढ़ लिया और देखते ही देखते उनकी सियासत का रंग बदलने लगा। अखिलेश यादव, जो कभी जाति और वर्ग की राजनीति के पुरोधा माने जाते थे, आजकल सामाजिक माध्यमों पर बजरंग बली की तस्वीर के साथ चौपाइयाँ लिख रहे हैं। समाजवादी दल के प्रदेश कार्यालय में बड़े मंगल पर पूजा-अर्चना की तस्वीरें वायरल हो रही हैं। यह देखकर आम जनता के मन में एक ही सवाल उठता है कि क्या यह सच्ची आस्था है या केवल भेष बदल कर हिन्दू मतों की फसल काटने की तिकड़म?समाजवादी दल की स्थापना से लेकर आज तक उसकी सियासत की बुनावट को देखें तो एक धागा बार-बार नजर आता है जब सत्ता मिली तो एक रंग, और जब विपक्ष में आए तो दूसरा रंग। मुलायम सिंह यादव ने जब दल की नींव रखी, तब उनका मूल आधार यादव और मुसलमान मतदाताओं का गठबंधन था। इसे सियासी बोलचाल में ‘माय’ यानी मुसलमान-यादव समीकरण कहा गया। यह समीकरण वर्षों तक उत्तर प्रदेश की सत्ता का केंद्र बिंदु रहा। इस गणित के बल पर समाजवादी दल ने कई बार सरकार बनाई, लेकिन इसके साथ ही दल पर तुष्टीकरण का आरोप भी लगता रहा।

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वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में जब भारतीय जनता दल ने भारी बहुमत से उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल की, तब समाजवादी दल को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ा। ‘माय’ समीकरण पर्याप्त नहीं था, यह स्पष्ट हो गया। तब इस दल ने तुरंत अपनी राह बदली। वर्ष 2022 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव ने एक नया नारा दिया पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक यानी पीडीए। इस नए समीकरण में पिछड़ी जातियों के व्यापक वर्ग को साधने की कोशिश थी। छोटी-छोटी जातियों को मंच देकर, उन्हें टिकट देकर दल ने यह जताने की कोशिश की कि अब वह केवल यादव और मुसलमान का दल नहीं रहा।2024 के लोकसभा चुनाव में पीडीए के नारे ने कुछ असर दिखाया और समाजवादी दल की सीटें बढ़ीं। अखिलेश यादव ने इसे अपनी रणनीति की सफलता बताया। लेकिन जानकारों का मानना है कि यह सफलता भारतीय जनता दल के विरोध में उपजी लहर का परिणाम थी, न कि किसी ठोस सामाजिक बदलाव का। इसके बावजूद समाजवादी दल के नेताओं का आत्मविश्वास आसमान छूने लगा। पीडीए को जादुई मंत्र की तरह प्रचारित किया जाने लगा। अब बंगाल के नतीजों के बाद फिर एक नया मोड़ आया है। हिंदू मतदाताओं को साधने के लिए धार्मिक प्रतीकों का सहारा लिया जा रहा है। यह कोई नई बात नहीं है। मुलायम सिंह यादव भी समय-समय पर मंदिरों में जाते थे, परशुराम जयंती मनाते थे और ब्राह्मण सम्मेलनों में शरीक होते थे। लेकिन उनकी असली राजनीति का धुरा कभी नहीं बदला। यही परंपरा अखिलेश यादव आगे बढ़ा रहे हैं।

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समाजवादी दल के इस दोहरे चेहरे को समझने के लिए उसके शासनकाल को याद करना जरूरी है। जब दल सत्ता में था, तब दंगों की घटनाएँ हुईं। 2013 में मुजफ्फरनगर की पीड़ा आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। उस दौर में पुलिस और प्रशासन पर पक्षपात के आरोप लगे। हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग ने महसूस किया कि उनकी सुरक्षा दाँव पर है। इसी भावना का लाभ उठाकर भारतीय जनता दल ने 2017 में ऐतिहासिक जीत हासिल की थी। आज जब अखिलेश यादव बजरंग बली की चौपाई लिख रहे हैं, तो क्या वही मतदाता इसे भूल पाएगा?सामाजिक ताने-बाने की दृष्टि से देखें तो समाजवादी दल की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसके भीतर का नेतृत्व अभी भी एक ही जाति के इर्द-गिर्द घूमता है। पीडीए का नारा कितना भी ऊँचा हो, जब टिकट बँटवारे की बारी आती है तो यादव और मुसलमान उम्मीदवारों की भरमार नजर आती है। शेष पिछड़ी जातियाँ, दलित और अन्य वर्ग को प्रतीकात्मक भागीदारी मिलती है। यह विरोधाभास मतदाता भली-भाँति जानता है।इसी तरह धार्मिक प्रतीकों का उपयोग भी सतही लगता है। जो दल दशकों से एक विशेष वर्ग के तुष्टीकरण के लिए जाना जाता हो, वह अचानक हनुमान चालीसा गाने लगे तो जनता को यह स्वाभाविक नहीं लगता। मतदाता जानता है कि यह परिवर्तन हृदय से नहीं, मतपेटी से उपजा है। राजनीति में यह दाँव कभी-कभी चल जाता है, लेकिन जागरूक मतदाता के सामने यह ज्यादा देर नहीं टिकता।

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उत्तर प्रदेश का मतदाता अब पहले से कहीं अधिक समझदार हो गया है। 2017 और 2022 के चुनावों ने यह सिद्ध कर दिया कि जाति और धर्म के समीकरण तो काम करते हैं, लेकिन शासन की विश्वसनीयता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। जो दल सत्ता में रहते हुए कानून-व्यवस्था नहीं संभाल पाया, जो दल जातिगत भेदभाव के आरोपों से घिरा रहा, वह दल केवल सामाजिक माध्यमों पर तस्वीरें बदलकर जनता का मन नहीं जीत सकता।2027 का विधानसभा चुनाव समाजवादी दल के लिए असली परीक्षा होगी। अखिलेश यादव की नई सामाजिक अभियांत्रिकी कितनी कारगर होगी, यह तो समय ही बताएगा। लेकिन इतना तय है कि केवल नारे बदलने से, केवल प्रतीक बदलने से राजनीति नहीं बदलती। जनता को चाहिए ठोस काम, सुरक्षा और न्याय। समाजवादी दल यदि वास्तव में बदलाव चाहता है तो उसे अपने भीतर झाँकना होगा, अपनी कार्य संस्कृति बदलनी होगी, अपने नेताओं की जवाबदेही तय करनी होगी और जाति की दीवारों से बाहर निकलना होगा। जब तक यह नहीं होता, ‘माय’ से पीडीए और पीडीए से बजरंगबली तक का यह सफर केवल चुनावी स्वाँग बना रहेगा। और उत्तर प्रदेश का मतदाता इस स्वाँग को पहचानना सीख चुका है।


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