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किसान आन्दोलन : किसानों की बेहतरी के नाम पर राजनीति

पूरा देश देख रहा है, पिछले एक महीने से दिल्ली की सरहदों पर देश का पेट भरने वाला किसान धरना, आन्दोलन , प्रदर्शन कर रहा हैं. मोदी सरकार द्वारा हालिया लाये गए किसानी सुधार कानूनों को लेकर उसके मन में कुछ शंकाएँ हैं, जिनका वो समाधान चाह रहा है, लेकिन निगौडी राजनीति ऐसा होने ही नहीं दे रही. आइये जानतें हैं, कैसे ?

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देश में चल रहें कोरोना संकटकाल के समय केंद्र सरकार ने आर्थिक गतिविधियों के थमने के कारण रुके बाजार को गति देने के लिए कई बड़े निर्णय लिए, जो की विभिन्न क्षेत्रों में त्वरित आमूलचूल परिवर्तन करने तथा सुधार की दृष्टि से लिए गए हैं, इनमें से प्रमुख है श्रम सुधार कानून व कृषि सुधार कानून, मोदी सरकार के इन दोनों सुधारों को लेकर विवाद है, कृषि सुधार कानूनों का ज्यादा विरोध है, जिसका गवाह दिल्ली की सरहदों पर हजारों की संख्या में बैठा पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तरप्रदेश व देश के अन्य क्षेत्रों से आया किसान है. भारतीय किसान यूनियन के साथ 34 अन्य किसान संगठन इस आदोलन का नेतृत्व कर रहें हैं. इसके अलावा स्वराज पार्टी, विभिन्न वामपंथी संगठनों तथा विपक्षी दलों का सहयोग भी इन आंदोलनों को मिलता दिख रहा है. 

किसानी सुधार कानूनों के विरोध में मुख्यतः 3 तर्क दिए जातें हैं, पहला की ये कानून मंडी व्यवस्था खत्म कर देंगे, दूसरा की MSP खत्म हो जायेगी तथा तीसरा व्यापारी किसान की जमीन पर कब्ज़ा कर लेगा. इनके अतरिक्त इस बात पर जोर दिया जा रहा है की इससे सरकार बड़े निजी उद्यमियों के लिए कृषि क्षेत्र के दरवाजे खोल रही है जिससे किसानी पर भी बड़े उद्यमियों का कब्ज़ा हो जाएगा. यही वो नैरेटिव्स है जो इन कृषि सुधारों पर हो रहे आन्दोलन को राजनितिक रंग दे रहें हैं, जिसकी वजह से मोदी सरकार धीरे-धीरे सख्त होती जा रही है. 8 दिसम्बर से पहले सरकार व किसानों के बीच कई चरणों की बात हो चुकी थी, सरकार ने किसानों की कई मांगों को मानते हुए कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव दिया था, लेकिन जिस आन्दोलन में राजनीति प्रवेश कर जाए वो कैसे किसी परिणाम पर जाएगा, यहाँ भी वही हुआ, वार्ता विफल हुई और आज तक आन्दोलनरत किसान व सरकार एक टेबल पर नहीं बैठी. 

देश के मिडिया का एक बड़ा हिस्सा इस किसान आन्दोलन को पुरे भारत के किसानों के आन्दोलन के रूप में दिखा रहा है, जबकि ऐसा नहीं हैं. हरियाणा, पंजाब व देश के अन्य हिस्सों के कई किसान संगठन, भारतीय किसान यूनियन के कई गुट जैसे भानुप्रताप, भारतीय किस्सान संघ जैसे कई किसान संगठन इन कानूनों के समर्थन में हैं. इन आन्दोलनों को गौर से देखा जाए तो पहली नजर में जिन्हें भारत में किसान कहा जाता है, लघु सीमांत छोटे किसान वो इस आन्दोलन के समर्थन में नहीं है. यहीं कारण है की दिल्ली की सरहदों पे आपको पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पश्चिमी उत्तरप्रदेश के बड़ी जोत वाले किसान ही आन्दोलन में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते दिखेंगे. इन किसान आंदोलनों को छोटे किसानों का समर्थन नहीं होना भी इसके व्यापक रूप से नहीं फैलने का का एक प्रमुख कारण है. 

