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Reading: मप्र उपचुनाव विशेष : डबरा विधानसभा का संक्षिप्त राजनीतिक विश्लेषण
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INDIAMIX > राजनीति > मप्र उपचुनाव विशेष : डबरा विधानसभा का संक्षिप्त राजनीतिक विश्लेषण
राजनीतिमध्यप्रदेश उपचुनाव विशेष

मप्र उपचुनाव विशेष : डबरा विधानसभा का संक्षिप्त राजनीतिक विश्लेषण

MAKARDHWAJ TIWARI
Last updated: 10/10/2020 5:49 PM
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MAKARDHWAJ TIWARI
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14 Min Read
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प्रदेश में आगामी महीने होने जा रहे उपचुनावों के मद्देनजर हमने आपके साथ विभिन्न विधानसभा सीटों का राजनितिक विश्लेषण शुरू किया है. इसी क्रम इस लेख में ग्वालियर जिले की आरक्षित डबरा विधानसभा सीट की चर्चा करेंगे.

मप्र उपचुनाव विशेष : डबरा विधानसभा का संक्षिप्त राजनीतिक विश्लेषण

मप्र शासन के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव वाली ग्वालियर जिले की इस बहुचर्चित आरक्षित सीट से भाजपा की उम्मीदवार हैं सिंधिया समर्थक, शिवराज सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी, जिनका सामना पूर्व भाजपा नेता, इनके पारिवारिक रिश्तेदार ( समधी ) सुरेश राजे करेंगे. फ़िलहाल यहाँ बसपा या किसी अन्य ने कोई उम्मीदवार नहीं दिया है, अतः मुकाबला इन दोनों उम्मीदवारों के मध्य ही माना जा रहा है.

इस सीट का बैकग्राउंड समझने के लिए हमें इस सीट के संक्षिप्त इतिहास को जानना होगा

सीट का संक्षिप्त इतिहास 

2008 के परिसीमन के बाद यह सीट SC वर्ग के लिए आरक्षित हुई, इससे पहले यह अनारक्षित विधासनभा थी. 1977 के बाद इस सीट पर हुए 10 मुख्य विधानसभा चुनावों में यहाँ से 5 बार भाजपा तथा जनता पार्टी का विधायक चुना गया है, लेकिन यह सभी विधायक सीट के आरक्षित होने के पहले चुने गये हैं. परिसीमन के बाद हुये तीन चुनावों में कांग्रेस की इमरती देवी यहाँ से लगातार जीती है, इसके पहले कांग्रेस के नरसिंह राव पंवार 1985 में यहाँ से कांग्रेस के विधायक चुने गये थें. यहाँ से बसपा भी एक बार अपना विधायक विधानसभा में भेजने में सफल हुई है. 1993 में जवाहर सिंह रावत यहाँ से बसपा के विधायक चुने गये थें. 

मप्र सरकार के वर्तमान गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का गृह क्षेत्र होने के कारण उनका इस सीट पर विशेष प्रभाव है, उन्होंने यहाँ से 4 बार चुनाव लड़ा है तथा तीन बार विधायक रहें हैं. इस सीट पर भाजपा लगभग एक दशक से मिश्रा की छाया में चुनाव लडती आई है, इस बार भी इनपर भाजपा का बड़ा दारोमदार टिका है. 

सीट के राजनितिक इतिहास को देखने के बाद यह कहा जा सकता है की इस सीट पर 2008 के बाद भाजपा के लिए खड़ी हुई मुश्किल अब हल हो सकती है, भाजपा यहाँ लगभग एक दशक के इंतज़ार के बाद वापसी कर सकती है.

