उत्तरप्रदेश : बीजेपी की राजनीति में हाशिए पर खिसकता वैश्य प्रतिनिधितत्व

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वैश्य वोटर जिनकी सरकारी नौकरी से लेकर व्यापार के क्षेत्र तक में अच्छी खासी पकड़ है कि कभी राजनीति में अच्छी खासी दखलंदाजी हुआ करती थी,वैश्य बिरादरी के मुख्यमंत्रियों की बात की जाए तो वैश्य समाज के बड़े नेता चन्द्रभानु गुप्त, बनारसी दास गुप्त और राम प्रकाश गुप्ता प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं

उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव 2022

लखनऊ/संपादकीय उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी राजनैतिक बढ़त बनाने के लिए पूरी तरह से सक्रिय है.हर उस सियासी ‘पेंच’ को कसा जा रहा है जो थोड़ा भी ‘ढीला’ नजर आ रहा है। रूठे नेताओं और सहयोगियों को मनाया जा रहा है. वोटरों की नाराजगी दूर करने के लिए भी बीजेपी आलाकमान द्वारा रणनीति बनाई जा रही है.जातीय गोलबंदी को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग जाति के नेताओं से मुलाकात करके गिले-शिकवे दूर किए जा रहे हैं.जाट, दलित, ब्राहमण, निषाद, राजभर, कुर्मी,पटेल जिसकी भी नाराजगी या गुस्सा सामने आ रहा है,सभी बिरादरी के वोटरों की नाराजगी दूर करके लामबंद किया जा रहा है.इसे किसी तरह से गलत भी नहीं कहा जा सकता है, लेकिन मान मनौव्वल उन लोगों का नहीं हो रहा है जो योगी सरकार से नाराज तो हैं,लेकिन अपनी नाराजगी खुलकर सामने नहीं रख रहे हैं.बातते चलें कि यूपी की कुल जनसंख्या में वैश्य समाज की हिस्सेदारी करीब 17 प्रतिशत है,इसमें वैश्य समाज के आने वाले व्यापारियों की संख्या भी जोड़ दी जाए तो यह प्रतिशत 40 फीसदी से ऊपर हो जाता है,जो कई चुनावों में निर्णायक साबित होता रहा है.वैश्य समाज की कई बिरादरियां पिछड़ा वर्ग में भी आती है,जिसमें तमोली, बरई चौरसिया तेली, रौनियार, भुर्जी, भड़भूजा, भंूज,कांदू,कसौधन,सोनार, साहू, सुनार, स्वर्णकार, मोदनवाल, ताम्रकार, पटवा, पटहारा, पटेहरा,देववंशी, कलाम, कलवार,कलार शामिल हैं.

वैश्य वोटर जिनकी सरकारी नौकरी से लेकर व्यापार के क्षेत्र तक में अच्छी खासी पकड़ है कि कभी राजनीति में अच्छी खासी दखलंदाजी हुआ करती थी,वैश्य बिरादरी के मुख्यमंत्रियों की बात की जाए तो वैश्य समाज के बड़े नेता चन्द्रभानु गुप्त, बनारसी दास गुप्त और राम प्रकाश गुप्ता प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं.एक समय विधान सभा में वैश्य विधायकों की अच्छी खासी संख्या हुआ करती थी,जो समय के साथ लगातार घटती जा रही है. 70-80 के दशक में वैश्य विधायकों की संख्या अच्छी खासी हुआ करती थी.लेकिन जब से यूपी की राजनीति में क्षेत्रीय दलों का दबदबा बढ़ना शुरू हुआ तब से वैश्य जनप्रतिनिधियों की संख्या लगातार घटती गई. इसी लिए 2007 में तो मात्र 17 वैश्य नेता विधायक बन पाए थे, इसके अलावा भी अलग-अलग विधान सभाओं में वैश्य जनप्रतिनिधित्व करीब-करीब न के बराबर ही रहा. 2002 के विधान सभा चुनाव में 20,  2012 के विधान सभा चुनाव में 19 और 2017 में 27 वैश्य नेता ही विधायक बन पाए थे.    वैश्य मतदाताओं की सबसे अधिक नाराजगी भारतीय जनता पार्टी से है क्योंकि वैश्य वोटर परंपरागत रूप से भाजपा के कोर वोटर माने जाते हैं,लेकिन इन्हें न संगठन में महत्वपूर्ण स्थान मिलता है न ही पार्टी मंच पर इनको जगह मिलती है,वैश्य वोटरों को सिर्फ धन(चंदा) उगाही का हथियार बना दिया गया है.

