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Reading: धर्म – अधर्म से परे व्यक्तिगत सत्य “कर्म ही धर्म”… हे कृष्ण से है राम तक
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INDIAMIX > अन्य > Wow इंडिया > धर्म – अधर्म से परे व्यक्तिगत सत्य “कर्म ही धर्म”… हे कृष्ण से है राम तक
Wow इंडिया

धर्म – अधर्म से परे व्यक्तिगत सत्य “कर्म ही धर्म”… हे कृष्ण से है राम तक

IndiaMIX
Last updated: 28/10/2020 1:37 PM
By
INDIAMIX - Editor
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5 Min Read
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महाभारत के युद्ध को नौ दिन हो चुके हैं. पांडव हताश हैं. उन्हें अपनी पराजय दिख रही है. नवीं रात पांडव शिविर में युधिष्ठिर कृष्ण से कहते हैं

धर्म - अधर्म से परे व्यक्तिगत सत्य "कर्म ही धर्म"… हे कृष्ण से है राम तक

सम्पादकीय / इंडियामिक्स न्यूज़ निःसंदेह भीष्म और गांधी जी सब के प्रिय थे , श्रधेय थे , उन दोनों का योगदान अतुलनीय है पर दोनो का मृत्यु कालानुसार सम है , मैं किसी प्रकार की हिंसा का समर्थन नहीं करता यह लेख सम्यास्तिथ के अनुसार तुलनात्मक विचार है ।

महाभारत के युद्ध को नौ दिन हो चुके हैं. पांडव हताश हैं. उन्हें अपनी पराजय दिख रही है. नवीं रात पांडव शिविर में युधिष्ठिर कृष्ण से कहते हैं

“विकट पराक्रमी महात्मा भीष्म हमारी सेना का उसी प्रकार विनाश कर रहे हैं जैसे हाथी सरकंडों के जंगलों को रौंद डालते हैं…अब मैं वन को चला जाऊँगा. मेरे लिए वन में जाना ही कल्याणकारी होगा. मेरी युद्ध में रुचि नहीं रही क्योंकि भीष्म हमारा विनाश कर रहे हैं. जैसे पतंगा अग्नि की ओर दौड़ा जाकर मृत्यु को प्राप्त करता है, हमने भी भीष्म पर आक्रमण कर मृत्यु का ही वरण किया है.”

अर्जुन का युद्ध से पहले मोहभंग हुआ था, युद्ध की निरर्थकता जान वह युद्धभूमि से हट जाना चाहते थे. युद्ध के बीच भीष्म के सामने अपनी पराजय अवश्यंभावी देख युधिष्ठिर रण छोड़ देना चाहते हैं. चारों भाईयों और कृष्ण से मंत्रणा के बाद उन्हें लगता है कि “देवव्रत भीष्म के पास जा उन्हीं से उनके वध का उपाय पूछा जाए”. लेकिन पितामह के प्रति यह विचार आते ही युधिष्ठिर ग्लानि से भर उठते हैं:

धर्म - अधर्म से परे व्यक्तिगत सत्य "कर्म ही धर्म"… हे कृष्ण से है राम तक

“बाल्यावस्था में जब हम पितृहीन हो गए थे, उन्होंने ही हमारा पालन पोषण किया था. माधव, वे हमारे पिता के पिता और हमारे प्रिय हैं, फिर भी मैं उनका वध करना चाहता हूँ. क्षत्रिय की इस जीविका (धर्म) को धिक्कार है.”

जीवित बचे रहे आने की आकांक्षा व पितामह की मृत्यु कामना से उपजे अपराध बोध के बीच फँसे पाँचों भाई और कृष्ण भीष्म के पास जाते हैं. युधिष्ठिर कहते हैं:

“हे सर्वज्ञ, युद्ध में हमारी जीत कैसे हो?…आप स्वयं ही हमें अपने वध का उपाय बताइए.”

और तब भीष्म कहते हैं: “यह तुम्हारे लिए पुण्य की बात है कि तुम्हें मेरे इस प्रभाव का ज्ञान हो गया है” कि मेरे रहते तुम कभी विजयी न हो सकोगे.

यह पितृ-वध का विलक्षण उदाहरण है. यहाँ इडिपल या स्त्री की तलाश निरर्थक है. यह कोरी हत्या नहीं है. भले यह वध पुत्र की आकांक्षा की परिणति है लेकिन यह पितामह की अनुमति और भागीदारी से सम्भव होता है, पितामह की प्रतिष्ठा को संवर्द्धित करता है.

घृणा से भरे गोड़से भी गांधी के योगदान को स्वीकारते थे. अदालत में उन्होंने अपने बयान में कहा था कि ट्रिगर दबाने से पहले वह गांधी के समक्ष “सम्मान में झुक गए” थे. जैसा आशीष नंदी और उनसे पहले रॉबर्ट पायने ने लिखा है कि गांधी की हत्या किसी एक इंसान ने नहीं की थी, इस कृत्य के अनेक मूक सहभागी थे, गांधी ख़ुद उनमें से एक थे. कांग्रेस के अनेक नेता निश्चित ही गांधी की मृत्यु नहीं चाहते थे, लेकिन वे गांधी को नए भारत की राह में बाधा ज़रूर मानते थे. गांधी की भी भीष्म जैसी ही स्थिति थी. गांधी की राजनैतिक संतानों को बोध हो गया था कि गांधी के रहते वे भारत को हासिल नहीं कर पाएँगे. यह बोध ज़ाहिर है गांधी को दरकिनार करते जाने के अपराध बोध का जुड़वाँ था.

यह तीखा अंतर्द्वंद्व सिर्फ़ पांडव भाईयों या कांग्रेसी नेताओं तक ही सीमित नहीं है, वे तमाम पुत्र इससे गुज़रते हैं जो पिता के प्रति आदर और उनसे उपजती असंभव चुनौतियों के बीच ख़ुद को पिसते पाते हैं.


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