अमरीका : आधुनिक लोकतन्त्र के जनक के यहाँ अराजकता, Democracy का दुरूपयोग, Left व Right में दीर्घकालीक वैश्विक टकराव का उदय

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अमरीकी संसद में उपद्रवियों का घुस आना, सत्ता हस्तानान्तरण से पहले राजधानी व राजभवन में अराजकता, अमरीका की छवि पर बट्टा लगा गया. अमरीका दुनिया में खुद को लोकतन्त्र का पैरोकार छाती चौड़ी कर के नहीं कह पायेगा.

अमरीका : आधुनिक लोकतन्त्र के जनक के यहाँ अराजकता, Democracy का दुरूपयोग, Left व Right में दीर्घकालीक वैश्विक टकराव का उदय

दुनिया / इंडियामिक्स न्यूज़आज लोकतंत्र के जिस स्वरूप का पालन लगभग सारा विश्व करता है, जिसे आधुनिक लोकतंत्र कहा जाता है, जिसका जनक व सबसे पुराना आधुनिक लोकतंत्र होने के कारण अमरीका दुनिया में खुद को लोकतंत्र के पैरोकार के रूप में प्रस्तुत करता है. आज उस अमरीका से जो समाचार हमें सुनने को मिले वो लोकतन्त्र के समर्थकों को चिंतित करने वाले हैं. अमरीकी संसद में उपद्रवियों का घुस आना, राजधानी व राजभवन में उपद्रव, चार लोगों की असमय मृत्यु की घटना, अमरीका की छवि पर लम्बे समय तक रहने वाला बट्टा लगा गया.

अमरीका में इस बार के हुए चुनाव तथा उसके बाद जनता के सामने तथा न्यायालयों में हारने के बाद भी ट्रम्प  तथा उनके समर्थकों की ज़िद और उद्दंडता के कारण उपजे हालात में जो हुआ उसकी आशंका अमरीका की राजनीति पर निगाह रखने वाले अधिकांश विश्लेषकों ने जताई थी लेकिन जो समाचार मिले वह उनकी आशंका से कही अधिक भयावह रहें. सत्ता हस्तानान्तरण से पहले असहमति व उपद्रव की आशंका सभी को थी लेकिन गोली-बम के हालात बनेगें इसका अंदाज एक इजराइली पत्रकार के अलावा और कोई नहीं लगा सका . खैर जो हुआ सो हुआ उसे छोड़ अगर हम इन हालातों के उपजने के कारण व इस घटना के असर पर बात करतें हैं.

अमरीका : आधुनिक लोकतन्त्र के जनक के यहाँ अराजकता, Democracy का दुरूपयोग, Left व Right में दीर्घकालीक वैश्विक टकराव का उदय

अमरीका में बने इन हालातों का कारण वैश्विक व अमरीका की राजनीति में परिवर्तन, इस बार हुये दागदार चुनाव तथा डेमोक्रेसी का दुरूपयोग रहें. दुनिया के वर्तमान राजनीति फलक पर निगाह डाली जाये तो भारत, फ़्रांस, ब्रिटेन, बंगलादेश, तुर्की आदि विभिन्न देशों की बागडोर राष्ट्र व राष्ट्रवाद की बात करने वाली दक्षिणपंथी विचारधारा की तरफ झुकाव रखने वाले राजनितिक दलों के हाथ में हैं, अमरीका में ट्रम्प व उनकी रिपब्लिकन पार्टी का रुझान भी ऐसा ही है. सर्वत्र दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रभाव के विस्तार को देख वैश्विक राजनीति में आज तक बेताज बादशाह रहा वामपंथी समुदाय कही न कही परेशान है, यही कारण है की अमरीका में वामपंथी समुदाय एकाग्र व इकठ्ठा हो चुनाव लड़ा, जिसकी वजह से इस संघर्ष व उपद्रव की आशंका अमरीकी चुनाव पर निगाह रखे अधिकांश विश्लेषकों को थी. 

अमरीका में हुये इस बार के चुनाव दागदार रहें, चुनाव की प्रक्रिया के शुरू होने के पहले से लेकर आजतक हुई कई घटनाएँ मसलन ब्लेक पीपुल्स मैटर के नाम पर हुई अराजकता, एन्टीफा के साथ वामपंथियों द्वारा किये गए अराजक प्रदर्शन, चुनाव की प्रक्रिया पर उठे विभिन्न प्रश्न इस चुनाव को दागदार बनाते है. इससे पहले अमरीका में न ऐसे चुनाव हुये न ही लोकतंत्र के मंदिर के अपमान की ऐसी घटना घटी.कही न कही दागदार चुनाव व उसके कारण ट्रम्प समर्थकों में उपजी आशंका तथा इस बार के चुनावों में दोनों दलों के नेताओं के मध्य हुये व्यक्तिगत वाचिक टकराव ने इस स्थिति के निर्मित होने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. चुनावी दौर के समय में बने अशांति के माहौल के बीच इस घटना की गूंज स्पष्ट सुनाई दे रही थी. 