अखिल भारतीय वैश्य एकता परिषद के अध्यक्ष डा0सुमंत गुप्ता आरोप लगाते हैं कि बीजेपी के मंच के लिए माला और माइक तो हमारा होता है,लेकिन मंच पर वैश्य समाज के नेताओं को जगह नहीं मिलती है.संगठन में पद के नाम पर उन्हें सिर्फ कोषाध्यक्ष ही बनाया जाता है.वैश्य बाहुल्य क्षेत्रों में भी टिकट बांटते समय वैश्य समाज के टिकट दावेदारों को तवज्जो नहीं दी जाती है.वैश्य वोटरों की नाराजगी को दूर करने के लिए भाजपा ने एक सम्मेलन करना भी उचित नहीं समझा है.वैश्य समाज के मुख्य नेता सत्य प्रकाश गुलहरे आरोप लगाते हैं कि वैश्य समाज का इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है कि उनके समाज के दिग्गज नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री राम प्रकाश गुप्ता को 28 अक्टूबर 2000 को ऐन दीवाली के दिन बिना कारण बताए सीएम की कुर्सी से बेदखल कर उनकी जगह राजनाथ सिंह को कुर्सी पर बैठा दिया गया. अखिल भारतीय वैश्य फेडरेशन के कार्यकारी अध्यक्ष जायसवाल अटल कुमार गुप्ता दुख प्रकट करते हुए कहते हैं कि यूपी में 17 प्रतिशत वैश्य समाज है, जिसे कोई भी दल महत्व नहीं देता है.ऐसा इस लिए है क्योंकि भाजपा आलाकमान को लगता है कि वैश्य समाज भाजपा का बंधुआ वोटर है.वह कहीं जाने वाला नहीं है.उधर, वरिष्ठ व्यापारी नेता संदीप बंसल कहते हैं कि यह सच है कि वैश्य वोटरों के सहारे ही प्रदेश में भाजपा सत्ता में आई है,लेकिन व्यापारियों की चिंताओं का किसी को ध्यान नहीं है.सबसे अधिक नुकसान व्यापारियों को ऑन लाइन व्यापार से हो रहा है,जिसका समाधान किया जाना बेहद जरूरी है,ऑल लाइन व्यापार ने ऑफ लाइन व्यापारियों की कमर तोडऋ कर रख दी है. वहीं भाजपा के दिग्गज नेता नटवर गोयल कहते हैं कि वैश्य समाज को सबसे अधिक सम्मान भाजपा में ही मिलता है और वैश्य वोटर पूरी तरह से भाजपा के साथ है.

इसके अलावा भी कई कारण हैं जिसकी वजह से वैश्य वोटर नाराज बताए जा रहे हैं.यह नाराजगी वैश्य समाज के बड़े नेता और योगी सरकार में मंत्री राजेश अग्रवाल को योगी कैबिनेट से बाहर किए जाने के बाद और भी बढ़ गई थी। इसके बाद गोरखपुर के होटल में पुलिस की पिटाई से प्रॉपर्टी डीलर मनीष गुप्ता की मौत ने वैश्य समाज की नाराजगी और भी बढ़ा दी। वैश्य समाज ने गुस्से में आकर योगी सरकार, पुलिस प्रशासन के विरुद्ध निंदा प्रस्ताव तक पारित कर दिया। वैश्य एकता परिषद के राष्ट्रीय महासचिव सुधीर गुप्ता कहते हैं कि मनीष की हत्या में जो भी पुलिसकर्मी लिप्त थे,उन्हें जल्द से जल्द सुनवाई करके सजा सुनाई जाना चाहिए.यूपी में वैश्य आबादी दस प्रतिशत के करीब है। इसमें ज्यादातर व्यापारी वर्ग आता है। व्यापारियों के लिए कानून व्यवस्था हमेशा ही बड़ा मुद्दा रहता है। क्योंकि यह लोग आसानी से लूटपाट करने वालों का शिकार बन जाते हैं। इनके ही साथ अपराध की सबसे अधिक घटनाएं होती हैं।

इसके अलावा भी वैश्य समाज बीजेपी से अक्सर सवाल पूछता रहता है कि 25 करोड़ की आबादी वाले देश के सबसे बड़े राज्य से एक भी वैश्य समुदाय का व्यक्ति केन्द्र सरकार में मंत्री क्यों नहीं है। उत्तर प्रदेश सरकार में वर्तमान में एक मात्र वैश्य नेता को कैबिनेट मंत्री बनाया गया है और वो भी महत्वहीन विभाग का ? उत्तर प्रदेश की शीर्ष ब्यूरोक्रेसी के तीन अहम पदों मुख्य सचिव, डीजीपी और अपर मुख्य सचिव गृह के पद पर सत्तारुढ़ भाजपा के कार्यकाल में एक भी वैश्य अफसर को जगह नहीं दी गयी?    ज्ञातव्य हो कि कभी वैश्य समाज का बीजेपी (जनसंघ) में दबदबा रहता था। जनसंघ काल से हमेशा वैश्यों ने पार्टी का साथ दिया। अकेले यूपी में चन्द्रभानु गुप्ता, बाबू बनारसी दास और राम प्रकाश गुप्ता जैसे दिग्गज वैश्य नेता मुख्यमंत्री बने। जब पहली बार राज्य में कल्याण सिंह की सरकार 1991 में बनी तो वैश्य समाज से 5 कैबिनेट मंत्री बनाये गये। यही हाल दोबारा सत्ता में आयी भाजपा का 1997-2002 के बीच रहा लेकिन अचानक ऐसा क्या हुआ कि 2017 में भाजपा की जीत के आधार स्तंभ रहे वैश्यों को दरकिनार कर दिया गया? चुनिंदा नेताओं को जगह तो मिली लेकिन विभाग महत्वहीन। यह बात वैश्य समाज में अंदर तक घर कर गई है। वैश्य समाज का करीब 120 विधान सभा सीटों पर दबदबा है और वह यहां निर्णायक भूमिका में रहते हैं.लब्बोलुआब यह है कि वैश्य समाज भले ही मुखर होकर किसी दल का विरोध या पक्ष नहीं ले रहा हो,लेकिन वैश्य वोटरों की अनदेखी किसी भी दल को भारी पड़ सकती है.

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