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Reading: मप्र उपचुनाव में भाजपा की जीत के मायने और भविष्य
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INDIAMIX > राजनीति > मप्र उपचुनाव में भाजपा की जीत के मायने और भविष्य
राजनीति

मप्र उपचुनाव में भाजपा की जीत के मायने और भविष्य

MAKARDHWAJ TIWARI
Last updated: 18/11/2020 2:38 PM
By
MAKARDHWAJ TIWARI
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10 Min Read
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मप्र में हालिया हुए उपचुनाव मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया व प्रदेश कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष कमलनाथ की साख से जुड़े चुनाव हुये थें, जिनमें बम्पर जीत हासिल शिवराज व सिंधिया ने अपनी साख को बचाया जबकि कमलनाथ की साख पर बट्टा अवश्य लगा. इस लेख में हम इन चुनावों के परिणामों के विभिन्न पहलुओं पर बात करेंगे.

मप्र उपचुनाव में भाजपा की जीत के मायने और भविष्य

इस साल मार्च में ज्योतिरादित्य  सिंधिया और उनकी टीम की बगावत के बाद बनी भाजपा की सरकार को बचाने तथा सिंधिया की साख को कसौटी पर कसने का पर्याय बन चुके मप्र उपचुनावों का परिणाम दिवाली से पहले 10 नवम्बर को आया। मप्र कांग्रेस के बड़े-बड़े दावों तथा विभिन्न राजनितिक विश्लेषकों के दावों के बीच भाजपा ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन करते हुये 19 सीटें हासिल की जबकि कांग्रेस को 9 सीटें मिली, बसपा ने भी अपना दम दिखाया शुरूआती रुझानों में 2 सीटों पर आगे रही लेकिन अपनी बढ़त को जीत में नहीं बदल पाई। भाजपा को इन चुनावों में कुल 49.5% मत प्राप्त हुये, कांग्रेस को 40.5% मत मिले जबकि बसपा ने 5.75% मत हासिल किये।

इस चुनाव में सिंधिया व शिवराज के साथ कमलनाथ की प्रतिष्ठा दाव पर थी, भाजपा के पास अपनी खोई हुई सीटें पुनः पाने का दबाव था। ऐसे में हम इन चुनावों का विश्लेषण भी मुख्यतः इन्ही बिन्दुओं के आधार पर करेंगे, जिससे आप इन उपचुनावों के परिणामों के मायने को आसानी से समझ सकेंगे।

भाजपा के लिहाज से  उपचुनावों के परिणाम –

2018 के विधानसभा चुनाव में इनमें से  27 सीटों पे कांग्रेस का कब्ज़ा था लिहाजा भाजपा के सामने इन सीटों पर जीतने और इन्हें पुनः अपने पाले में लाने की चुनौती सबसे बड़ी थी, इसके अलावा कांग्रेस द्वारा अपने दल को छोड़ भाजपा में आये इन नेताओं को लेकर क्षेत्र में किये जा रहे नकारात्मक दुष्प्रचार को साधने की चुनौती भाजपा के सामने मुश्किल खड़ी कर रही थी। भाजपा का संगठन इन दोनों चुनौतियों को समझ रहा था। यही कारण रहा की उपचुनाव की तारीख की घोषणा होने से पहले सरकार ने इन सभी विधानसभा क्षेत्रों में दनादन विभिन्न विकास कार्यों का शिलान्यास, लोकार्पण आदि किये। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व सिंधिया उपचुनाव की तारीख आने से पहले हर सीट पर 2-3 दफा पहुच चुके थें। चुनावों में भी भाजपा का खेमा शिवराज-ज्योति-शर्मा के नेतृत्व में कांग्रेस के मुकाबले अधिक सक्रीय व प्रबंधित दिखा, जिसका फल इन्हें 19 सीटों पर जीत के रूप में मिला। यह इस बात को जाहिर करता है कि प्रदेश में भाजपा कांग्रेस के मुकाबले कही अधिक संगठित, अनुशासित व प्रबंधित है जो कि उसकी सफलता का प्रमुख कारण कहा जा सकता है।

