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Reading: मायावती का मिशन 2027: सोशल इंजीनियरिंग और एसआईआर के चक्रव्यूह से सत्ता वापसी की तैयारी
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INDIAMIX > राज्य > उत्तरप्रदेश > मायावती का मिशन 2027: सोशल इंजीनियरिंग और एसआईआर के चक्रव्यूह से सत्ता वापसी की तैयारी
उत्तरप्रदेशराजनीति

मायावती का मिशन 2027: सोशल इंजीनियरिंग और एसआईआर के चक्रव्यूह से सत्ता वापसी की तैयारी

SANJAY SAXENA
Last updated: 23/04/2026 4:14 PM
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SANJAY SAXENA
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Preparing for a Return to Power through the Labyrinth of Social Engineering and SIR

न्यूज़ डेस्क/इंडियामिक्स उत्तर प्रदेश की सियासी बिसात पर 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अभी से सुनाई देने लगी है। जहां समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ‘पीडीए’ के नारे के साथ मिशन-2027 का बिगुल फूंक चुके हैं और सत्तारूढ़ भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में पूरी ताकत झोंक रही है, वहीं बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भी अपनी खामोश लेकिन बेहद मारक रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। उत्तर प्रदेश की राजनीति जो पिछले कुछ समय से दो ध्रुवीय होती दिख रही थी, उसे मायावती एक बार फिर त्रिकोणीय बनाने की कवायद में जुट गई हैं। इस बार उनकी रणनीति सिर्फ नारों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जमीनी स्तर पर डेटा और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के घातक मिश्रण के साथ मैदान में उतर रही हैं। मायावती के लिए यह चुनाव केवल सत्ता का संघर्ष नहीं है, बल्कि पार्टी के अस्तित्व को बचाए रखने और दलित राजनीति की धुरी को फिर से अपने पाले में लाने की बड़ी चुनौती है।

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मायावती ने इस बार अपने पत्ते बेहद सावधानी से खोले हैं। उन्होंने 2027 के लिए उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया में एक नया और तकनीकी मोड़ दिया है, जिसे ‘एसआईआर’ (मतदाता सूची पुनरीक्षण) अभियान से जोड़ा गया है। आम तौर पर पार्टियां चुनाव से ऐन पहले टिकट बांटती हैं, लेकिन बसपा ने पहले ही करीब 40-50 सीटों पर संभावित उम्मीदवारों को हरी झंडी दे दी थी। हालांकि, अब इस रणनीति में अचानक बदलाव किया गया है। मायावती ने अब उन नेताओं को तवज्जो देने का फैसला किया है जिन्होंने एसआईआर अभियान के दौरान बूथ स्तर पर सक्रियता दिखाई। पार्टी का मानना है कि चुनाव सिर्फ रैलियों से नहीं, बल्कि वोटर लिस्ट में अपने समर्थकों के नाम सुरक्षित रखने से जीते जाते हैं। मायावती ने करीब 15 हजार बूथ कमेटियों से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। इस रिपोर्ट का मकसद यह समझना है कि कहां उनके वोट बैंक में सेंध लगी है और कहां साजिश के तहत समर्थकों के नाम काटे गए। जो पदाधिकारी इन कटे हुए नामों को दोबारा जुड़वाने और बूथ को मजबूत करने के मोर्चे पर सफल रहे हैं, उन्हीं की दावेदारी अब टिकट के लिए पुख्ता मानी जाएगी।

बसपा की इस नई रणनीति के केंद्र में वह ‘सोशल इंजीनियरिंग’ है, जिसने 2007 में पार्टी को पूर्ण बहुमत की सरकार तक पहुंचाया था। मायावती एक बार फिर ‘दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम’ गठजोड़ को जीवित करने की कोशिश कर रही हैं। उत्तर प्रदेश के बदलते सियासी समीकरणों के बीच मायावती यह समझ चुकी हैं कि केवल एक वर्ग के भरोसे सत्ता की कुर्सी तक नहीं पहुंचा जा सकता। इसीलिए उन्होंने हर विधानसभा सीट पर चार-चार दावेदारों का पैनल तैयार करवाया है। इन दावेदारों को उनकी जातीय पकड़ और स्थानीय समीकरणों के आधार पर परखा जा रहा है। मायावती ने मंडल और जोनल कोऑर्डिनेटरों को साफ निर्देश दिए हैं कि वे जातियों के गणित की सटीक रिपोर्ट दें। अगर किसी सीट पर दलित वोटों के साथ मुस्लिम या ब्राह्मण मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं, तो वहां उसी समाज के मजबूत चेहरे को तलाशा जा रहा है। यह प्रक्रिया काफी गहरी है, जिसमें पहले क्षेत्र प्रभारी बनाया जाता है और फिर उसकी सक्रियता के आधार पर उसे प्रत्याशी घोषित किया जाता है।