 जातीय तथा अन्य समीकरण

2 लाख 27 हजार मतदाताओं वाली इस विधानसभा में SC वर्ग के 42 हजार मतदाता हैं, जिसमें से सबसे अधिक 30 हजार के लगभग जाटव समाज के हैं. विधानसभा का दूसरा सबसे बड़ा मतदाता समूह सामान्य वर्ग का है, जिसके करीब 42 हजार मतदाता हैं, जिसमें 8 हजार राजपूत,  22 हजार ब्राह्मण तथा 12 हजार बनिया बिरादरी से हैं. इसके अतिरिक्त ओबीसी वर्ग के कुल 75 हजार मतदातों में कुशवाहा समाज के 15 हजार, बघेल समाज के 14 हजार, कोरी 11 हजार, सिन्धी 6 हजार, सिक्ख 3 हजार तथा मुस्लिम समाज के 17 हजार मत निर्णायक हैं. 

इस विधानसभा का जातीय गणित शुरू से जटिल रहा है, परिसीमन से पहले जातीय संघर्ष का लाभ, भाजपा सवर्ण समाज के ब्राह्मण उम्मीदवार को खड़ा कर उठा लेती थी, लेकिन 1990 के बाद यहाँ बसपा के उभार के कारण भाजपा को पिछड़ा मतदाताओं की ओर निर्भर होना पड़ा. बसपा यहाँ कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को ज्यादा नुकसान पंहुचाती है, वो यहाँ SC वर्ग व पिछड़ा वर्ग के उन मतों का बड़ा हिस्सा अपनी तरफ खिचती है जो कांग्रेस के पाले में नहीं जा रहे थें. यही कारण रहा की 2008 के बाद इस सीट पर भाजपा कांग्रेस के दलित, पिछड़ा मतों के गठजोड़ का मुकाबला अपने पारम्परिक वोटों से नहीं कर पाई, और तीनों बार भाजपा का उम्मीदवार इमरती देवी के सामने बड़े अंतर से हारा. भाजपा के उम्मीदवार को औसतन 25% मत मिले, जो की विधासनभा में इसके कोर मतदाता माने जाने वाले जातीय समूह की मत संख्या के लगभग बराबर ही है. 

हालाँकि अब यहाँ स्थितियां थोड़ी बदली हुई है, इमरती देवी के भाजपा में आने के बाद क्षेत्र के जातीय-संतुलन में भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

वर्तमान राजनीतिक स्थिति

विधानसभा की वर्तमान राजनीतिक स्थिति बदली हुई है, यह स्थिति भाजपा के लिये अनुकूल व कांग्रेस के लिए प्रतिकूल कही जा सकती हैं. इस विधानसभा में कांग्रेस के जीतने में इमरती देवी की पारिवारिक व सामाजिक पृष्ठभूमि के साथ सिंधिया का योगदान हमेशा महत्वपूर्ण था. यही कारण रहा है की 2008 में इमरती देवी ने रोचक चुनाव में बसपा के हरगोविंद जौहरी, भाजपा के कमलापत राय, लोजपा के फूलसिंह बरैया जैसे दिग्गजों को हराया था, 2013 में इमरती देवी ने भाजपा के तत्कालीन व कांग्रेस के वर्तमान उम्मीदवार सुरेश राजे को 26.4% मतों के अंतर से हराया था तथा 2018 के विधासनभा चुनाव में भाजपा के कप्तान सिंह को 39.1% मतों के अंतर से हराया था, हालाँकि पिछले चुनाव में इन्होने सुरेश राजे को कांग्रेस में शामिल करवाया था जिसकी वजह से राजे के समर्थकों के मत भी इन्हें मिले व किसान कर्ज माफ़ी के नारे का भी विधानसभा में काफी शोर था. लेकिन इनके बावजूद भी इमरती देवी के प्रभाव को कम नहीं आँका जा सकता.

वर्तमान स्थिति में इमरती देवी के पास अपने समर्थकों के साथ विधानसभा के कई पूर्व कांग्रेस नेताओं का भी समर्थन हैं, पूर्व कांग्रेस जिलाध्यक्ष मोहनसिंह राठौर तो इमरती देवी के साथ क्षेत्र में प्रचार करते हुये भी देखें जा रहें हैं. एक अनुमान के अनुसार इमरती देवी के जाने के बाद क्षेत्र के लगभग 40% प्रभावशाली कांग्रेसी भाजपा के खेमे में आ बैठे है, इससे इमरती देवी की मजबूती का अंदाजा लगाया जा सकता है. 

