
न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स दीपावली आते ही स्वदेशी का शोर तेज हो जाता है। स्थानीय उत्पाद खरीदने की अपील होती है। मुरादाबाद का पीतल, भदोही का कालीन, फिरोजाबाद का कांच, कन्नौज का इत्र, वाराणसी का रेशम और लखनऊ की चिकनकारी प्रदेश की पहचान हैं। मगर इन्हें बनाने वाले हाथों की हालत क्या है? कारीगर की आमदनी न बढ़े, भुगतान समय पर न हो और अगली पीढ़ी हुनर छोड़ दे, तो स्वदेशी का उत्सव किसके लिए है? उत्पाद पर प्रदेश का नाम चमके और कारीगर के घर अंधेरा रहे, तो आत्मनिर्भरता का दावा खोखला है।उत्तर प्रदेश में एक जिला, एक उत्पाद यानी ओडीओपी योजना 24 जनवरी 2018 को शुरू हुई। 75 जिलों के लिए 110 उत्पाद चिह्नित हैं। दस फरवरी 2026 के लोकसभा जवाब के मुताबिक इनमें 75 प्राथमिक, 28 द्वितीयक और सात तृतीयक उत्पाद हैं। मार्जिन मनी योजना में 20,260 परियोजनाओं के लिए 6,931.10 करोड़ रुपये की परियोजना राशि और 897.05 करोड़ रुपये की सब्सिडी मंजूर हुई। सरकार ने 3,16,976 रोजगार सृजित होने की जानकारी दी। प्रशिक्षण में 1,33,472 कारीगर प्रशिक्षित हुए और 1,31,372 को औजार दिए गए। ये आंकड़े योजना का आकार बताते हैं, सफलता नहीं। परियोजना मंजूर होना, औजार मिलना और रोजगार टिकना अलग बातें हैं। सरकार बताए कि कितनी इकाइयां चल रही हैं और कितने रोजगार कायम हैं।
निर्यात के आंकड़े भी सरकार की सफलता का दावा मजबूत करते हैं। प्रदेश का कुल निर्यात 2017-18 के 88,967 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 में 1.71 लाख करोड़ रुपये हुआ। निवेश प्रोत्साहन पोर्टल पर 2024-25 के लिए 1.86 लाख करोड़ रुपये का निर्यात दर्ज है और ओडीओपी का योगदान करीब 93 हजार करोड़ रुपये बताया गया है। यह छोटे कारीगरों की कमाई का प्रमाण नहीं। कुल निर्यात में बिजली उपकरण, वाहन, दवा, चमड़ा और कपड़ा भी शामिल हैं। पूरी वृद्धि का श्रेय ओडीओपी को देना भ्रामक होगा। निर्यात बढ़ने से छोटे उत्पादक को कितना लाभ मिला? क्या मजदूरी बढ़ी, उचित मूल्य मिला और भुगतान समय पर हुआ? कारोबार बढ़ना और मेहनतकश की आमदनी बढ़ना एक बात नहीं।निर्यात का लाभ जिलों में बराबर नहीं बंटा। नवंबर 2026 की एक रिपोर्ट में शोधकर्ताओं के हवाले से कहा गया कि प्रदेश के 90 लाख से अधिक एमएसएमई से जुड़े निर्यात का 91 प्रतिशत केवल 15 जिलों से आता है, बाकी 60 जिलों की हिस्सेदारी नौ प्रतिशत है। यह शोधकर्ताओं का आकलन है, सरकारी लेखा नहीं। हर जिले को अवसर देने वाली योजना में बाजार, परिवहन, वित्त और निर्यात की सुविधाएं कुछ जिलों तक क्यों सिमटी हैं? सरकार जिलेवार निर्यात और उसमें छोटे उत्पादकों की हिस्सेदारी बताए। औद्योगिक जिले के कुल निर्यात को शिल्पकार की समृद्धि का पैमाना नहीं बनाया जा सकता।
बाजार तक पहुंच के लिए नवंबर 2026 में ओडीओपी और ओडीओसी उत्पादों की ई-कॉमर्स लिस्टिंग तथा डाकघर से निर्यात पर 75 प्रतिशत तक सहायता की घोषणा हुई। ऑनलाइन लिस्टिंग के लिए अधिकतम तीन लाख रुपये और डाकघर निर्यात पर एक लाख रुपये तक सहायता का प्रावधान बताया गया। लेकिन वेबसाइट पर उत्पाद चढ़ाने से ग्राहक नहीं मिलते। पैकिंग, गुणवत्ता प्रमाणन, समय पर आपूर्ति और डिजिटल भुगतान भी जरूरी हैं। छोटे कारीगर को तकनीक, पूंजी और मार्गदर्शन कौन देगा? आवेदन से भुगतान तक मदद नहीं मिली, तो सुविधा कागजों पर चमकेगी।