इस घटना के घटने में मुख्य योगदान डेमोक्रेसी की शिथिलताओं व मानवमात्र को मिले अधिकारों के दुरूपयोग का रहा है. इस बार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर यहाँ चुनाव व चुनाव के समय अनेक उपद्रव देखने को मिले जो की आगे जाकर इस टकराव की पृष्ठभूमि बने. रिपब्लिकन व डेमोक्रेट्स, दोनों ने अमरीकी डेमोक्रेसी व संविधान के लूप होल्स तथा शिथिलताओं का लाभ उठाने का पूर्ण प्रयास किया, लेकिन लाभ अनुभवी व राजनितिक व्यवस्था में लम्बी पकड़ रखने वाले वाम समर्थक डेमोक्रेट्स ने उठाया, जिसकी वजह से ट्रम्प की बौखलाहट बढती गई. राजनीति मुख्यतः धैर्य का विषय है जिसकी कमी ट्रम्प के व्यवहार व उनके कार्यकाल में हमें देखने को मिली, अपनी हार व बिडेन की सफल होती हर चाल को देख ट्रम्प ने धैर्य खोया, उन्होंने पहले चुनाव प्रक्रिया पर प्रश्न किये, समर्थको से उकसावे भरी टिप्पणी की,राजनीति में माहिर वामपंथियों के जाल में अपनी कमजोरी व अनुभवहीनता के कारण फंसे  जिसका परिणाम वाशिंगटन उपद्रव के रूप में सामने आया. अपने अनाड़ीपन, धैर्यहीनता तथा राजनितिक नासमझी के कारण ट्रम्प ने जाते-जाते अपने, अमरीकी लोकतन्त्र तथा राष्ट्रपति की साख पर बट्टा लगा दिया. 

वाशिंगटन में तख्ता पलट की इस नाकाम कोशिस के बाद अमरीका की छवि को धक्का लगेगा इसमें कोई संशय नहीं हैं. आज तक लोकतंत्र के रक्षक का दावा करते हुए ईरान, वियतनाम, अफगानिस्तान,ईराक, सीरिया, लेबनान आदि देशों में इसने जो अत्याचार किये है, उसके खिलाफ अब इससे दुनिया प्रश्न करने से घबराएगी नहीं. अपने देश में लोकतंत्र के मंदिर की रक्षा करने में असफल रहें अंकल सैम अब दुनिया को पहले की तरह लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने में सकुचायेंगे. इस घटना के बाद अमरीका व दुनिया के अन्य देश वर्तमान डेमोक्रेसी के प्रारूप व इसकी क्षमताओं को लेकर पुनः सोचेंगे, जिससे विश्व में कहीं और ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो. 

इस घटना के बाद हमें दुनिया में वामपंथी व दक्षिणपंथी विचारधारा के बीच टकराव में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. इसका मुख्य कारण वामपंथियों को अपनी योजना में मिली सफलता के बाद उनका बढ़ा हुआ उत्साह तथा दक्षिणपंथियों का बढ़ता संगठन व प्रतिकार की भावना है. इन चुनावों में विश्व ने जहाँ वामपंथी राजनीति को अपने जीवन हेतु एक हो मुखर रूप से लड़ते देखा वही दक्षिणपंथियों को भी मुखर व उठ खड़े होता देखा. विश्व की राजनीति में अमरीका का बड़ा योगदान है, वहां दक्षिणपंथियों की इस मुखरता के बाद विश्व के अन्य हिस्सों में भी दक्षिणपंथी संगठन प्रभावित होंगे उनमें मुखरता बढ़ेगी. जहाँ पहले लोकतंत्र के चारो स्तम्भों पे दक्षिणपंथियों की पकड़ कम थी, वामपंथी विचारधारा के मानने वालों का एकाधिकार था, वहीं अब विशेषकर 2010 के बाद इन स्थानों पर दक्षिणपंथी विचारधारा के मानने वालों का भी प्रभाव बढ़ा है. ऐसे मे इस मुखरता को मंच मिलेगा, उसका प्रभाव पड़ेगा, जिसकी वजह से इन दोनों प्रमुख राजनितिक एव वैचारिक धाराओं को मानने वालों के मध्य टकराव को भी मंच मिलेगा. 

वस्तुतः अमरीका में घटित यह घटना ट्रम्प व उनके समर्थकों को राजनितिक चक्रव्यूह में फंसा लेफ्ट के द्वारा रची एक सफल राजनितिक चाल थी, जिसकी वजह से राईट कमजोर हुआ, लेफ्ट की जीत हुई. लेफ्ट अमरीका का अपना किला बचाने में कामयाब हुआ तथा मिडिया, विभिन्न संवैधानिक तथा राजनितिक संस्थाओं पर अपनी पकड़ के माध्यम से वह खुद को लोकतंत्र का रक्षक तथा ट्रम्प के रूप में राईट को लोकतंत्र का भक्षक बताने में कामयाब हुआ. इस घटना ने वैश्विक राजनीति लेफ्ट व राईट के मध्य एक लम्बे टकराव को भी जन्म दिया जिसका असर वैश्विक होगा, भारत में भी देखने को मिलेगा. 

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