कांग्रेस यहाँ पूर्व मंत्री डॉ गोविन्द सिंह व भितरवार विधायक लाखन सिंह के भरोसे है, ये दोनों क्षेत्र में लगातार मेहनत भी कर रहें हैं, लेकिन इमरती व सिंधिया फेक्टर के कारण हुए नुकसान की भरपाई इतनी जल्दी होती नहीं दिख रही है. यहाँ कांग्रेस दल बदल को लेकर भी ज्यादा चुनावी शोर नहीं कर सकती, क्यूंकि उनका उम्मीदवार भी दशकों तक भाजपा से राजनीति करने के बाद अब कांग्रेस से चुनावी मैदान में आया है. स्थानीय चुनावी विश्लेषकों के एक धड़े का यह भी मानना है की सुरेश राजे, इमरती देवी के सामने मजबूती से चुनाव नहीं लड़ पायेंगे. ऐसा उन क्षेत्रों में देखा जा सकता है जहा सजातीय मत समुदाय हो, ऐसे मतदाता वर्ग के मध्य सामाजिक-पारिवारिक मसले भी बड़ा चुनावी मुद्दा बन जातें हैं.

इमरती देवी को लेकर यहाँ पर थोड़ी नाराजगी भी क्षेत्र की जनता के मध्य देखी जा सकती है, लेकिन यह आम मतदाता के मन में उस रूप में नहीं है जो कोई बड़ा प्रभाव डाल सके, हालाँकि सुरेश राजे को स्वयं के पारिवारिक, क्षेत्रीय व सामाजिक समर्थकों के साथ स्थानीय कांग्रेस का बल थोडा मजबूत जरूर बनाता है, लेकिन उनके जीतने के लिए यह काफी नहीं हैं. लेकिन, यह कहा जा सकता है की वो इमरती देवी के सामने कड़ा मुकाबला जरूर खड़ा कर सकतें हैं. 

यहाँ जीत की चाबी इस समय बसपा के हाथों में दिख रही है, बसपा भी शायद इस बात की गंभीरता को समझ रही है, शायद इसी लिए यहाँ से उम्मीदवार की घोषणा करने में विलम्ब कर रही है, अगर बसपा ने यहाँ टिकट नहीं मिलने से नाराज बताई जा रही सत्यपरकाशी परसेडिया या किसी अन्य को मजबूत सामाजिक-पारिवारिक छवि वाले को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया तो चुनाव रोचक हो सकतें हैं. बसपा अगर यहाँ कमजोर उम्मीदवार देती है तो इमरती देवी को चुनाव जीतने में आसानी होगी. 

इस सीट पर राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ मप्र शासन के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की प्रतिष्ठा भी दाव पर लगी है, भाजपा के पक्ष में यहाँ सामान्य व पिछड़ा वर्ग के मतदाताओं को साथ लाने की जिम्मेदारी यहाँ मिश्रा की ही है, इस सीट से तीन बार विधायक रहने के कारण प्रत्येक गाँव व बूथ के कार्यकर्ता से मिश्रा का परिचय है, जिसकी वजह से उनकी भूमिका यहाँ बढ़ जाती हैं. कांग्रेस के उम्मीदवार सुरेश राजे सार्वजनिक रूप से नरोत्तम मिश्रा को अपना राजनितिक गुरु कहते है, ऐसे में अगर उनका चेला विरोधी पार्टी से जीत कर विधायक बन जाए तो उनकी राजनितिक प्रतिष्ठा पर आघात होना स्वाभाविक है.

प्रमुख मुद्दे 

इस सीट के बहुसंख्यक पिछड़ा व अनुसूचित जाति वर्ग के मतदाताओं का प्रमुख व्यवसाय किसानी है साथ ही विधानसभा का व्यापार भी मुख्यतः कृषि उत्पादों पर ही टिका है, ऐसे में यहाँ सबसे बड़ा मुद्दा खेती-किसानी ही है.