माटीकला महोत्सव में बोर्ड ने 48 हजार से अधिक शिल्पकार परिवार चिह्नित करने, करीब 40 हजार को मिट्टी के लिए भूमि या पट्टे की सुविधा देने और 18,432 बिजली चालित चाक बांटने की जानकारी दी। चाक मिलना आजीविका की गारंटी नहीं। कुम्हार को मिट्टी, भट्ठी, सस्ती बिजली, ईंधन और सालभर बाजार चाहिए। मशीन खराब हो तो मरम्मत कौन कराएगा? त्योहार के बाद मांग घटे तो परिवार कैसे चलेगा? सफलता चाकों की संख्या से नहीं, कुम्हार की आमदनी से मापी जानी चाहिए।
पारदर्शिता पर भी जवाब जरूरी है। मई 2026 में कानपुर में ओडीओपी सब्सिडी से जुड़े खातों में कथित अनियमितताओं की खबरों के बाद उद्योग विभाग ने सभी 75 जिलों से रिपोर्ट मांगी। रिपोर्टों में शुरुआती जांच के दौरान छह करोड़ रुपये से अधिक की सब्सिडी में गड़बड़ी की आशंका और उस समय 40 जिलों से जानकारी मिलने की बात कही गई। इसे सिद्ध घोटाला कहना गलत होगा; जांच और आरोप अंतिम निष्कर्ष नहीं हैं। सरकार बताए कि जांच कहां पहुंची, कितनी वसूली हुई और कार्रवाई क्या हुई। सब्सिडी जनता का पैसा है; हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए।कारीगरों की मुश्किलें सब्सिडी तक सीमित नहीं। कच्चे माल की कीमत, बिजली-ईंधन का खर्च, बैंक ऋण की कठिन शर्तें, बिचौलियों का दबदबा और भुगतान में देरी कमाई घटाते हैं। भदोही के कालीन उद्योग में भी चुनौतियां हैं। सरकार सस्ता कार्यशील पूंजी ऋण, बीमा, कच्चे माल के बैंक, साझा मशीन केंद्र, डिजाइन प्रशिक्षण और गुणवत्ता जांच की सुविधाएं दे। खरीदारों के साथ लिखित भुगतान शर्तें हों और सरकारी खरीद में स्थानीय उत्पादों को अवसर मिले।
कारीगर को प्रमाणपत्र नहीं, बाजार चाहिए जिससे कमाई बढ़े। स्वदेशी को पर्यावरण के अनुकूल बताना पर्याप्त नहीं। मिट्टी के दीये और प्राकृतिक रेशों की वस्तुएं प्लास्टिक का विकल्प हो सकती हैं, लेकिन कांच, धातु और सिरेमिक के उत्पादन में ऊर्जा लगती है। भट्टियों का धुआं, रासायनिक रंग और पैकेजिंग कचरा नियंत्रित करना होगा। स्वच्छ ईंधन और कचरा प्रबंधन के बिना हरित उत्पादन अधूरा है। सरकार साझा केंद्र बनाए।भाजपा सरकार स्वदेशी को राष्ट्रीय गौरव और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताती है। उसे नतीजों का हिसाब देना चाहिए। जिलेवार सक्रिय इकाइयों, टिकाऊ रोजगार, औसत कारीगर आय, समय पर भुगतान, निर्यात में छोटे उत्पादकों की हिस्सेदारी और सब्सिडी के इस्तेमाल का सार्वजनिक डैशबोर्ड बने। प्रशिक्षण से पहले और बाद की आमदनी का ब्योरा जारी हो। कितनी परियोजनाएं बंद हुईं, कितने लाभार्थियों को ऋण नहीं मिला और कितनी इकाइयां बाजार के अभाव में ठप हैं, सामने आए। केवल सफलता की तस्वीरें दिखेंगी और असफलताओं पर पर्दा रहेगा, तो भरोसा कैसे बनेगा? दीपावली पर स्थानीय सामान खरीदने की अपील आसान है; उसे बनाने वाले को सालभर सम्मानजनक कमाई दिलाना कठिन। स्वदेशी का अर्थ विदेशी सामान को कोसना नहीं, अपने उत्पादक को सक्षम बनाना है। कैसी आत्मनिर्भरता, जिसमें उत्पाद, हुनर और मेहनत अपने हों, लेकिन मुनाफे का बड़ा हिस्सा किसी और की जेब में जाए? सरकार विज्ञापन से आगे बढ़कर कारीगर की आमदनी, सुरक्षा और बाजार पर काम करे। स्वदेशी की असली रोशनी कारीगर के घर में दिखेगी।
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