इन उपचुनावों में शामिल 19 विधायक सिंधिया समर्थक थें, जबकि 7 विधायक वो थे जिन्हें भाजपा ने तोड़ा था व 2 ( ब्यावरा तथा आगर ) के उम्मीदवार पारम्परिक भाजपाई थें। सिंधिया समर्थक विधायकों में से 13 जीतें, जबकि भाजपा समर्थक 9 उम्मीदवारों में से 6 जीत पाये। ऐसे में वर्तमान मप्र विधानसभा में सिंधिया गुट को छोड़ के भाजपा की शक्ति 107+6 = 113 विधायकों की है, जो की बहुमत से 2 कम हैं, इनमें सिंधिया गुट के 13 विधायकों को जोड़ने के बाद यह संख्या 126 हो जाती है जो की भाजपा की सरकार को स्थायित्व दे रहा है। इन परिणामों ने भाजपा में सिंधिया की स्थिति को मजबूत करने के साथ उनका कद भी बड़ाया है, शीघ्र ही सिंधिया को केन्द्रीय मंत्रिमडल में शामिल कर भाजपा उन्हें इस परिणाम का पुरस्कार भी देगी। 

यह चुनाव नवीन भाजपा प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा के नेतृत्व में पहला चुनाव था, जिसमें पार्टी का प्रदर्शन आशा के अनुकूल रहा, मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर इन चुनावों के परिणामों ने एक बार फिर मोहर लगाई हैं, लिहाजा इन दोनों नेताओं का कद भाजपा में बड़ा है। केन्द्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की छवि व पार्टी में इनकी स्थिति को इन चुनाव परिणामों से जरूर थोडा नुकसान हुआ है। इनके गृह व संसदीय क्षेत्र मुरैना तथा चम्बल संभाग में ही भाजपा ने कमजोर प्रदर्शन किया है, जिसकी वजह से अगर भविष्य में तोमर का कद थोड़ा घटता हुआ दिखे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

कांग्रेस के लिहाज से चुनाव परिणाम –

कांग्रेस के लिहाज से इन चुनावों के परिणाम चिंताजनक कहें जा सकतें हैं। इन परिणामों ने प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ के नेतृत्व तथा उनके चुनावी प्रबंधन की क्षमता पर गंभीर प्रश्न खड़े कियें हैं। मुख्यमंत्री रहते हुये कमलनाथ सिंधिया व उनके गुट को नहीं सम्भाल पाये थें जिसकी वजह से एक दशक से अधिक के इंतज़ार के बाद प्रदेश में बनी कांग्रेस सरकार भंग हुई थी, इस उपचुनाव में भी कांग्रेस अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी, जो कि उनकी नेतृत्व क्षमता पर प्रश्न खड़े करता है।

मप्र कांग्रेस ने यह चुनाव कमलनाथ के चेहरे व उनके नेतृत्व में लड़ा था लेकिन यहां कांग्रेस भाजपा के समान एकजुट नहीं दिखी थी। यही कारण रहा कि दिग्विजय सिंह, अजय सिंह, अरुण यादव आदि अन्य बड़े नेता चुनावों के समय काफी देर से सक्रिय हुये। इन के साथ कमलनाथ का तालमेल भी कम दिखा। शायद कमलनाथ को उनके सलाहकारों ने यह सलाह दी थी अकेले यह चुनाव वो अपने दम पर जीता सकते हैं, इसलिये उन्होंने अन्य नेताओं को न पर्याप्त स्पेस दिया न ही उनका सहयोग लिया, जो कि भारी पड़ा। कांग्रेस की इस बड़ी हार का नकारात्मक प्रभाव अगर किसी नेता पर सबसे अधिक पड़ेग तो वो कमलनाथ ही है। यही कारण है कि इनको आलाकमान ने दिल्ली तलब किया है व कठिन सवाल जवाब करते हुये हार की विस्तृत समीक्षा रिपोर्ट मांगी है।