किसानों की बेहतरी की मांग की बुनियाद पर शुरू हुआ किसानों का यह आन्दोलन अब राजनीति की भेंट चढ़ रहा है, जिसका कारण इन किसान संगठनों का बिना विस्तृत बातचीत का रास्ता अपनाएँ आन्दोलन की राह पकड़ना रहा, किसानों के मन में मोदी सरकार के प्रति कही न कही अविश्वास था जिसकी वजह से उन्होंने बातचीत के साथ आन्दोलन का भी रास्ता चुना, उनका मानना यह रहा की सरकार सुनेगी नहीं अतः सुनाने के लिए आन्दोलन करना होगा, इसी अविश्वास ने यहाँ विपक्ष व वामपंथी संगठनों को राजनीति करने का अवसर दिया. यहीं कारण है की सरकार के विरोध में रहने वाला हर धड़ा आज किसान आन्दोलन में सहयोगी है, हमें खालिस्तान व उमर खालिद, सरजिल इमाम, वारवरा राव जैसे देश तोड़क गैंग के समर्थक भी यहाँ दिखाई दे रहें हैं. 

किसान आन्दोलन : किसानों की बेहतरी के नाम पर राजनीति
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किसान संगठन अगर सरकार के प्रस्तावों पे ध्यान देते. समय रहते आन्दोलन खत्म करने में सहयोग करते, अगर उन्हें विश्वास होता तथा वो राजनीति से प्रेरित नहीं होते. अब जब इस आन्दोलन में राजनीति व अवांछित तत्वों की उपस्थिति सरकार को दिखने लगी है तो सरकार भी जो एक समय तक नरम थी, कठोर होती जा रही है. मोदी सरकार को भी लग रहा है की जब राजनीति ही हो रही है तो क्यूँ न राजनीति ही की जाए, इसलिए केन्द्रीय कृषि मंत्री के सहित अन्य मंत्री विभिन्न किसान संगठनों से मिल रहें है, भाजपा पुरे देश में किसान सम्मेलन करवा रही है, राजनीति के साथ इन कानूनों को लेकर प्रचार की मुहीम भी फुल ऑन चालू है. विभिन्न किसान संगठनों का समर्थन लेकर मोदी सरकार किसान आन्दोलन को कमजोर करने में सफल होती भी दिख रही है, जो की इस आन्दोलन में राजनीति के हावी होने के कारण ही होता दिख रहा है. 

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खालिस्तान के समर्थन, वामपंथियों के सहयोग, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्त्रिन ट्रूडो के विवादित बयान, किसानों के विभिन्न सगठनों का सहयोग, आन्दोलन का देशव्यापी नहीं होना व आन्दोलन में राजनीति का हावी होना एक तरह से किसानों की आवाज को बुलंद करने की वजाय उसे कुचलने का काम कर रही है. सोशल मिडिया के इस युग ने जिसमें सूचना का प्रवाह बुलेट की गति से हो रहा है ने भी इस आन्दोलन की राजनीति को सरे आम बेनकाब किया, जिसकी वजह से इसके समर्थन की गति धीमी रही. भारतीय किसान यूनियन जो की इस आन्दोलन की मुखिया है के कद्दावर नेता महेंद्र टिकैत जिस किसानी सुधार की मांग कर रहे थे, जिस कृषि सुधार की मांग यूनियन दशकों से कर रही है, जिसको पूरा करने का वादा कांग्रेस, आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियों ने किया था को ही यह सरकार ले कर आई है, ऐसे में यह आन्दोलन अगर इन कृषि सुधारों को वापस लेने की मांग करे तो इसे दोगलापन ही कहा जायेगा, यही कारण है की इन्हें क्षेत्र विशेष से बाहर के किसानों का समर्थन नहीं मिल रहा है जो की मोदी सरकार के पक्ष को ताकतवर बनाता है. 

आन्दोलनरत किसान संगठन अगर राजनीति को छोड़ कर किसान के हितों को देखे तो उन्हें सरकार के संशोधन के प्रस्तावों पर ध्यान देना चाहिए,जिसमे सरकार ने इनकी सभी बाजिब चिन्ताओं का निराकरण किया है तथा इस आन्दोलन को खत्म करना चाहिए यही किसानों के हित में हैं, नहीं तो इनकी राजनिति के चलते एक बार फिर किसानों की बेहतरी भेंट चढ़ जायेगी. ये कृषि सुधार कानूनों पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए आर्थिक सुधारों के समान ही क्रांतिकारी है, जो निश्चित रूप से किसानों के अच्छे दिन लाने में सक्षम होंगे व भारतीय कृषि क्षेत्र में बड़े क्रांतिकारी बदलाव करेंगे. अगर ये किसान संगठन वाकई में सरकार हितैषी है तो सरकार को इन्हें एक मौका देना चाहिए. 