मायावती का दिल्ली से लखनऊ और फिर लखनऊ से दिल्ली का दौरा भी इसी रणनीति का हिस्सा है। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जहां बसपा का आधार हमेशा से मजबूत रहा है, वहां के समीकरणों को दुरुस्त करने की जिम्मेदारी मायावती ने खुद संभाली है। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल का कहना है कि पार्टी इस बार किसी बड़े दल से गठबंधन के बजाय अपने दम पर चुनाव लड़ेगी। पार्टी का मानना है कि गठबंधन से उनके वोट दूसरे दलों को ट्रांसफर हो जाते हैं, लेकिन दूसरे दलों के वोट बसपा को नहीं मिलते। ऐसे में अपने पारंपरिक वोट बैंक को सहेजकर रखना और उसमें दूसरे वर्गों को जोड़ना ही सबसे सुरक्षित रास्ता है। मायावती अब उन बूथों पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं जहां पिछले चुनावों में बसपा का प्रदर्शन गिरा था। वह खुद जिलों से आने वाली एक-एक रिपोर्ट की समीक्षा कर रही हैं और इस बात पर जोर दे रही हैं कि जिन मतदाताओं के नाम सूची से कट गए हैं, उन्हें दोबारा हर हाल में जुड़वाया जाए।

इस पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह संदेश है जो मायावती अपने कार्यकर्ताओं को दे रही हैं। वह लगातार बैठकों में इस बात का जिक्र कर रही हैं कि बसपा ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जो सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय के सिद्धांत पर काम करती है। समाजवादी पार्टी और भाजपा के बीच चल रही तकरार के बीच मायावती खुद को एक गंभीर और अनुशासित विकल्प के तौर पर पेश कर रही हैं। वह जानती हैं कि 2027 में सत्ता तक पहुंचने का रास्ता उन छोटी जातियों और समुदायों से होकर गुजरता है जो फिलहाल मुख्यधारा की राजनीति में उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि उनके टिकट वितरण में इस बार जातियों की केमिस्ट्री पर बहुत ज्यादा जोर दिया जा रहा है। एसआईआर अभियान से हुए नफे-नुकसान का आकलन कर उम्मीदवारों के चयन की यह पद्धति उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया प्रयोग है, जो यह दर्शाता है कि मायावती अब पुरानी शैली को आधुनिक चुनावी प्रबंधन के साथ जोड़ रही हैं।

हालांकि, राह इतनी आसान भी नहीं है। उत्तर प्रदेश में दलित वोटों के लिए भाजपा और सपा दोनों ने ही बड़ी सेंधमारी की है। चंद्रशेखर आजाद जैसे नए युवा चेहरों ने भी दलित राजनीति में अपनी जगह बनाई है। ऐसे में मायावती का पुराना ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूला कितना कारगर होगा, यह बड़ा सवाल है। लेकिन मायावती का इतिहास रहा है कि वह जब भी खामोश होती हैं, तो किसी बड़े सियासी धमाके की तैयारी में होती हैं। उनके पास अपना एक समर्पित कैडर है जो आज भी उनके एक इशारे पर लामबंद हो जाता है। 2007 के करिश्मे को 2027 में दोहराने के लिए उन्होंने संगठन के ढांचे में बड़े बदलाव किए हैं और नए चेहरों को मौका दिया जा रहा है। ब्राह्मण और मुस्लिम उम्मीदवारों को बड़े पैमाने पर मैदान में उतारने की तैयारी यह संकेत देती है कि बसपा इस बार किसी भी हाल में चुनावी मुकाबले को दोतरफा नहीं होने देगी।

बहरहाल, 2027 का चुनाव बसपा के लिए करो या मरो की स्थिति जैसा है। मायावती की यह सूक्ष्म रणनीति, जिसमें बूथ लेवल की रिपोर्टिंग से लेकर जातीय समीकरणों का जटिल जाल बुना गया है, विपक्षी खेमों में हलचल पैदा करने के लिए काफी है। क्या मायावती फिर से वही पुराना जादू चला पाएंगी? क्या एसआईआर अभियान के जरिए तैयार की गई उम्मीदवारों की नई फौज बसपा की नैया पार लगा पाएगी? ये ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब आने वाले समय की रैलियों और चुनावी माहौल में मिलेगा। फिलहाल तो हाथी अपनी मदमस्त चाल से अपनी मंजिल की ओर बढ़ता दिख रहा है, और मायावती की सोशल इंजीनियरिंग एक बार फिर यूपी की सियासत का सबसे चर्चित अध्याय बनने की ओर अग्रसर है। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक जो बैठकों का दौर चल रहा है, उसका एक ही लक्ष्य है सत्ता के शिखर पर बसपा का दोबारा परचम लहराना।

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