इस हार ने कांग्रेस के कमजोर संगठन की पोलखोल के रख दी साथ ही कांग्रेस के अंदर बने खेमों पर चढ़ा पानी भी उतार दिया है। अगर कांग्रेस खेमों में न बंटी होती और संगठनात्मक रूप से मजबूत होती तो शायद हमें इन चुनावों में अच्छी टक्कर देखने को मिलती। इस बात का एहसास अब शीर्ष कांग्रेस नेतृत्व को भी हो गया है, यही कारण है कि विस्तृत समीक्षा के बाद विभिन्न नेताओं की जिम्मेदारी तय कर उनसे जवाब मांगने और कई नेताओं के विरुद्ध कार्यवाही करने का मन बनाये हुये कांग्रेस आलाकमान हमें दिखाई दे रहा है। 

इन उपचुनावों के परिणाम के बाद कांग्रेस में हमें आमूलचूल परिवर्तन देखने को अगर मिलता है तो वो अच्छा रहेगा। कमलनाथ वर्तमान में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के साथ नेता प्रतिपक्ष के पद पर भी काबिज है, भविष्य में उनसे अगर कोई एक पद छीन लिया जाये तो आश्चर्य नहीं होना चाहिये। इसीप्रकार उपचुनाव से पहले नियुक्त विभिन्न पदाधिकारियों व पुराने पदाधिकारियों में से कइयों की पदों से छुट्टी देखने को मिल सकती है, इसीप्रकार विभिन्न पदों पर नए व ऊर्जावान कार्यकर्ता देखें जा सकतें हैं। ऐसे में अगर हम आने वाले दिनों में कांग्रेस में बड़ी संगठनात्मक सर्जरी देख सकतें है, अगर ऐसा नहीं हुआ तो मप्र में कांग्रेस की स्थिति और कमजोर होगी।

मप्र के लिहाज से प्रदेश को अब स्थायी व मजबूत नेतृत्व मिला है, जो प्रदेश के विकास में सक्षम है, जिसल प्रदर्शन अपने पिछले कार्यकालों में शिवराज सरकार ने किया भी है। ऐसे में प्रदेश की जनता की इस सरकार से उम्मीदे भी बड़ी है, इसके अलावा शिवराज सिंह चौहान के सामने सरकार चलाने के साथ मूल भाजपाई व सिंधिया समर्थकों को साधने के साथ संतुलन बनाके व्यवहार करने की चुनौती भी है। जिस शिव-ज्योति एक्सप्रेस की बात हर सभा में शिवराज सिंह व ज्योतिरादित्य सिंधिया ने की है, अब उसके विकास की पटरी पर सरपट दौड़ने की आस में प्रदेश की जनता के मन मे है साथ ही अतिथि शिक्षकों, किसानों, युवाओं, बेरोजगारों व महिलाओं से किये गये विभिन्न वायदों को निभाने की चुनौती भी इस सरकार के सामने है। आप के साथ हम भी अब आगे-आगे देखते हैं, होता है क्या। 

कुल मिलाकर अंत में यह कहा जा सकता है कि इस चुनाव में शिवराज सिंह चौहान व ज्योतिरादित्य सिंधिया की जोड़ी ने जीत दर्ज की है जबकि कमलनाथ की एकला चलो रे की नीति से पार्टी को नुकसान हुआ है। अब भाजपा के सामने प्रदेश की इच्छाओं, आकांक्षाओं व अपने वायदों को पूर्ण करने की चुनौती है वहीं कांग्रेस के सामने आत्ममंथन के साथ अपने संगठनात्मक ढांचे में बड़ा व निष्पक्ष सुधार करने की चुनौती पुनः उठ खड़ी हुई है, जिसकी कसौटी पर AICC व PCC की परीक्षा होनी है।

डिस्क्लेमर

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  • Mritunjya 2008 says:

    ये तो होना ही था

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