यहाँ किसान कर्जमाफी इतना बड़ा मुद्दा नहीं हैं, अधिकतम किसान इस मुद्ददे पर अपना कांग्रेस के विपक्ष में दिख रहें हैं, यहाँ पर मुआवजा बड़ा मुद्दा दिख रहा है, पिछले दिनों किसानों ने इसी विषय पर इमरती देवी का घेराव भी किया था. फसल बीमा योजना का लाभ क्षेत्र में किसानों को ढंग से नहीं मिला है, जिसकी नाराजगी देखी जा रही है, इन मुद्दों को कांग्रेस चाहे तो समझदारी से भुना के भाजपा को नुकसान पहुचा सकती हैं. हालाँकि भाजपा को यहाँ किसान सम्मान निधि व हाल ही में किये गए कृषि सुधार कानूनों का लाभ मिल सकता है, लेकिन इनके लाभों से किसानों को परिचित करवाना भाजपा के सामने एक चुनौती है, भाजपा का मानना है की वो अपने संगठन तथा किसान मोर्चा के बल पर कृषि सुधार कानूनों को लेकर फैलाये जा रहें भ्रम का निराकरण कर लेगी तथा कांग्रेस द्वारा की गई विफल किसान कर्ज माफ़ी से किसानों को परिचित करवाएगी.

इस क्षेत्र के धान व गन्ना उत्पादक किसान क्षेत्र में लम्बे समय से बेहतरीन सिंचाई सुविधा की मांग कर रहें हैं, क्षेत्र के लोगों का कहना है की लघेडा डैम के पुनः चालू होने से सिंचाई की समस्या का काफी हद तक निराकरण हो सकता है, साथ ही किसानों की मांग नजदीक ही चावल व गन्ना मिल स्थापित करने की है, जिससे उन्हें अपना माल ग्वालियर, आगरा आदि जगहों पे नहीं बेचना पड़े, उन्हें उनके माल का उचित मूल्य उनके नजदीक ही मिले. 

क्षेत्र में अवैध खनन का मुद्दा भी प्रमुखता से जनता के बीच है, जिसपर इमरती देवी को नुकसान हो सकता है, इसलिए कांग्रेस अवैध खनन के मुद्दे पर इन्हें घेरने का कोई भी मौका इस मुद्दे को भुनाने के लालच में नहीं छोड़ रही है. 

यह क्षेत्र पान उत्पादन के लिए भी काफी प्रसिद्ध है, यहाँ के पान उत्पादक काफी समय से सरकार से संरक्षण की गुहार लगा रहें है, यही कारण है की भाजपा यहाँ पान अनुसन्धान केंद्र बनाने के नाम पर इन्हें लुभाने का प्रयास कर रही है जबकि कांग्रेस इन्हें राहत राशि देने का दावा करती नजर आ रही हैं. 

कई विषय जैसे आगरा – मुरैना हाईवे का डबरा से होकर निकलना, सिंध नदी पर पुल का निर्माण होने से दतिया से बड़ी कनेक्टिविटी व 100 बेड का सिविल अस्पताल बनाने की प्रक्रिया आदि इमरती देवी के पक्ष में जाते दिख रहें हैं, ये विषय क्षेत्र के एक बहुत बड़े हिस्से को सीधे प्रभावित करतें हैं, ऐसे में इन्हें भुनाकर भाजपा लाभ उठा सकती है. 

डबरा विधानसभा की वर्तमान राजनितिक स्थिति पर संक्षिप्त चर्चा करने के बाद हम कह यह कह सकतें हैं की यहाँ चुनाव रोचक हो सकतें हैं, वर्तमान स्थिति में भाजपा उम्मीदवार इमरती देवी अपने विरोधी कांग्रेस उम्मीदवार तथा समधी सुरेश राजे के मुकाबले मजबूत दिखाई दे रही है. अगर बसपा यहाँ से कोई मजबूत उम्मीदवार देती है तो इमरती देवी की राह और मुश्किल हो सकती हैं.


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