इन कानूनों के विरोध में दिए जा रहे लेख के शुरू में वर्णित चारों तर्क वास्तविकता से दूर व भ्रम का निर्माण करने करने वाले हैं. जहाँ तक मंडियों की बात है यह कानून किसानों के सामने मंडियों के अतिरिक्त एक विकल्प दे रहा है जहाँ वह अपनी उपज बेच सके, इससे बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी व किसान को लाभ होगा. अगर किसान को अपने खेत के पास उचित मूल्य मिल रहा हो तो इससे अच्छा क्या हो सकता है ? गाँव-जवार का छोटा किसान वैसे भी अपनी उपज को अक्सर मंडी या सरकारी खरीद केंद्र नहीं बेच पाता, वो अपनी उपज को अक्सर गाँव-जवार के बड़े किसान या आनाज के व्यापारी के पास औनेपौने दामों पे बेच देता है, ऐसे में अगर इस छोटे किसान को एक नया विकल्प मिले तो इसमें गलत क्या हैं ?

दूसरी बात कही जा रही है की इससे MSP खत्म हो जायेगी, ये कैसे हो सकता है ? MSP तब खत्म होगी जब मंडियां खत्म होगी, मंडिया चालू है, किसान को अगर MSP पे बेचना है तो किसान वहां बेचे, मंडियों के अतिरिक्त बाजार में उपज का मूल्य बाजार के नियंत्रण में होगा, यही व्यावहारिक प्रक्रिया है. इन कानूनों के बाद किसान स्वतंत्र है, उसे मंडी या बाजार जहाँ उपज का वाजिब भाव मिल रहा है वो वहां बेचे, इसमें MSP खत्म होने की बात कैसे आ गई ? तीसरी बात कही जा रही है की कांट्रेक्ट फार्मिंग में व्यापारी किसान की जमीन हडप लेगा. जबकि ऐसा नहीं है, क़ानूनी रूप से जमीन को इससे अलग रखा गया है. कांट्रेक्ट उपज पर होगा जमीन पर नही. इस कानून में किसान को न जमने पर पर बीच में ही कॉन्ट्रैक्ट छोड़ने की छूट दी गई है, जबकि व्यापारी ऐसा नहीं कर सकता, सरकार ने इस विषय पर किसान को और मजबूत करने के लिए संशोधन का आश्वासन भी दिया है.

चौथी बात कही जा रही है की सरकार इससे बड़े उद्यमियों को कृषि के क्षेत्र में आने का मौका दे रही है जो आते ही खेती-किसानी पर कब्ज़ा कर लेंगे. यह फिक्स वामपंथी निति नहीं पूंजीवाद का डर दिखाना. जबकि ऐसा नहीं है, सरकार के इस निर्णय से कृषि को उद्योग के रूप में एक चेहरा मिलेगा, युवाओं के सामने किसान सहकारी संगठन बनाकर व्यापार करने का अवसर है, कृषि व इससे जुड़े फ़ूड प्रोसेसिंग के बिजनेस के बढ़ने का अवसर है, बड़े उद्यमियों के आने से किसानी के क्षेत्र में तकनिकी व संस्थानक बदलाव होंगे, जिनसे किसानों को ही फायदा है. यह कानून किसानों को सहकारी संगठन व किसानी से जुडी अन्य सुविधाओं का लाभ उठा अपना ब्रांड बनाने का अवसर दे रहें हैं. 

वस्तुतः यह  किसानी सुधार स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को धीरे-धीरे धरातल पर उतारने का प्रयास है, महेंद्र टिकैत जैसे बड़े किसान नेताओं की वर्षों पुरानी मांग को पूरा करने का एक प्रयास है, जिसमें किसानों को सरकार का सहयोग करना चाहिए, सरकार द्वारा सुझाये संशोधनों को स्वीकार्य कर, राजनीति को छोड़, किसान के हितों को मजबूत करना चाहिए. 

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